Wednesday, October 23, 2019

एकमुखी, पँचमुखी और एकादशमुखी हनुमान कवच।

#जय_श्री_राम


#श्री_हनुमान_कवच।

आपको परेशान करने वाले को #दण्ड_मिलना_निश्चित है।

#चेतावनी - इसका उपयोग मजाक या टैस्टिंग के लिए तो कभी भी ना करें, नहीं तो आपकी वाट लग सकती है।

करना हो तो बहुत ज्यादा #हार्ड_ब्रह्मचर्य और साफ स्वच्छता के साथ करें।

इसका यूज करने से पहले कम से कम 50 बार जरूर सोच लें।


#प्रैक्टिकल_एक्सपीरियंस।


नमस्कार मित्रों।

मेरे एक मित्र हैं जिन्होंने #एकमुखी_पँचमुखी_और_एकादशमुखी_हनुमान_कवच के पाठ का एक्सपीरियंस किया है।

सबसे सबसे इन कवचों का एक्सपीरियंस उनको बहुत ज्यादा डरा देने वाला रहा।

उन्होंने 3 दिन से ज्यादा इनका यूज नहीं किया।

उनको #एक_ही_सपना 3 दिन लगातार आता रहा और उस सपने ने इनके #शरीर_को_असन्तुलित कर दिया।

सपना ये था -

नींद आते ही #परमाणु_बमों_के_विस्फोट नजर आते, #धमाके_कानों_में_गूंजने लगते,
सारा #सँसार_गलता हुआ नजर आने लगता।

खुद को जैसे तैसे उस स्थिति में बचाने लगते, पता नही  कौन उस स्थिति में उनको बचा रहा था।

3 दिन तक सिर में खोपड़ी फाड़ने की तकलीफ वाला सिरदर्द शुरू हुआ था।

एक हफ्ते बाद उनकी हालत ठीक हुई।

[ किसी भी व्यक्ति को ऐसा सपना 3 दिन तक लगातार सारी रात चलता रहे, उसका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाएगा।]


उन्हें इस इन कवच पाठों से इतना डर लग गया था कि इनके बारे में सोचने से ही काँपने लगते थे।


उन्होंने #श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ शुरू किया था इसके बाद भी।

उन्होंने सब प्रकार के स्तोत्र आजमाए हैं, जब भी उन्हें गड़बड़ लगती है तो लास्ट में श्रीरामरक्षास्तोत्र का यूज करते हैं।


उन्होंने इस कवच के बारे में एक बात ये कही कि यदि कवच का पाठ करने से पहले और पाठ करने के बाद श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ किया जाए तो भयँकर वाला प्रभाव नहीं रहता है।

उन्होंने यूज किया है।



दूसरे मित्र ने भी इन में से एक कवच का यूज अपनी #कोर्टकेस की समस्या के लिए किया था।

उसकी गलती ना होते हुए भी उसकी तरफ ही माईनस पॉइंट जा रहे थे।

उसने जब कवच यूज किया तो उसका सन्तुलन नहीं बिगड़ा।

क्योंकि उसके प्रोसीजर बहुत जबरदस्त था।

वो भी हनुमान भक्त था।

उसने कवच पाठ से पहले ये सब किया -

सबसे पहले #श्रीराम_के_मन्दिर में जाकर के पूजा पाठ कर के श्रीराम से इसकी अनुमति माँगी।

उसके बाद #हनुमान_मन्दिर में जाकर पूजा करके #श्रीराम_नाम_लिखा हुआ झण्डा चढ़ाया।

और श्री राम के नाम से #दीपक जलाया।

शनिवार के दिन हनुमान जी को चमेली के तेल में हनुमान सिन्दूर मिलाकर #चोला चढ़ाया और चोला चढ़ाते समय इस दोहे का उच्चारण करता रहा -

लाल देह लाली लसे, अरुधरी लाल लंगूर।
वज्रदेह दानव दलन, जय जय कपि सूर।।


उसके बाद उसने मंगलवार रात से शुरू किया।

पूजा स्थान पर ऐसा फोटो रखा जिसमें हनुमान के पीछे श्री राम और सीता थे।

हनुमान भजन स्तुति में मग्न था।

पूजा स्थान में हनुमान के सामने #रहल पर एक #डायरी रखी जिसका मुँह हनुमान की तरफ था जैसे हनुमान उसे पढ़ रहा हो।

उस डायरी में उसने 1008 बार #श्रीराम_जयराम_जयजय_राम #लाल_बॉलपेन से लिखा था।

उसने इस प्रोसीजर से हनुमान की सारी उग्रता समाप्त कर दी थी।

प्रोसीजर के बाद वो डायरी उसने जल प्रवाह कर दी थी।

पानी का लोटा रखा अभिमंत्रित करने के लिए।

उसके बाद उसने कवच पाठ किया था।

45 दिन का प्रोसीजर कम्प्लीट कर लिया।

पूरे ब्रह्मचर्य के साथ उसने ये किया।

कोर्टकेस उसके पक्ष में आ गया।


[नोट - ये कवच मल्टीपर्पज हैं, बाधा किसी भी प्रकार की हो, यूज कर सकते हैं।

तान्त्रिक पद्धति वाले पूजा के समय एकमुखी, पँचमुखी या एकादशमुखी हनुमान का फोटो यूज करें तथा वीरासन में बैठ कर पाठ करें।

