Tuesday, November 26, 2019

श्री महाकाल भैरवाष्टक स्तोत्र

#श्री_महाकाल_भैरवाष्टक_स्तोत्रम्।


#प्रैक्टीकल_एक्सपीरियंस।


इस स्तोत्र का पाठ करने से सभी प्रकार की नकारात्मक चीजें दूर रहती हैं।

मेरे एक कर्मकाण्डी मित्र हैं जो पूजा, कर्मकाण्ड में इसका भी उपयोग करते हैं।

उनका मानना है कि जब भी किसी व्यक्ति के लिए हम कोई वैदिक अनुष्ठान करते हैं तो उस अनुष्ठान में कुछ नकारात्मक और मलिन चीजें यजमान को परेशान करने के लिए बाधा डालती हैं।

जैसे कि मान लीजिये आप अनुष्ठान में बैठे हैं और आपकी पूजन  सामग्री की थाली ही किसी कारण गिर जाए या आसानी से ना मिलने वाला सामान टूट या बिखर जाए।

दिया जलाने के लिए गर्म घी या तेल रखा है और हाथ बाजू का अकस्मात ही धक्का लग जाने से वो बिखर जाए।

या मण्डल चक्कर पर स्थापित कलश आदि ही किसी धक्के से कारण उल्टा हो जाये और सब व्यर्थ चला जाये।


इस प्रकार की कई परेशानियां मलिन चीजों के द्वारा उत्पन्न कर दी जाती हैं।


यदि पूजा या अनुष्ठान के समय इस स्तोत्र का 1 बार पाठ किया जाए तो ये मलिन चीजें परेशानी नहीं कर पाती हैं।


आप जब भी इसका प्रयोग करें तो भैरव का सौम्य रूप ध्यान करें।

उग्र रूप का ध्यान तान्त्रिक साधनाओं के समय किया जाता है।




#स्तोत्र_पाठ -


।। श्री महाकाल भैरवाष्टक स्तोत्रम् ।।

ॐ यं यं यं यक्षरुपं दश दिशिवदनं भूमिकम्पायमानं, सं सं संहारमूर्ति शुभमुकुटजटाशेखरं चन्द्रबिम्बम् ।
दं दं दं दीर्धकायं विकृतनखमुखं
चोर्ध्वरोमं करालं, पं पं पं पापनाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।

रं रं रं रक्तवर्णँ कटकटिततनुं तीक्ष्णदंष्ट्राविशालं, घं घं घं घोरघोषं घघघघघटितं घर्घराघोरनादम् ।
कं कं कं कालरूपं धगधगधगितं ज्वालितं कामदेहं, दं दं दं दिव्यदेहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।

लं लं लं लम्बदन्तं लललललुलितं दीर्घजिह्वं करालं, धूं धूं धूं धूम्रवर्ण स्फुटविकृतमुखं भासुरं भीमरुपम् ।
रुं रुं रुं रुण्डमालं रुधिरमयमुखं ताम्रनेत्रं विशालं, नं नं नं नग्नरुपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।

वं वं वं वायुवेगं प्रलयपरिमितं ब्रह्मरुपं स्वरुपं, खं खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवननिलयं भास्करं भीमरुपम् ।
चं चं चं चालयन्तं चलचलचलितं चालितं भूतचक्रं, मं मं मं मायकायं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।

शं शं शं शंखहस्तं शशिकरधवलं पूर्णतेजः स्वरुपं, भं भं भं भावरुपं कुलमकुलकुलं मन्त्रमूर्ति स्वतत्वम् ।
भं भं भं भूतनाथं किलकिलितवश्चारु जिह्वालुलन्तं, अं अं अं अन्तरिक्षं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।

खं खं खं खड्गभेदं विषममृतमयं काल-कालान्धकारं, क्षिं क्षिँ क्षिँ क्षिप्रवेगं दह दह दहनं नेत्रसन्धीप्यमानम् ।
हूं हूं हुंकारशब्दं प्रकटितगहनं गर्जितं भूमिकम्पं, बं बं बं बाललीलं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।

सं सं सं सिद्धयोगं सकलगुणमयं देवदेवं प्रसन्नं, पं पं पं पघनाभं हरिहरवदनं चन्द्रसूर्याग्निनेत्रम् ।
यं यं यं यक्षनाथं सततभयहरं सर्वदेवस्वरुपम्, रौँ रौँ रौँ रौद्ररुपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।

हं हं हं हंसघोषं हसितकहकहाराव रौद्राट्टहासं, यं यं यं यक्षरुपं शिरसि कनकजं मौकुटं सन्दधानम् ।
रं रं रं रंङरंङ प्रहसितवदनं पिंगलं श्यामवर्णँ, सं सं सं सिद्धनाथं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।

एवं वै भावयुक्तः प्रपठति मनुजो भैरवस्याष्टकं यो, निर्विघ्नं दुःखनाशं भवति भयहरं शाकिनीनां विनाशम् ।
दस्यूनां व्याघ्रसर्पोद्भवजनितभियां जायते सर्वनाशः, सर्वे नश्यन्ति दुष्टा ग्रहगणविषमा लभ्यते चेष्टसिद्धिः ।।

