#सिंह_स्तोत्र
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#दुर्गा_पूजा के समय इस स्तोत्र का 1 बार पाठ करने से देवी प्रसन्न होती है।
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दुर्गापूजा के समय #देवीवाहन #श्री_शेर_सिंह_जी का पूजन करना भी जरूरी है।
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सिंह पूजन दुर्गा पूजन से पहले किया जाता है क्योंकि शेर दुर्गा का वाहन और आसन है।
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किसी भी देवी देवता का जब आवाहन जब पूजा के समय होता है तो उसे आसन भी दिया जाता है।
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अतः दुर्गा ऐसी शक्ति है जिसका #वाहन_और_आसन_एक_ही_है_जो_निर्जीव_ना_होकर_सजीव_है।
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निर्जीव का पूजन हो ना हो, लेकिन सजीव का पूजन आवश्यक है।
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जिन भी शक्तियों का आसन सजीव है, उसका पूजन आवश्यक है।
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अतः दुर्गा भक्त इस स्तोत्र का पाठ पहले करें।
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#दुर्गासप्तशती का पाठ करने वाले हर अध्याय से पहले एक बार इसका पाठ जरूर करें।
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किसी के पास #शेर_का_नाखून या #शेर_का_बाल हो तो वो उस नाखून या बाल को पूजा स्थान में तांबे के किसी पात्र में रखें और धूप दिया जलाकर उसका पूजन करे।
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सिंह स्तोत्र का 51 बार पाठ करें।
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उसके बाद वो नाखून या बाल चांदी के ताबीज में डालकर गले मे पहन लें।
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बच्चे नींद में नहीं डरेंगे, बुरे सपने नहीं आएंगे, जानवरों का भय नहीं होगा।
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अगर आप रोज इसका 1 बार पाठ करते हैं तो आप चाहे जितने मर्जी भयँकर जंगल में हों, आपको कोई भी जानवर नुक्सान नहीं पहुंचा पायेगा।
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शेर भी आपको मिल गया तो कुछ नहीं कर पायेगा।
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जिस मित्र ने ये स्तोत्र बताया है, उसने ये बात कही थी कि ऋषि मुनि जंगल में इस स्तोत्र का पाठ करते थे और शेर से लेकर अन्य जो भी हिंसक जानवर उनके करीब आता था तो जब तक वो उनके करीब रहता था, तब तक वो अपनी हिंसात्मक वृति छोड़ देता था।
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#स्तोत्र -
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॥ देवीवाहन (सिंह) ध्यानम् ॥
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ग्रीवायां मधु सूदनोऽस्य शिरसि श्री नीलकण्ठः स्थितः ,
श्री देवी गिरिजा ललाट फलके वक्षः स्थले शारदा ।
षड्वक्त्रो मणिबन्ध संधिषु तथा नागास्तु पार्श्वस्थिताः ।
कीयस्य तु चाश्विनौ स भगवानसिंहो ममास्त्विष्टदः ॥१॥
यन्नेत्रे शशि भास्करौ वसुकुलं दन्तेषु यस्य स्थितम् ,
जिह्वायां वरुणस्तु हुं कृतिरयं श्रीचर्चिका चण्डिका ।
गण्डौ यक्ष यमौ तथौष्ठ युगलं सन्ध्याद्वयं पृष्ठके ,
वज्रोयस्य विराजते स भगवान सिंह ममास्त्विष्टदः ॥२॥
ग्रीवा सन्धिषु सप्तविंशति मितान्यक्षाणि साध्या हृदि ,
प्रौढा निभृणता तमोऽस्य तु महाक्रौर्यैसमा पूतनाः ।।
प्राणेयस्य तु मातरः पितृकुलं यस्यास्त्य पानात्मकं
रूपे श्री कमला कचेषु विमलास्ते केयूरे रश्मयः ॥३॥
मेरू: स्याद्वषर्णेब्धयस्तु जनने स्वेद स्थिता निम्नगाः ,
लांगूले सहदेवतैर्विलसिता वेदा बलं वीर्यकम् ।
श्रीविष्णोः सकला सुरा अपि यथा स्थानं स्थितायस्तु
श्री सिंहोऽखिल देवतामय वपुर्देवी प्रियः पातु माम् ॥४॥
यो बालग्रह पूतनादि भय हृद्यः पुत्र लक्ष्मी प्रदोयः ,
स्वप्न ज्वर रोगराजभय हृद्योऽमङ्गले मङ्गलः ।
सर्वत्रोत्तम वर्णनेषु कविभिर्यस्योपमा दीयते
देव्या वाहनमशेष रोगभयहत् सिंहो ममास्त्विष्टदः ॥५॥
सिंहस्त्वं हरिरूपोऽसि स्वयं विष्णुर्न संशयः ।
पार्वत्या वाहनस्त्वं ह्यतः पूजयामि त्वामहम् ॥
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॥ इति श्री सिंह स्त्रोतम्॥