इससे उग्रता बढ़ती है।

सात्विक पद्धति वाले उपरोक्त श्रीराम सीता हनुमान वाला फोटो इस्तेमाल कर के साधारण तरीके से पढ़ें।

इससे उग्रता नहीं बढ़ती है।]


कवचों में जहाँ भी #इति_दिग्बन्ध या #दिग्बन्धन आया है वहाँ बांये हथेली पर दांये हाथ की चारों अंगुलियों से 3 बार ज़ोर से ताली बजाकर दशों दिशाओं ( 4 दिशा, 4 उपदिशा मतलब कोने और 2 ऊपर तथा नीचे ) की ओर क्रम से “ॐ भूर्भुवःस्वरोम्” मन्त्र पढ़कर चुटकी बजाएं, इससे पाठ में विघ्न नहीं आते।

जितनी बार भी #विनियोग आया है उतनी बार विनियोग करना है।

स्तोत्र का पाठ 11 बार करना है एयर उसके बाद अभिमंत्रित पानी घर में छिड़कना है और पीना है। ]


#एकमुखी_हनुमान_कवच


अथ श्री एकमुखि हनुमत्कवचं प्रारंभयते।

मनोजवं मारुततुल्य वेगं, जितेंद्रियं बुधिमतां वरिष्ठं ।
वातात्मजं वानर्युथ्मुख्यं, श्रीराम्दूतं शरणं प्रप्धे ।।

अथ श्री हनुमते नम:।

एकदा सुखमासीनं शंकरं लोकशंकरं ।
पप्रच्छ गीरिजाकांतं कर्पूधवलं शिवं ।।

पार्वत्युवाच -

भगवन्देवदेवेश लोकनाथं जगद्-गुरो ।
शोकाकुलानां लोकानां केन रक्षा भवेद ध्रुवं ।।
संग्रामे संकटे घोरे भूतप्रेतादिके भये ।
दुखदावाग्नि संतप्त चेतसां दुखभागिनां ।।

ईश्वर उवाच-

श्रणु देवि प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।
विभीषणाय रामेण प्रेम्णा दत्तं च यत्पुरा ।।
कवचं कपिनाथस्य वायुपुत्रस्य धीमत: ।
गुह्यं ते संप्रवछ्यामि विशेषाच्छ्रिणु सुन्दरि ।।

ॐ अस्य श्रीहनुमत् कवच-स्त्रोत्र-मंत्रस्य श्रीरामचंद्र ऋषिः । अनुष्टुप्छंदः ।
श्रीमहावीरो हनुमान देवता । मारुतात्मज इति बीजं ।।
ॐ अंजनीसुनुरिति शक्ति: । ॐ ह्रैं ह्रां ह्रौं इति कवचं ।
स्वाहा इति कीलकं । लक्ष्मण प्राणदाता इति बीजं ।
मम् सकलकार्य सिध्दयर्थे जपे वीनियोग: ।।

करन्यास -

ॐ ह्रां अंगूष्ठाभ्यां नम: । ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नम: ।
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नम: । ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नम: ।
ॐ ह्रौं कनिष्ठिभ्यां नम: । ॐ ह्र: करतल करप्रिष्ठाभ्यां नम: ।

अंगन्यास -

ॐ अंनीसूनवे ह्र्दयाय नम: । ॐ रुदमूर्तये सिरसे स्वाहा ।
ॐ वायुसुतात्मने शिखायै वषट् । ॐ वज्रदेहाय कवचाय हुं ।
ॐ रामदूताय नेत्र-त्रयाय वौषट् । ॐ ब्र्ह्मास्त्र निवारणाय अस्त्राय फट् ।
ॐ राम-दूताय विद-महे कपि-राजाय धीमहि ।
तन्नो हनुमान प्रचोदयात् ॐ हुं फट् ।।