।। इति श्री महाकाल भैरवाष्टक स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।।

श्री नारायण कवच

#श्री_नारायण_कवचम्


#प्रैक्टिकल_एक्सपीरियंसड है।

[ एक्सपीरियंस लिखते लिखते मैं थक जाऊँगा क्योंकि मेरे पास इसके कम से कम 15 एक्सपीरियंस हैं, जिसने यूज करना होगा वो कर लेगा।]



 #श्रीमद्भागवत_महापुराण में इसका वर्णन है।

मेरे परदादा इस कवच का हिन्दी में पाठ करते थे।

एक बार रात के समय नदी में से निकलकर एक काला जैसा आदमी उनके साथ चलता हुआ घर के कुछ दूर तक आ गया था।

लेकिन कवच पाठ के कारण उनका कुछ भी नुकसान नहीं हुआ।


मेरे 2 पड़ोसी दादू भी इसका पाठ करते हैं।

एक दादू को रात में कुत्ते जैसा कुछ बड़ा सा जानवर मिला था जो उनके आगे पीछे घूम रहा था लेकिन कवच पाठ के प्रभाव से उनका भी कुछ अहित नहीं हुआ।

मेरे पिता जी भी इस कवच का पाठ करते हैं।

जब मैं छोटा था तो सुबह गर्मियों में सुबह 3 बजे भी उठा जाता था और घूमने चला जाता था।

जंगल के एरिया में इसी कवच के कारण कभी डर ही नहीं लगा चाहे कितना भी अंधेरा हो।

छोटे मोटे साये आसपास नजर आ जाते थे, लेकिन कुछ भी अहित नहीं हुआ।


ये कवच मेरे गांव के सभी धार्मिक बुजुर्ग करते हैं क्योंकि पुराने समय में हमारे दादा परदादा एक दूसरे को ऐसे अनुभव बताते थे।


गांव के एक लड़के के साथ समस्या ये थी कि रात के टाइम जब भी वो देर से आता था तो रास्ते में कोई ना कोई बिल्ली उस पर झपट के उसको डरा देती थी।

इस कवच के पाठ के बाद उसे रात में रास्ते से आते हुए कभी कोई बिल्ली नहीं मिली।

एक मित्र जी ने भी इसका अनुभव बताया है कि वो इसका संस्कृत में पाठ करते हैं।

उनको भी पॉजिटिव रिजल्ट्स रहे हैं।

उनका कॉन्फिडेंस बढ़ जाता है इस पाठ से।




इसका संस्कृत में बहुत बड़ा पाठ है, और हिन्दी मे भी अनुवाद है।

इसमें अंगन्यास करन्यास आदि भी हैं।


लेकिन इसका एक्सपीरियंस कम से कम 10-12 बन्दों के पास से मिला है कि वो इसका मानसिक जप बिना अँगन्यास करन्यास आदि के करते हैं और उनको आजतक अन्धेरे में कुछ भी अनहोनी नहीं हुई है।

क्योंकि वो इसे भक्ति भावना से पढ़ते हैं।

#कवच_पाठ -
.
ॐ नमो नारायणाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
जल में मत्स्यावतार/कूर्मावतार से रक्षा करो।
पाताल में वामन अवतार से रक्षक हो।
जहाँ पर किला व जंगल है वहाँ नृसिंहजी रक्षा करे।
मार्ग में यज्ञ भगवान रक्षा करे।
विदेश में व पर्वत पर श्री रामचंद्रजी रक्षक हो।
योग मार्ग में दत्तात्रेयजी रक्षा करें।
देवता के अपराध से सनत्कुमार रक्षक हो।
पूजा के विध्न में नारदजी सहायक हों।
कुपथ्य से धन्वंतरि वैद्य रक्षा करें।
अज्ञान से वेदव्यासजी और अर्धम से कलकी भगवान सहयता करें। गोविंद, नारायण, बलभद्र, मधुसूदन, हृषीकेश, पद्मनाभ, गोपीनाथ, दामोदर, ईश्वर, परमेश्वर जो भगवान के नाम हैं, वे आठों पहर सब अंगों व इन्द्रियों की रक्षा करें।
बैकुण्ठनाथ का शंख, चक्र, गदा, पद्म और गरुड़ जी अनेक भय से रक्षा करें।


सिम्पल सा कवच है और बहुत जबरदस्त है छोटे बच्चे को भी याद हो जाएगा।

बच्चे को याद करवा के इसे जपने की आदत डालें, भगवान का नाम सुमिरन भी हो जाएगा और रक्षा भी हो जाएगी।


इसमें विष्णु के लगभग सभी अवतारों का स्मरण किया है।

कुछ लोग मत्स्यावतार के स्थान पर कूर्मावतार भी बोलते हैं, जल में भगवान के दोनों अवतार सहायक हैं डूबने से बच जाओगे।

वामन अवतार ने सारी धरती पाताल को माप लिया था इसलिए पाताल अर्थात गहरी जगह जैसे कुआँ आदि में गिरने से वामन अवतार द्वारा रक्षा होगी।

किला अर्थात खण्डहर जगह और जँगल अर्थात खूंखार एरिया जहाँ जानवरों द्वारा मारे जाने का भय हो वहाँ नृसिंह भगवान रक्षा करें क्योंकि आधे मनुष्य और आधे शेर हैं जो खण्डहर और जँगल में भय से मुक्ति देंगे।

यज्ञ अवतार विष्णु का ही अवतार है, साक्षात यज्ञ भी विष्णु का ही रूप है।
मार्ग कैसा भी हो, भगवान रक्षा करेंगे।

श्री राम अवतार ऐसा अवतार है जी विदेश में गया था और पर्वत भी क्रॉस किये थे।
विदेश और पर्वतों को श्री राम से बेहतर कौन जान सकता है?