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#दुर्गा_पूजा के समय इस स्तोत्र का 1 बार पाठ करने से देवी प्रसन्न होती है।
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दुर्गापूजा के समय #देवीवाहन #श्री_शेर_सिंह_जी का पूजन करना भी जरूरी है।
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सिंह पूजन दुर्गा पूजन से पहले किया जाता है क्योंकि शेर दुर्गा का वाहन और आसन है।
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किसी भी देवी देवता का जब आवाहन जब पूजा के समय होता है तो उसे आसन भी दिया जाता है।
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अतः दुर्गा ऐसी शक्ति है जिसका #वाहन_और_आसन_एक_ही_है_जो_निर्जीव_ना_होकर_सजीव_है।
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निर्जीव का पूजन हो ना हो, लेकिन सजीव का पूजन आवश्यक है।
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जिन भी शक्तियों का आसन सजीव है, उसका पूजन आवश्यक है।
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अतः दुर्गा भक्त इस स्तोत्र का पाठ पहले करें।
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#दुर्गासप्तशती का पाठ करने वाले हर अध्याय से पहले एक बार इसका पाठ जरूर करें।
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किसी के पास #शेर_का_नाखून या #शेर_का_बाल हो तो वो उस नाखून या बाल को पूजा स्थान में तांबे के किसी पात्र में रखें और धूप दिया जलाकर उसका पूजन करे।
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सिंह स्तोत्र का 51 बार पाठ करें।
।
उसके बाद वो नाखून या बाल चांदी के ताबीज में डालकर गले मे पहन लें।
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बच्चे नींद में नहीं डरेंगे, बुरे सपने नहीं आएंगे, जानवरों का भय नहीं होगा।
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अगर आप रोज इसका 1 बार पाठ करते हैं तो आप चाहे जितने मर्जी भयँकर जंगल में हों, आपको कोई भी जानवर नुक्सान नहीं पहुंचा पायेगा।
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शेर भी आपको मिल गया तो कुछ नहीं कर पायेगा।
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जिस मित्र ने ये स्तोत्र बताया है, उसने ये बात कही थी कि ऋषि मुनि जंगल में इस स्तोत्र का पाठ करते थे और शेर से लेकर अन्य जो भी हिंसक जानवर उनके करीब आता था तो जब तक वो उनके करीब रहता था, तब तक वो अपनी हिंसात्मक वृति छोड़ देता था।
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#स्तोत्र -
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॥ देवीवाहन (सिंह) ध्यानम् ॥
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ग्रीवायां मधु सूदनोऽस्य शिरसि श्री नीलकण्ठः स्थितः ,
श्री देवी गिरिजा ललाट फलके वक्षः स्थले शारदा ।
षड्वक्त्रो मणिबन्ध संधिषु तथा नागास्तु पार्श्वस्थिताः ।
कीयस्य तु चाश्विनौ स भगवानसिंहो ममास्त्विष्टदः ॥१॥
यन्नेत्रे शशि भास्करौ वसुकुलं दन्तेषु यस्य स्थितम् ,
जिह्वायां वरुणस्तु हुं कृतिरयं श्रीचर्चिका चण्डिका ।
गण्डौ यक्ष यमौ तथौष्ठ युगलं सन्ध्याद्वयं पृष्ठके ,
वज्रोयस्य विराजते स भगवान सिंह ममास्त्विष्टदः ॥२॥
ग्रीवा सन्धिषु सप्तविंशति मितान्यक्षाणि साध्या हृदि ,
प्रौढा निभृणता तमोऽस्य तु महाक्रौर्यैसमा पूतनाः ।।
प्राणेयस्य तु मातरः पितृकुलं यस्यास्त्य पानात्मकं
रूपे श्री कमला कचेषु विमलास्ते केयूरे रश्मयः ॥३॥
मेरू: स्याद्वषर्णेब्धयस्तु जनने स्वेद स्थिता निम्नगाः ,
लांगूले सहदेवतैर्विलसिता वेदा बलं वीर्यकम् ।
श्रीविष्णोः सकला सुरा अपि यथा स्थानं स्थितायस्तु
श्री सिंहोऽखिल देवतामय वपुर्देवी प्रियः पातु माम् ॥४॥
यो बालग्रह पूतनादि भय हृद्यः पुत्र लक्ष्मी प्रदोयः ,
स्वप्न ज्वर रोगराजभय हृद्योऽमङ्गले मङ्गलः ।
सर्वत्रोत्तम वर्णनेषु कविभिर्यस्योपमा दीयते
देव्या वाहनमशेष रोगभयहत् सिंहो ममास्त्विष्टदः ॥५॥
सिंहस्त्वं हरिरूपोऽसि स्वयं विष्णुर्न संशयः ।
पार्वत्या वाहनस्त्वं ह्यतः पूजयामि त्वामहम् ॥
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॥ इति श्री सिंह स्त्रोतम्॥

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