।। इति दिग्बन्धः ।।

ॐ ध्यायेद्-बाल दिवाकर-धुतिनिभं देवारिदर्पापहं
देवेन्द्र-प्रमुख-प़शस्त-यशसं देदीप्यमानं रुचा ।
सुग्रीवादि-समस्त-वानर-युतं सुव्यक्त-तत्वप्रियं
संरक्तारुण-लोचनं पवनजं पीतांबरालंकृतं ।।१।।
उधन्मार्तण्ड-कोटि-प्रकट-रुचियुतं चारु-वीरासनस्थं
मौंजी-यज्ञो-पवीता-रुण-रुचिर-शिखा-शोभितं कुंडलागम् ।
भक्ता-नामिष्ट-दं तं प्रणत्-मुनिजनं वेदनाद-प्रमोदं
ध्याये-देव विधेयं प्ल्वंग-कुल-पतिं गोष्पदी भूतवार्धिं ।।२।।
वज्रांगं पिंगकेशाढ्यं स्वर्णकुंडल-मंडितं ।
नियुध्द-कर्म-कुशलं पारावार-पराक्रमं ।।३।।
वामहस्ते महावृक्षं दशास्यकर-खंडनं ।
उध-दक्षिण-दौर्दण्डं हनुमंतं विचिंतयेत् ।।४।।
स्फटिकांभं स्वर्णकान्ति द्विभुजं च कृतांजलिं ।
कुंडलद्वय-संशौभि मुखांभोजं हरिं भजेत् ।।५।।
उधदादित्य संकाशं उदारभुजविक़मम् ।
कंदर्प-कोटिलावण्यं सर्वविधा-विशारदम् ।।६।।
श्रीरामहृदयानंदं भक्तकल्पमहीरूहम् ।
अभयं वरदं दोर्भ्यां कलये मारूतात्मजम् ।।७।।
अपराजित नमस्तेऽस्तु नमस्ते रामपूजित ।
प्रस्थानं च करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ।।८।।
यो वारां निधि-मल्प-पल्वल-मिवोल्लंघ्य-प्रता-पान्वितो
वैदेही-घन-शोक-तापहरणो वैकुण्ठ-तत्वप्रियः ।
अक्षाघूर्जित-राक्षसेश्वर-महादर्पापहारी रणे
सोऽयं-वानर-पुंगवोऽवतु सदा युष्मान्-समीरात्मजः ।।९।।
वज्रांगं पिंगकेशं कनकमयल-सत्कुण्डला-क्रांतगंडं
नाना विधाधिनाथं करतल-विधृतं पूर्णकुंभं दृढं च ।
भक्ताभीष्टाधिकारं विदधति च सदा सर्वदा सुप्रसन्नं
त्रैलोक्यं-त्राणकारं सकलभुवनगम् रामदूतम् नमामि ।।१०।।
उधल्लांगूल-केशप्रलय-जलधरं भीममूर्तिं कपींद्रं
वंदे रामांघ्रि-पद्म-भ्रमरपरिवृतं तत्वसारं प्रसनम् ।
वज्रांगं वज्ररुपं कनकमयल-सत्कुण्डला-क्रांतगंडं
दंभोलिस्तंभ-सार-प्रहरण विकटं भूतरक्षोऽधिनाथम् ।।११।।
वामे करे वैरिभयं वहंतं शैलं च दक्षेनिजकण्ठलग्नम् ।
दधान-मासाद्ध सुवर्णवर्ण भजेज्ज्वलत्कुंडल-रामदूतम् ।।१२।।
पद्मरागमणि कुंडलत्विषा-पाटलीकृत-कपोलमण्डलम् ।
दिव्यगेह-कदली-वनांतरे भावयामि पवमान-नन्दनम् ।।१३।।

ईश्वर उवाच-

इति वदति-विशेषद्राधवो राक्षसेंद्र प्रमुदितवरचितो रावणस्यानुजो हि
रघूवरदूतं पूज्यमास भूयः स्तुतिभिरकृतार्थ स्वं परं मन्यमानः ।।१४।।
वन्दे विघुद्वलय सुभगम् स्वर्णयज्ञोपवीतं
कर्णद्वंद्वे कनकरूचिरे-कुण्डले धारयन्तम् ।
उच्चैर्ह्रस्य दधुमणि किरणो श्रेणि संभावितांगम्
सत्कौपीनं कपिवरवृतं कामरूपं कपीन्द्रम् ।।१५।।
मनोजवं मारुत तुल्य वेगं, जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं सततं स्मरामि ।।१६।।

अंगन्यास -

ॐ नमो भगवते ह्रदाय नम: ।
ॐ आंजनेयाय शिरसे स्वाहा ।
ॐ रूद्रमूर्तये शिखायै वषट् ।
ॐ रामदूताय कवचाय हुम् ।
ॐ हनुमते नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ अग्निगर्भाय अस्त्राय फट् ।

करन्यास -

ॐ नमो भगवते अंगुष्ठाभ्यां नम: ।
ॐ वायुसूनवे तर्जनीभ्यां नम: ।
ॐ रूद्रमूर्तये मध्यमाभ्यां नम: ।
ॐ वायुसूनवे अनामिकाभ्यां नम: ।
ॐ हनुमते कनिष्ठिकाभ्यां नम: ।
ॐ अग्निगर्भाय करतल करप्रिष्ठाभ्यां नम: ।