दत्तात्रेय अवतार को योग मार्ग अर्थात भगवान से जुड़ने का मार्ग अथवा साधना मार्ग से जोड़ने वाला कह सकते हैं क्योंकि दत्तात्रेय अवतार एक साधक अवतार था। दत्तात्रेय के 24 गुरुओं के बारे में अवश्य पढ़ें।

देवता के अपराध अर्थात देवताओं के नियमों सम्बन्धी हुई भूल चूक हो जाये तो सनत्कुमार जो अवतार थे वो रक्षा करें।

पूजा के विघ्न में नारद जी सहायक हों, इस बात के अर्थ 2 निकल जाते हैं।

1 नारद जी पूजा में विघ्न डालने में सहायता करें।

2 पूजा में आने वाले विघ्नों से नारद जी सहायता करें।

दूसरा अर्थ सही है।

कुपथ्य अर्थात खाने पीने में होने वाली गड़बड़ी से बचाएं, किसी ने खाने में जहर ही दे दिया तो उससे भी रक्षा करे, धनवंतरी अवतार आयुर्वेद से सम्बन्धित अवतार है।

वेद व्यास में बहुत ज्ञान था इसलिए अज्ञान से वेदव्यास रक्षा करें।

आधर्म से कल्कि भगवान रक्षा करें क्योंकि जब कलयुग का अंत होगा तो भगवान का कल्कि अवतार ही अधर्म को मिटाकर धर्म की स्थापना करेगा।


भगवान के जितने भी नाम है वो सब अंगों और इंद्रियों की रक्षा करें।

विष्णु भगवान का शँख, चक्र, गदा, पदम्  और गरुड़ अन्य सभी प्रकार के भयों से रक्षा करे।




#सँस्कृत_पाठ -


न्यासः- सर्वप्रथम श्रीगणेश जी तथा भगवान नारायण को नमस्कार करके नीचे लिखे प्रकार से न्यास करें।

अगं-न्यासः-
ॐ ॐ नमः — पादयोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों पैरों का स्पर्श करें)।
ॐ नं नमः — जानुनोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों घुटनों का स्पर्श करें )।
ॐ मों नमः — ऊर्वोः (दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों पैरों की जाँघ का स्पर्श करें)।
ॐ नां नमः — उदरे ( दाहिने हाथ की तर्जनी तथा अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर पेट का स्पर्श करे )
ॐ रां नमः — हृदि ( मध्यमा-अनामिका-तर्जनी से हृदय का स्पर्श करें )
ॐ यं नमः – उरसि ( मध्यमा- अनामिका-तर्जनी से छाती का स्पर्श करे )
ॐ णां नमः — मुखे ( तर्जनी – अँगुठे के संयोग से मुख का स्पर्श करे )
ॐ यं नमः — शिरसि ( तर्जनी -मध्यमा के संयोग से सिर का स्पर्श करे )

कर-न्यासः-
ॐ ॐ नमः — दक्षिणतर्जन्याम् ( दाहिने अँगुठे से दाहिने तर्जनी के सिरे का स्पर्श करे )
ॐ नं नमः —-दक्षिणमध्यमायाम् ( दाहिने अँगुठे से दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली का ऊपर वाला पोर स्पर्श करे )
ॐ मों नमः —दक्षिणानामिकायाम् ( दहिने अँगुठे से दाहिने हाथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ भं नमः —-दक्षिणकनिष्ठिकायाम् (दाहिने अँगुठे से हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करे )
ॐ गं नमः —-वामकनिष्ठिकायाम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करे )
ॐ वं नमः —-वामानिकायाम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाँथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ तें नमः —-वाममध्यमायाम् ( बाँये अँगुठे से बाये हाथ की मध्यमा का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ वां नमः —वामतर्जन्याम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाथ की तर्जनी का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ सुं नमः —-दक्षिणाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( दाहिने हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे का ऊपरवाला पोर छुए )
ॐ दें नमः —–दक्षिणाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( दाहिने हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे का नीचे वाला पोर छुए )
ॐ वां नमः —–वामाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( बाँये हाथ की चारों अँगुलियों से बाँये अँगुठे के ऊपरवाला पोर छुए )
ॐ यं नमः ——वामाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( बाँये हाथ की चारों अँगुलियों से बाँये हाथ के अँगुठे का नीचे वाला पोर छुए )

विष्णुषडक्षरन्यासः-
ॐ ॐ नमः ————हृदये ( तर्जनी – मध्यमा एवं अनामिका से हृदय का स्पर्श करे )
ॐ विं नमः ————-मूर्ध्नि ( तर्जनी मध्यमा के संयोग सिर का स्पर्श करे )
ॐ षं नमः —————भ्रुर्वोर्मध्ये ( तर्जनी-मध्यमा से दोनों भौंहों का स्पर्श करे )
ॐ णं नमः —————शिखायाम् ( अँगुठे से शिखा का स्पर्श करे )
ॐ वें नमः —————नेत्रयोः ( तर्जनी -मध्यमा से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे )
ॐ नं नमः —————सर्वसन्धिषु ( तर्जनी – मध्यमा और अनामिका से शरीर के सभी जोड़ों — जैसे – कंधा, घुटना, कोहनी आदि का स्पर्श करे )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्राच्याम् (पूर्व की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् –आग्नेय्याम् ( अग्निकोण में चुटकी बजायें )
ॐ मः अस्त्राय फट् — दक्षिणस्याम् ( दक्षिण की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — नैऋत्ये (नैऋत्य कोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्रतीच्याम्( पश्चिम की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — वायव्ये ( वायुकोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — उदीच्याम्( उत्तर की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऐशान्याम् (ईशानकोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऊर्ध्वायाम् ( ऊपर की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — अधरायाम् (नीचे की ओर चुटकी बजाएँ )

श्री हरिः

अथ श्रीनारायणकवच


।।राजोवाच।।

यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्।।१
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्।
यथाssततायिनः शत्रून् येन गुप्तोsजयन्मृधे।।२

।।श्रीशुक उवाच।।

वृतः पुरोहितोस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु।।३
विश्वरूप उवाचधौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः।।४
नारायणमयं वर्म संनह्येद् भय आगते।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरूदरे हृद्यथोरसि।।५
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा।।६
करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादियकारन्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु।।७
न्यसेद् हृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत्।।८
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः।।९
सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्।
ॐ विष्णवे नम इति ।।१०
आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत ।।११
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापाशान् दधानोsष्टगुणोsष्टबाहुः ।।१२
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोsव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ।।१३
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ।।१४
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोsव्याद् भरताग्रजोsस्मान् ।१५
मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ।।१६
सनत्कुमारो वतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ।।१७
धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः ।।१८
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात्।
कल्किः कले कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ।।१९
मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः।
नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ।।२०
देवोsपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोsवतु पद्मनाभः ।।२१
श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ।।२२
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमासु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ।।२३
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ।।२४
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ।।२५
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि।
चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् २६
यन्नो भयं ग्रहेभ्यो भूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा ।।२७
सर्वाण्येतानि भगन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ।।२८
गरूड़ो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ।।२९
बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरूड़ और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें।।२९
सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धिन्द्रियमनः प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ।।३०
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सद्सच्च यत्।
सत्यनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपाद्रवाः ।।३१
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुद्धलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ।।३२
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ।।३३
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान् नारसिंहः।
प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन ग्रस्तसमस्ततेजाः ।।३४
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारयणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ।।३५
एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ।।३६
न कुतश्चित भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ।।३७
इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विजः।
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरूधन्वनि ।।३८
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथः स्त्रीर्भिवृतो यत्र द्विजक्षयः ।।३९
गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाक् शिराः।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ।।४०

।।श्रीशुक उवाच।।

य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ।।४१
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्यऽमृधेसुरान् ।।४२

।।इति श्रीनारायणकवचं सम्पूर्णम्।।


#विस्तृत_हिन्दी_अनुवाद -

विनियोग आदि संस्कृत में होगा, पाठ हिन्दी में किया जा सकता है।


राजा परिक्षित ने पूछा -
भगवन् ! देवराज इंद्र ने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओं की चतुरङ्गिणी सेना को खेल-खेल में अनायास ही जीतकर त्रिलोकी की राज लक्ष्मी का उपभोग किया, आप उस नारायण कवच को सुनाइये और यह भी बतलाईये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की ।।१-२


श्रीशुकदेवजी ने कहा-

परीक्षित् ! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने नारायण कवच का उपदेश दिया तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण करो ।।३

विश्वरूप ने कहा -
देवराज इन्द्र ! भय का अवसर उपस्थित होने पर नारायण कवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिए उसकी विधि यह है कि पहले हाँथ-पैर धोकर आचमन करे, फिर हाथ में कुश की पवित्री धारण करके उत्तर मुख करके बैठ जाय इसके बाद कवच धारण पर्यंत और कुछ न बोलने का निश्चय करके पवित्रता से “ॐ नमो नारायणाय” और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इन मंत्रों के द्वारा हृदयादि अङ्गन्यास तथा अङ्गुष्ठादि करन्यास करे पहले “ॐ नमो नारायणाय” इस अष्टाक्षर मन्त्र के ॐ आदि आठ अक्षरों का क्रमशः पैरों, घुटनों, जाँघों, पेट, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और सिर में न्यास करे अथवा पूर्वोक्त मन्त्र के यकार से लेकर ॐ कार तक आठ अक्षरों का सिर से आरम्भ कर उन्हीं आठ अङ्गों में विपरित क्रम से न्यास करे ।।४-६

तदनन्तर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर -मन्त्र के ॐ आदि बारह अक्षरों का दायीं तर्जनी से बाँयीं तर्जनी तक दोनों हाँथ की आठ अँगुलियों और दोनों अँगुठों की दो-दो गाठों में न्यास करे।।७