अथ मंत्र उच्यते-

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः ।
ॐ ह्रीं ह्रौं ॐ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत प्रेत पिशाच शाकिनी डाकिनी यक्षिणी पूतनामारी महामारी भैरव यक्ष बेताल राक्षस ग्रह राक्षसादिकं क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय सिक्ष्य सिक्ष्य महामाहेश्वर रूद्रावतार ह्रुं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते हनुमादाख्याय रूद्राय सर्वदुष्टजनमुखस्तंभनं कुरू-कुरू ह्रां ह्रीं ह्रूं ठं-ठं-ठं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते अंजनीगर्भसंभूताय रामलक्ष्मणानन्दकराय कपिसैन्यप्रकाशनाय पर्वतोत्पाटनाय सुग्रीव साधकाय रणोच्च्टनाय कुमार ब्रह्मचारिणे गंभीर-शब्दोदयाय |
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं सर्वदुष्ट निवारणाय स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते सर्वग्रहान्भूतभविष्य-दूर्तमानान्-दूरस्थान् समीपस्थान् सर्वकाल दुष्टदुर्बुद्धीन उच्चाट योच्चाटय परबलानि क्षोभय क्षोभय मम् सर्वकार्यं साधय साधय हनुमते |
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं फट् देहि ।
ॐ शिवं सिद्धं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते परकृतयंत्र-मंत्र-पराऽहंकार-भूतप्रेत पिशाच परदृष्टि-सर्वविध्न-दुर्जनचेटक विधा सर्वग्रहान् निवारय निवारय वध वध पच पच दल दल किल किल सर्वकुयंत्राणि-दुष्टवाचं फट् स्वाहा।
ॐ नमो हनुमते पाहि पाहि एहि एहि सर्वग्रह भूतानां शाकिनी-डाकिनीनां विषम् दुष्टानां सर्वविषयान् आकर्षय आकर्षय मर्दय मर्दय भेदय भेदय मृत्युमुत्पाटयोत्पाटय शोषय शोषय ज्वल ज्वल प्रज्ज्वल प्रज्ज्वल भूतमंडलं प्रेतमंडलं पिशाचमंडलं निरासय निरासय भूतज्वर प्रेतज्वर चातुर्थिकज्वर विषंज्वर माहेश्वरज्वरान् छिंधि छिंधि भिंधि भिंधि अक्षिशूल वक्षःशूल शरोभ्यंतरशूल गुल्मशूल पित्तशूल ब्रह्र-राक्षसकुल परकुल नागकुल विषं नाशय नाशय निर्विषं कुरू कुरू फट् स्वाहा ।
ॐ ह्रीं सर्वदुष्ट ग्रहान् निवारय फट् स्वाहा ।।
ॐ नमो हनुमते पवनपुत्राय वैश्वानरमुखाय हन हन पापदृष्टिं षंढ़दृष्टिं हन हन हनुमदाज्ञया स्फुर स्फुर फट् स्वाहा ।।