फिर “ॐ विष्णवे नमः” इस मन्त्र के पहले के पहले अक्षर ‘ॐ’ का हृदय में, ‘वि’ का ब्रह्मरन्ध्र , में ‘ष’ का भौहों के बीच में, ‘ण’ का चोटी में, ‘वे’ का दोनों नेत्रों और ‘न’ का शरीर की सब गाँठों में न्यास करे तदनन्तर ‘ॐ मः अस्त्राय फट्’ कहकर दिग्बन्ध करे इस प्रकर न्यास करने से इस विधि को जानने वाला पुरूष मन्त्रमय हो जाता है ।।८-१०

इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण इष्टदेव भगवान् का ध्यान करे और अपने को भी तद् रूप ही चिन्तन करे तत्पश्चात् विद्या, तेज, और तपः स्वरूप इस कवच का पाठ करे ।।११

भगवान् श्रीहरि गरूड़जी के पीठ पर अपने चरणकमल रखे हुए हैं, अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं आठ हाँथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष, और पाश (फंदा) धारण किए हुए हैं वे ही ओंकार स्वरूप प्रभु सब प्रकार से सब ओर से मेरी रक्षा करें।।१२

मत्स्यमूर्ति भगवान् जल के भीतर जलजंतुओं से और वरूण के पाश से मेरी रक्षा करें माया से ब्रह्मचारी रूप धारण करने वाले वामन भगवान् स्थल पर और विश्वरूप श्री त्रिविक्रमभगवान् आकाश में मेरी रक्षा करें ।।१३

जिनके घोर अट्टहास करने पर सब दिशाएँ गूँज उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियों के गर्भ गिर गये थे, वे दैत्ययुथपतियों के शत्रु भगवान् नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें ।।१४

अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठा लेने वाले यज्ञमूर्ति वराह भगवान् मार्ग में, परशुराम जी पर्वतों के शिखरों और लक्ष्मणजी के सहित भरत के बड़े भाई भगावन् रामचंद्र प्रवास के समय मेरी रक्षा करें।।१५

भगवान् नारायण मारण – मोहन आदि भयंकर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से मेरी रक्षा करें ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान् दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और त्रिगुणाधिपति भगवान् कपिल कर्मबन्धन से मेरी रक्षा करें ।।१६

परमर्षि सनत्कुमार कामदेव से, हयग्रीव भगवान् मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद सेवापराधों से और भगवान् कच्छप सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें ।।१७

भगवान् धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्र भगवान् ऋषभदेव सुख-दुःख आदि भयदायक द्वन्द्वों से, यज्ञ भगवान् लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टों से और श्रीशेषजी क्रोधवशनामक सर्पों के गणों से मेरी रक्षा करें ।।१८

भगवान् श्रीकृष्णद्वेपायन व्यासजी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें धर्म-रक्षा करने वाले महान अवतार धारण करने वाले भगवान् कल्कि पाप-बहुल कलिकाल के दोषों से मेरी रक्षा करें ।।१९

प्रातःकाल भगवान् केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ जाने पर भगवान् गोविन्द अपनी बांसुरी लेकर, दोपहर के पहले भगवान् नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान् विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें ।।२०

तीसरे पहर में भगवान् मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें सांयकाल में ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद हृषिकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्ध रात्रि के समय अकेले भगवान् पद्मनाभ मेरी रक्षा करें ।।२१

रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान् जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में कालमूर्ति भगवान् विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें ।।२२

सुदर्शन ! आपका आकार चक्र ( रथ के पहिये ) की तरह है आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् की प्रेरणा से सब ओर घूमते रहते हैं जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूस को जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रुसेना को शीघ्र से शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये ।।२३

कौमुद की गदा ! आपसे छूटने वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है आप भगवान् अजित की प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ इसलिए आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहों को अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओं को चूर – चूर कर दिजिये ।।२४

शङ्खश्रेष्ठ ! आप भगवान् श्रीकृष्ण के फूँकने से भयंकर शब्द करके मेरे शत्रुओं का दिल दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने प्राणियों को यहाँ से तुरन्त भगा दीजिये ।।२५

भगवान् की श्रेष्ठ तलवार ! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है आप भगवान् की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दिजिये। भगवान् की प्यारी ढाल ! आपमें सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आँखे बन्द कर दिजिये और उन्हें सदा के लिये अन्धा बना दीजिये ।।२६

सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छल तारे ) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ोंवाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हो और जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों – वे सभी भगावान् के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जायें ।।२७-२८

बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरूड़ और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें।।२९

श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि , इन्द्रिय , मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ।।३०

जितना भी कार्य अथवा कारण रूप जगत है, वह वास्तव में भगवान् ही है इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायें ।।३१

जो लोग ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान् का स्वरूप समस्त विकल्पों से रहित है-भेदों से रहित हैं फिर भी वे अपनी माया शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं यह बात निश्चित रूप से सत्य है इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्रीहरि सदा -सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें ।।३२-३३