श्रीराम उवाच-

हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः ।
प्रतीच्यां पातु रक्षोध्न उत्तरास्यांब्धि पारगः ।।१।।
उध् मूध्वर्गः पातु केसरीप्रियनंदनः ।
अधस्च विष्णु भक्तस्तु पातु मध्ये च पावनिः ।।२।।
अवान्तर दिशः पातु सीताशोकविनाशनः ।
लंकाविदाहकः पातु सर्वापदभ्यो निरंतरं ।।३।।
सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं वायुनंदनः ।
भालं पातु महावीरो भ्रुवोमध्ये निरंतरं ।।४।।
नेत्रे छायापहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ।
कपोलौ कर्णमूले तु पातु श्रीरामकिंकरः ।।5।।
नासाग्रम्-अंजनीसूनुर्वक्त्रं पातु हरीश्वरः ।
वाचं रूद्रप्रियः पातु जिह्वां पिंगललोचनः ।।६।।
पातु दंतांफाल्गुनेष्टश्चिबुकं दैत्यप्राणह्रृत् ।
पातु कण्ठण्च दैत्यारीः स्कंधौ पातु सुरार्चितः ।।७।।
भुजौ पातु महातेजाः करौतू चरणायुधः ।
नखांनखायुध पातु कुक्षिं पातु कपीश्वरः ।।८।।
वक्षोमुद्रापहारी-च पातु पार्श्र्वे भुजायुधः ।
लंकाविभंजनः पातु पृष्ठदेशे निरंतरं ।।९।।
नाभिंच रामदूतोस्तु कटिं पात्वनिलात्मजः ।
गुह्मं पातु महाप्रज्ञः सक्थिनी-च शिवप्रियः ।।१०।।
उरू-च जानुनी पातु लंकाप्रासादभंजनः ।
जंधे पातु महाबाहुर्गुल्फौ पातु महाबलः ।।११।।
अचलोध्दारकः पातु पादौ भास्करसन्निभः ।
पादांते सर्वसत्वाढ्यः पातु पादांगुलीस्तथा ।।१२।।
सर्वांगानि महावीरः पातु रोमाणि चात्मवान् ।
हनुमत्कवचं यस्तु पठेद्विद्वान् विलक्षणः ।।१३।।
स-एव पुरूषः श्रेष्ठो भक्तिं मुक्तिं-च विंदति ।
त्रिकालमेककालं-वा पठेन्मात्रयं सदा ।।१४।।
सर्वान-रिपून्क्षणे जित्वा स पुमान् श्रियमाप्नुयात् ।
मध्यरात्रे जले स्थित्वा सप्तवारं पठेद्धादि ।।१५।।
क्षयाऽपस्मार-कुष्ठादिता-पत्रय-निवारणं ।
आर्किवारेऽश्र्वत्थमूले स्थित्वा पठतिः यः पुमान् ।।१६।।
अचलां श्रियमाप्नोति संग्रामे विजयीभवेत् ।।१७।।
यः करे धारयेन्-नित्यं-स पुमान् श्रियमाप्नुयात् ।
विवाहे दिव्यकाले च द्धूते राजकुले रणे ।।१८।।
भूतप्रेतमहादुर्गे रणे सागरसंप्लवे ।
दशवारं पठेद्रात्रौ मिताहारी जितेंद्रियः ।।१९।।
विजयं लभते लोके मानवेषु नराधिपः ।
सिंहव्याघ्रभये चोग्रेशर शस्त्रास्त्र यातने ।।२०।।
श्रृंखलाबंधने चैव काराग्रहकारणे ।
कायस्तंभ वहिन्नदाहे च गात्ररोगे च दारूणे ।।२१।।
शोके महारणे चैव ब्रह्मग्रहविनाशने ।
सर्वदा तु पठेन्नित्यं जयमाप्नोत्य संशयं ।।२२।।
भूर्जेवा वसने रक्ते क्षौमेवा तालपत्रके ।
त्रिगंधेन् अथवा मस्या लिखित्वा धारयेन्नरः ।।२३।।
पंचसप्तत्रिलौहैर्वा गोपितं कवचं शुभं ।
गलेकट्याम् बाहुमूले वा कण्ठे शिरसि धारितं ।।२४।।
सर्वान्कामानवाप्नोति सत्यं श्रीरामभाषितं ।।२५।।
उल्लंघ्य सिंधोः सलिलं-सलिलं यः शोकवन्हि जनकात्मजायाः ।
आदाय तेनैव ददाह लंकां नमामितं प्राण्जलिराण्जनेयम् ।।२६।।
ॐ हनुमान् अंजनी सूनुर्वायुर्पुत्रो महाबलः ।
श्रीरामेष्टः फाल्गुनसंखः पिंगाक्षोऽमित विक्रमः ।।२७।।
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः ।
लक्ष्मणप्राणदाताच दशग्रीवस्य दर्पहा ।।२८।।
द्वादशै तानि नामानि, कपींद्रस्य महात्मनः ।
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकालच यः पठेत् ।।२९।।
तस्य सर्वभयं नास्ति, रणे च विजयी भवेत् ।
धन-धान्यं भवेत् तस्य दुःखं नैव कदाचन ।।३०।।
ॐब्रह्माण्ड पूर्णांतर गते नारद अगस्त् संवादे ।
श्रीरामचंद्र कथितम् पंच-मुखेक एकमुखी हनुमत् कवचं ।।


#पँचमुखी_हनुमान_कवच


ॐ श्री पंचवदनायांजनेयाय नमः।

ॐ अस्य श्री पंचमुखहनुमत्कवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्रीछन्दः,पंचमुखविराट्हनुमान्‌ देवता, ह्रीं बीजं, श्रीं शक्ति, क्रौं कीलकं, क्रूं कवचं, क्रैं अस्राय फट् इति दिग्बन्धः ॥

श्री गरुड उवाच -

अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि श्रृणुसर्वांगसुन्दरि ।
यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमतः प्रियम्‌ ॥1॥
पंचवक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम्‌ ।
बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिद्धिदम्‌ ॥2॥
पूर्वंतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम्‌ ।
दंष्ट्राकरालवदनं भृकुटीकुटिलेक्षणम्‌ ॥3॥
अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम्‌ ।
अत्युग्रतेजोवपुषं भीषणं भयनाशनम्‌ ॥4॥
पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुंडं महाबलम्‌॥
सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम्‌ ॥5॥
उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम्‌ ।
पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम्‌ ॥6॥
ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवांतकरं परम ।
येन वक्त्रेण विप्रेंद्र तारकाख्यं महासुरम्‌ ॥7॥
जघान शरणं तत्स्यात्सर्वशत्रुहरं परम्‌ ।
ध्यात्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम्‌ ॥8॥
खंग त्रिशूलं खट्वांगं पाशमंकुशपर्वतम्‌ ।
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुम्‌ ॥9॥
भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुंगवम्‌ ।
एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम्‌ ॥10॥
प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम्‌ ।
दिव्यमाल्याम्बरघर दिव्यगन्धानुलेपनम्‌ ॥11॥
सर्वाश्चर्यमय देव हनुमद्विश्वतोमुखम्‌ ।
पश्चास्यमच्युतम नेकविचित्रवर्णं वक्त्रं
शशांकशिखरं कपिराजवयम ।
पीतांबरादिमुकुटैरूपशोभितांग
पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ॥12॥
मर्कटेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम्‌ ।
शत्रु संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर ॥13॥
ॐ हरिमर्कट मर्कट मन्त्रमिदं
परिलिख्यति लिख्यति वामतले ।
यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं
यदि मुश्चति मुश्चति वामलता ॥14॥

ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारणाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गुरुडाननाय सकलविषहराय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनायोत्तरमुखायादिवराहाय सकलसम्पत्कराय स्वाहा ।
ऊँ नमो भगवते पंचवदनायोर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशंकराय स्वाहा ।

विनियोग -

ॐ अस्य श्री पंचमुखहनुमन्मंत्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः अनुष्टुप्‌छन्दः, पंचमुखवीरहनुमान्‌ देवता, हनुमानिति बीजम्‌, वायुपुत्र इति शक्तिः, अंजनीसुत इति कीलकम्‌, श्रीरामदूतहनुमत्प्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । इति ऋष्यादिकं विन्यस्य ।

करन्यास -

ॐ अंजनीसुताय अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ वायुपुत्राय मध्माभ्यां नमः ।
ॐ अग्निगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ पंचमुखहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः ।

अंगन्यास-

ॐ अंजनीसुताय हृदयाय नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ वायुपुत्राय शिखायै वंषट् ।
ॐ अग्निगर्भाय कवचाय हुं ।
ॐ रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ पंचमुखहनुमते अस्राय फट् ।
पंचमुखहनुमते स्वाहा ।
इति दिग्बन्धः ।

अथ ध्यानम्‌ -
.
वन्दे वानरनारसिहखगराट्क्रोडाश्ववक्रान्वितं दिव्यालंकरणं त्रिपश्चनयनं दैदीप्यमानं रुचा । हस्ताब्जैरसिखेटपुस्तकसुधाकुम्भांकुशादि हलं खटांगं फणिभूरुहं दशभुजं सर्वारिवीरापहम्‌ ॥1॥ इति ॥

अथ मंत्र-

ॐ श्रीरामदूतायांजनेयाय वायुपुत्राय महाबलपराक्र्रमाय सीतादुःखनिवारणाय लंकादहनकारणाय महाबलप्रचण्डाय फाल्गुनसखाय कोलाहलसकल ब्रह्माण्डविश्वरूपाय सप्तसमुद्रनिर्लंघनाय पिंगलनयनायामितविक्रमाय सूर्यबिम्बफलसेवनाय दुष्टनिवारणाय दृष्टिनिरालंकृताय संजीविनीसंजीवितांगदलक्ष्मणमहाकपिसैन्यप्राणदाय दशकण्ठविध्वंसनाय रामेष्टाय महाफाल्गुनसखाय सीतासहित रामवरप्रदाय षट्प्रयोगागम पंचमुखवीरहनुमन्मंत्रजपे विनियोगः ।

ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बंबंबंबंबं वौषट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय फंफंफंफंफं फट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय खेंखेंखेंखेंखें मारणाय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय लुंलुंलुंलुंलुं आकर्षितसकलसम्पत्कराय स्वाहा।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय धंधंधंधंधं शत्रुस्तम्भनाय स्वाहा ।
ॐ टंटंटंटंटं कूर्ममूर्तये पंचमुखवीरहनुमते परयन्त्रपरतंत्रोच्चाटनाय स्वाहा ।
ऊँ कंखंगंघंडं चंछंजंझंञं टंठंडंढंणं तंथंदंधंनं पंफंबंभंमं यंरंलंवं शंषंसंहं ळं क्ष स्वाहा। इति दिग्बंधः ।
ॐ पूर्वकपिमुखाय पंचमुखहनुमते टंटंटंटंटं सकलशत्रुसंहरणाय स्वाहा ।
ॐ दक्षिणमुखाय पंचमुखहनुमते करालवदनाय नरसिहाय ।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रुं ह्रैं ह्रौं ह्रः सकलभूतप्रेतदमनाय स्वाहा ।
ऊँ पश्चिममुखाय गरुडाननाय पंचमुखहनुमते मंमंमंमंमं सकलविषहराय स्वाहा ।
ॐ उत्तरमुखायादिवराहाय लंलंलंलंलं नृसिंहाय नीलकण्ठमूर्तये पंचमुखहनुमतये स्वाहा ।
ॐ उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुंरुंरुंरुंरुं रुद्रमूर्तये सकलप्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ।
ऊँ अंजनीसुताय वायुपुत्राय महाबलाय सीताशोकनिवारणाय श्रीरामचंद्रकृपापादुकाय
महावीर्यप्रमथनाय ब्रह्माण्डनाथाय कामदाय पंचमुखवीरहनुमते स्वाहा ।
भूतप्रेतपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिन्यन्तरिक्षग्रह परयंत्रपरतंत्रोच्चटनाय स्वाहा ।
सकलप्रयोजननिर्वाहकाय पंचमुखवीरहनुमते श्रीरामचन्द्रवरप्रसादाय जंजंजंजंजं स्वाहा ।
इदं कवचं पठित्वा तु महाकवच पठेन्नरः ।
एकवारं जपेत्स्तोत्रं सर्वशत्रुनिवारणम्‌ ॥15॥
द्विवारं तु पठेन्नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम्‌ ।
त्रिवारं च पठेन्नित्यं सर्वसम्पतकरं शुभम्‌ ॥16॥
चतुर्वारं पठेन्नित्यं सर्वरोगनिवारणम्‌ ।
पंचवारं पठेन्नित्यं सर्वलोकवशंकरम्‌ ॥17॥
षड्वारं च पठेन्नित्यं सर्वदेववशंकरम्‌ ।
सप्तवारं पठेन्नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम्‌ ॥18॥
अष्टवारं पठेन्नित्यं मिष्टकामार्थसिद्धिदम्‌ ।
नववारं पठेन्नित्यं राजभोगमवाप्युनात्‌ ॥19॥
दशवारं पठेन्नित्यं त्रैलोक्यज्ञानदर्शनम्‌ ।
रुद्रावृत्तिं पठेन्नित्यं सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम्‌ ॥20॥
कवचस्मतरणेनैव महाबलमवाप्नुयात्‌ ॥21॥
॥ सुदर्शनसंहितायां श्रीरामचन्द्रसीताप्रोक्तं श्री पंचमुखहनुमत्कवचं संपूर्ण ॥


#एकादशमुखी_हनुमान_कवच


॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

लोपामुद्रोवाच-

कुम्भोद्भव दयासिन्धो श्रुतं हनुमतः परम् । यन्त्रमन्त्रादिकं सर्वं त्वन्मुखोदीरितं मया ॥१॥
दयां कुरु मयि प्राणनाथ वेदितुमुत्सहे ।कवचं वायुपुत्रस्य एकादशमुखात्मनः ॥२॥
इत्येवं वचनं श्रुत्वा प्रियायाः प्रश्रयान्वितम् । वक्तुं प्रचक्रमे तत्र लोपामुद्रां प्रति प्रभुः ॥३॥
अगस्त्य उवाच -
नमस्कृत्वा रामदूतं हनुमन्तं महामतिम् । ब्रह्मप्रोक्तं तु कवचं शृणु सुन्दरि सादरम् ॥४॥
सनन्दनाय सुमहच्चतुराननभाषितम् । कवचं कामदं दिव्यं सर्वरक्षोनिबर्हणम् ॥५
सर्वसम्पत्प्रदं पुण्यं मर्त्यानां मधुरस्वरे । ॐ अस्य श्रीकवचस्यैकादशवक्त्रस्य धीमतः ॥६॥
हनुमत्कवचमन्त्रस्य सनन्दनऋषिः स्मृतः । प्रसन्नात्मा हनूमांश्च देवताऽत्र प्रकीर्तिता ॥७॥
छन्दोऽनुष्टुप् समाख्यातं बीजं वायुसुतस्तथा । मुख्यः प्राणः शक्तिरिति विनियोगः प्रकीर्तितः ॥८॥
सर्वकामार्थसिद्ध्यर्थे जप एवमुदीरयेत् ।

विनोयोग -

ॐ अस्य श्रीएकादशवक्त्रहनुमत्कवचमन्त्रस्य सनन्दनऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, प्रसन्नात्मा हनूमान् देवता, वायुसुतो बीजं, मुख्यः प्राणः शक्तिः सर्वकामार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास-

ॐ सनन्दनाय ऋषये नमः शिरसि, ॐ अनुष्टुब्छन्दसे नमो मुखे, ॐ प्रसन्नात्महनुमद्देवतायै नमो हृदि, ॐ वायुसुतबीजाय नमो गुह्ये, ॐ मुख्यप्राणशक्तये नमः पादयोः, ॐ सर्वकामार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

करन्यास-

ॐ स्फ्रेंबीजं शक्तिधृक् पातु शिरो मे पवनात्मजः इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः, ॐ क्रौंबीजात्मा नयनयोः पातु मां वानरेश्वरः इति तर्जनीभ्यां नमः, ॐ क्षंबीजरूपी कर्णौ मे सीताशोकविनाशनः इति मध्यमाभ्यां नमः, ॐ ग्लौंबीजवाच्यो नासां मे लक्ष्मणप्राणदायकः इत्यनामिकाभ्यां नमः, ॐ वं बीजार्थश्च कण्ठं मे अक्षयक्षयकारकः इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः, ॐ ऐं बीजवाच्यो हृदयं पातु मे कपिनायकः इति
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदयादिन्यास-