जो अपने भयंकर अट्टहास से सब लोगों के भय को भगा देते हैं और अपने तेज से सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान् नृसिंह दिशा -विदिशा में, नीचे -ऊपर, बाहर-भीतर – सब ओर से हमारी रक्षा करें ।।३४

देवराज इन्द्र ! मैने तुम्हें यह नारायण कवच सुना दिया है इस कवच से तुम अपने को सुरक्षित कर लो बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य – यूथपतियों को जीत कर लोगे ।।३५

इस नारायण कवच को धारण करने वाला पुरूष जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता है अथवा पैर से छू देता है, तत्काल समस्त भयों से से मुक्त हो जाता है।। ३६

जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत, पिशाच आदि और बाघ आदि हिंसक जीवों से कभी किसी प्रकार का भय नहीं होता ।।३७

देवराज! प्राचीनकाल की बात है, एक कौशिक गोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योगधारणा से अपना शरीर मरूभूमि में त्याग दिया ।।३८

जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उसके उपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमान पर बैठ कर निकले ।।३९

वहाँ आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमान सहित आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़े इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्हें बालखिल्य मुनियों ने बतलाया कि यह नारायण कवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मण देव की हड्डियों को ले जाकर पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को चले गये ।।४०


श्रीशुकदेवजी कहते हैं -

परिक्षित् जो पुरूष इस नारायण कवच को समय पर सुनता है और जो आदर पूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदर से झुक जाते हैं और वह सब प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है ।।४१

परीक्षित् ! शतक्रतु इन्द्र ने आचार्य विश्वरूपजी से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमि में असुरों को जीत लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मी का उपभोग करने लगे।

।।इति श्रीनारायणकवचं सम्पूर्णम्।।

Wednesday, November 6, 2019

नजर लगना

#नजर_लगना।

आपकी तुलना स्वयं से करने पर जो खुद को नीचा पाता है,
उसी के  #नकारात्मक_भावों_की_ऊर्जा आपको #नुक्सान कर देती है।

वो आपको #टोके_बिना_रह_नहीं_पाता।

जब तक आपकी पर्सनल लाइफ में घुस के सब कुछ पता ना कर ले और कुछ बवाल होता ना देख ले तब तक उनके #कलेजे_को_ठण्डक_भी_नहीं_पड़ती।


[1] मेरा एक दोस्त है उसका एक रिश्तेदार उससे पूछता रहता था कि कितना कमा लेते हो?

दोस्त कहता था कि ऊपर वाले कि दया से रोटी पानी ठीक चला है।


एक दिन दोस्त बैंक से पासबुक पर एण्ट्री करवा के घर आया और पासबुक अभी टेबल पर ही रखी थी।

वही बदतमीज रिश्तेदार संयोग से घर में मेहमान बन के आया था।

उसने जैसे ही टेबल पर पासबुक देखी तो बिल्कुल वैसे उस पासबुक पर टूट पड़ा जैसे कुत्ता हड्डी पर टूट पड़ता जी।

बिना पूछे उसकी पासबुक टेबल से उठाई और खोल के बैठ गया।

[ नोट - बिना किसी आवश्यक कारण कभी किसी की #इनकम पूछना ही एक प्रकार की बदतमीजी है।]

पासबुक देखकर उसकी आँखें फ़टी की फटी रह गई।

( अंदर से पता नहीं कितनी जलन हो गई थी उसको।)

उसने टोक दिया कि आजकल बहुत पैसा कमा रहे हो।

#नजर_लग_गई।


उसके बाद उस दोस्त बीमार हुआ और उसका पैसा बीमारी में लग गया।

जब उससे वो रिश्तेदार कुछ दिनों बाद मिला तो बोला - काफी बीमार हो गया था, बड़ा खर्च हुआ होगा।

अब कितने बचे हैं अकाउंट में?

दोस्त की खराब हालत देखकर #पड़_गई_कलेजे_में_ठण्डक।


आर्टिकल पढ़ने वाले कुछ नमूने भी इस कैटागिरी में शामिल हैं।



[2] एक लड़की ने बहुत सुन्दर ड्रैस खरीदी थी, फंक्शन में एक ऐसी ही एक जलने वाली औरत ने टोक दिया - बड़ी पैसे वाली हो गई हो, बहुत महंगे कपड़े पहनने लगी हो।

थोड़ी देर बाद लड़की की ड्रैस एक कील से फँसी और उधड़ गई।

वो औरत बहुत हँसी, जैसे उसके #कलेजे_को_ठण्डक_पड़_गई।


[3] छोटे बच्चों को भी ऐसे ही नजर लगती है।

कोई उन बच्चों को ही बहुत जलन वाली भावना से देखता है, कभी प्यार से गाल नोचते हैं, कभी चेहरे पर प्यार से थप्पड़ मारते हैं।

ये हरकतें बहुत नकारात्मक होती हैं।

सामने वाले के मन मे जलन की भावना होती है जो जैसे तैसे उसे नोचने और थप्पड़ मारने से रोके रखता/रखती है, इसलिए धीरे धीरे ही थप्पड़ मार देते हैं, उनका वश चले तो बच्चों को उठा के पटक दें।

बहुत देर तक बच्चों को कोई नकारात्मक सोच के साथ घूरता/घूरती रहती है तो भी नजर लगती है क्योंकि नकारात्मक ऊर्जा का फ्लो उस बच्चे को तरफ बनता है।


आप खुद सोच लें कि जब आपके माता पिता आपको देखते हैं तो आपको कितना अच्छा लगता है।

लेकिन जब कोई पड़ोसी शक की नजर से देखे तो आपको कैसा लगता है?

गंदा फील हो जाता है।

आपका लाइफ़ पार्टनर आपको प्यार देखता है तो उस नजर से आपको कैसा फील होता है?


फील होने का कारण है उसके अन्दर से निकलने वाली सकारात्मक/नकारात्मक ऊर्जा का भाव आपकी तरफ होना।


बच्चों को नजर लगती है।

कोई टोक दे, इतना छोटा है बहुत वजन है इसका, बहुत दूध पीता होगा।

उसी दिन से बच्चा दूध पीना कम कर देता है और कई बार तो स्त्री का दूध भी सूख जाता है।

बच्चा रोता रहता है, दूध नहीं पीता, बीमार हो जाता है, कमजोर हो जाता है।



नजर हमेशा उसी की लगती है जिसकी सोच गन्दी होती है।


आपके माता पिता आपसे पूछते हैं कि आप कितना कमाते हो तो आपकी कमाई में कभी कमी नहीं आएगी।


उपरोक्त प्रकार के नमूने ने जिस दिन पूछ लिया तो समझो पैसा खत्म होने वाला है।


10-12 साल पहले की बात है मेरे पड़ोस के एक आदमी को बैंक से कोई चिट्ठी आई थी तओ डाकिये ने एक गांव वाले से कहा कि मुझे जल्दी है, उसके घर मेये चिट्ठी दे देना।


वो आदमी चिट्ठी खोल के बैठ गया।


उसके बाद उसने वो चिट्ठी मेरे पास दी थी कि अपने पड़ोसी को दे देना।

पड़ोसी मुझे पूछने लगा की ये पैकिंग तुमने फाड़ी है क्या?

मैंने बोल दिया कि उस आदमी ने दी मेरे पास इसी हालत में, मैंने तो झाँका भी नहीं।


उस आदमी ने गाँव मे बात फैला दी कि इस व्यक्ति ने बैंक से इतना लोन लिया था तो उसको जमीन कुर्क करने की वॉर्निंग आई है।


और एक बात मैंने ये देखी है कि वो आदमी आजक वैसा ही है और कभी सुखी नहीं रहता है, उसके जीवन में कोई उन्नति नहीं है, सिर्फ जलन ही जलन भरी पड़ी है, उसके साथ आप बैठो तो आपको सारा दिन दूसरों की सैलरी जमीन रहन सहन की बुराई करता मिलेगा।


एक बार उसने किसी को गाय दुहते हुए देख लिया और टोक दिया कि आपकी गाय तो बड़ा दूध देती है।

खूब पैसा कमाओगे इससे।

दूसरे दिन गाय ने दूध आधा भी नहीं दिया।

जितना  नकारात्मक आदमी/औरत होगा उतना ही जल्दी असर उसकी नकारत्मकता हो जाएगा।


इस आर्टिकल को पढ़ने वाले आधे से ज्यादा पीड़ित लोगों को लगेगा कि मैं उनकी कहानी और उनके पड़ोसियों की मनहूसियत लिख के बैठ गया हूँ।

Monday, November 4, 2019

देव्या: कवचम्

#देव्या: #कवचम्


#प्रैक्टिकल_एक्सपीरियंस


#दुर्गा_सप्तशती में इस कवच का बारे में वर्णित है।

इसका असर मैंने देखा है।

पूजा के समय जाप करें, पर्याप्त है।

अनुभव का लिंक -

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2393247870892416&id=100006216785535


#देवीकवच को आप हिन्दी मे भी पढ़ सकते हैं और संस्कृत में भी।

लेकिन इसका विनियोग संस्कृत में ही होगा।


॥अथ श्री देव्याः कवचम्॥

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

।।ॐ नमश्‍चण्डिकायै।।

मार्कण्डेय उवाच

ॐ यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥

ब्रह्मोवाच

अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
माहेश्‍वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
श्‍वेतरुपधरा देवी ईश्‍वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥
दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खङ्‍गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्‍वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्‍वरी॥२८॥
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्‍वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्‍चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्‍वरी तथा॥३३॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्‍च पित्तं च मुकुटेश्‍वरी॥३४॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्‍वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्‍चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
तत्र तत्रार्थलाभश्‍च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्‍चितम्।
परमैश्‍वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः। ४७॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्‍चैव जलजाश्‍चोपदेशिकाः॥४९॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्‍च महाबलाः॥५०॥
ग्रहभूतपिशाचाश्‍च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥
लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥
इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।