ॐ स्फ्रेंबीजं शक्तिधृक् पातु शिरो मे पवनात्मजः इति हृदयाय नमः, ॐ क्रौंबीजात्मा नयनयोः पातु मां वानरेश्वरः इति शिरसे स्वाहा, ॐ क्षंबीजरूपी कर्णौ मे सीताशोकविनाशनः इति शिखायै वषट्,
ॐ ग्लौंबीजवाच्यो नासां मे लक्ष्मणप्राणदायकः इति कवचाय हुम्, ॐ वं बीजार्थश्च कण्ठं मे अक्षयक्षयकारकः इति नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ऐं बीजवाच्यो हृदयं पातु मे कपिनायकः इत्यस्त्राय फट् ।

दिग्बन्धन

ध्यान-

उद्यद्भानुसमानदीप्तिमनघं श्रीरामपादाम्बुजध्यानासक्तमनेकवानरभटैः संसेवितं सर्वदा ।
नादेनैव निशाचरानविरतं संतर्जयन्तं मुदा नानाभूषणभूषितं पवनजं वन्दे सुमन्दस्मितम् ॥

कवचम्-

ॐ स्फ्रेंबीजं शक्तिधृक् पातु शिरो मे पवनात्मजः ॥९॥
क्रौंबीजात्मा नयनयोः पातु मां वानरेश्वरः । क्षंबीजरूपी कर्णौ मे सीताशोकविनाशनः ॥१०॥
ग्लौंबीजवाच्यो नासां मे लक्ष्मणप्राणदायकः । वं बीजार्थश्च कण्ठं मे अक्षयक्षयकारकः ॥११॥
ऐं बीजवाच्यो हृदयं पातु मे कपिनायकः । वं बीजकीर्तितः पातु बाहू मे चाञ्जनीसुतः ॥१२॥
ह्रां बीजं राक्षसेन्द्रस्य दर्पहा पातु चोदरम् ।ह्र्सौं बीजमयो मध्यं मे पातु लङ्काविदाहकः ॥१३॥
ह्रीं बीजधरो गुह्यं मे पातु देवेन्द्रवन्दितः । रं बीजात्मा सदा पातु चोरू वारिधिलङ्घनः ॥१४॥
सुग्रीवसचिवः पातु जानुनी मे मनोजवः । पादौ पादतले पातु द्रोणाचलधरो हरिः ॥१५॥
आपादमस्तकं पातु रामदूतो महाबलः । पूर्वे वानरवक्त्रो मामाग्नेय्यां क्षत्रियान्तकृत् ॥१६॥
दक्षिणे नारसिंहस्तु नैर्ऋत्यां गणनायकः । वारुण्यां दिशि मामव्यात् खगवक्त्रो हरीश्वरः ॥१७॥
वायव्यां भैरवमुखः कौबेर्यां पातु मां सदा । क्रोडास्यः पातु मां नित्यमीशान्यां रुद्ररूपधृक् ॥१८॥
ऊर्ध्वं हयाननः पातु त्वधः शेषमुखस्तथा । रामास्यः पातु सर्वत्र सौम्यरूपी महाभुजः ॥१९॥

फलश्रुति-

इत्येवं रामदूतस्य कवचं प्रपठेत् सदा । एकादशमुखस्यैतद् गोप्यं वै कीर्तितं मया ॥२०॥
रक्षोघ्नं कामदं सौम्यं सर्वसम्पद्विधायकम् । पुत्रदं धनदं चोग्रशत्रुसंघविमर्दनम् ॥२१॥
स्वर्गापवर्गदं दिव्यं चिन्तितार्थप्रदं शुभम् । एतत् कवचमज्ञात्वा मन्त्रसिद्धिर्न जायते ॥२२॥
चत्वारिंशत्सहस्राणि पठेच्छुद्धात्मना नरः । एकवारं पठेन्नित्यं कवचं सिद्धिदं महत् ॥२३॥
द्विवारं वा त्रिवारं वा पठन्नायुष्यमाप्नुयात् । क्रमादेकादशादेवमावर्तनजपात् सुधीः ॥२४॥
वर्षान्ते दर्शनं साक्षाल्लभते नात्र संशयः । यं यं चिन्तयते चार्थं तं तं प्राप्नोति पूरुषः ॥२५॥
ब्रह्मोदीरितमेतद्धि तवाग्रे कथितं महत् ॥२६॥
इत्येवमुक्त्वा कवचं महर्षिस्तूष्णीं बभूवेन्दुमुखीं निरीक्ष्य ।
संहृष्टचित्तापि तदा तदीय पादौ ननामातिमुदा स्वभर्तुः ॥२७॥
॥ इति श्रीअगस्त्यसंहितायाम् एकादशमुखहनुमत्कवचं सम्पूर्णम् ॥

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