#हिन्दी_अनुवाद -


महर्षि मार्कण्डेयजी बोले – हे पितामह! संसार में जो गुप्त हो और जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करता हो और जो आपने आज तक किसी को बताया ना हो, वह कवच मुझे बताइए। श्री ब्रह्माजी कहने लगे – अत्यन्त गुप्त व सब प्राणियों की भलाई करने वाला कवच मुझसे सुनो, प्रथम शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघंटा, चौथी कूष्माण्डा, पाँचवीं स्कन्दमाता। छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्री, आठवीं महा गौरी, नवीं सिद्धि दात्री यह देवी की नौ मूर्त्तियाँ, “नवदुर्गा” कहलाती हैं। आग में जलता हुआ, रण में शत्रु से घिरा हुआ, विषम संकट में फँसा हुआ मनुष्य यदि दुर्गा के नाम का स्मरण करे तो उसको कभी भी हानि नहीं होती। रण में उसके लिए कुछ भी आपत्ति नहीं और ना उसे किसी प्रकार का दुख या डर ही होता है।

हे देवी! जिसने श्रद्धा पूर्वक तुम्हारा स्मरण किया है उसकी वृद्धि होती है। और जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करने वाली हो। चामुण्डा प्रेत पर, वाराही भैंसे पर, रौद्री हाथी पर, वैष्णवी गरुड़ पर अपना आसन जमाती है। माहेश्वरी बैल पर, कौमारी मोर पर, और हाथ में कमल लिए हुए विष्णु प्रिया लक्ष्मी जी कमल के आसन पर विराजती है। बैल पर बैठी हुई ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित ब्राह्मी देवी हंस पर बैठती है और इस प्रकार यह सब देवियाँ सब प्रकार के योगों से युक्त और अनेक प्रकार के रत्न धारण किये हुए है।

भक्तों की रक्षा के लिए संपूर्ण देवियाँ रथ मेंबैठी तथा क्रोध में भरी हुई दिखाई देती हैं तथा चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, भाला और त्रिशूल एवं उत्तम शारंग आदि शस्त्रों को दैत्यों के नाश के लिए और भक्तों की रक्षा करने के लिए और देवताओं के कल्याण के लिए धारण किया है। हे महारौद्रे! अत्यन्त घोर पराक्रम, महान बल और महान उत्साह वाली देवी! तुमको मैं नमस्कार करता हूँ। हे देवि! तुम्हारा दर्शन दुर्लभ है तथा आप शत्रुओं के भय को बढ़ाने वाली हैं।

हे जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऎंन्द्री मेरी रक्षा करें, अग्निकोण में शक्ति, दक्षिण कोण में वाराही देवी, नैऋत्यकोण में खड्ग धारिणी देवी मेरी रक्षा करें। वारुणी पश्चिम दिशा में, वायुकोण में मृगवाहिनी, उत्तर में कौमारी और ईशान में शूलधारिणी देवी मेरी रक्षा करें, ब्राह्मणी ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करें और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करें और इसी प्रकार शव पर बैठ  चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें।

जया देवी आगे, विजया पीछे की ओर, अजिता बायीं ओर, अपराजिता दाहिनी ओर मेरी रक्षा करें, उद्योतिनी देवी शिखा की रक्षा करें तथा उमा शिर में स्थित होकर मेरी करें, इसी प्रकार मस्तक में मालाधारी देवी रक्षा करें और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करें। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा, नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे, नेत्रों के मध्य में शंखिनी देवी और द्वारवासिनी देवी कानों की रक्षा करें, सुगंधा नासिका में और चर्चिका ऊपर के होंठ में, अमृतकला नीचे के होंठ की, सरस्वती देवी जीभ की रक्षा करे, कौमारी देवी दाँतों की और चण्डिका कण्ठ प्रदेश की रक्षा करे, चित्रघण्टा गले की घण्टी की और महामाया तालु की रक्षा करे, कामाक्षी ठोढ़ी की, सर्वमंगला वाणी की रक्षा करे।

भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी पीठ के मेरुदण्ड की रक्षा करें, कण्ठ के बाहरी भाग की नील ग्रीवा और कण्ठ की नली की नलकूबरी रक्षा करे, दोनो कन्धों की खड्गिनी और वज्रधारिणी मेरी दोनों बाहों की रक्षा करे, दण्डिनी दोनों हाथों की और अम्बिकादेवी समस्त अंगुलियों की रक्षा करे, शूलेश्वरी देवी संपूर्ण नखोंकी, कुलेश्वरी देवी मेरी कुक्षि की रक्षा करे, महादेवी दोनों स्तनों की, शोक विनाशिनी मन की रक्षा करे, ललितादेवी ह्रदय की, शूलधारिणी उदर की रक्षा करे।

कामिनी देवी नाभि की गुह्येश्वरी गुह्य स्थान की, पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे, सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने वाली महाबलादेवी दोनों जंघाओं की रक्षा करे, विन्ध्यावासिनी दोनों घुटनों की और तैजसी देवी दोनों पाँवों के पृष्ठ भग की, श्रीधरी पाँवों की अंगुलियों की, स्थलवासिनी तलुओं की, दंष्ट्रा करालिनीदेवी नखों की, ऊर्ध्वकेशिनी केशों की, बागेश्वरी वाणी की रक्षा करे, रोमाबलियों के छिद्रों की कौबेरी और त्वचा की बागेश्वरी देवी रक्षा करे। पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी की रक्षा करे।

कालरात्री आँतों की रक्षा करें, मुकुटेश्वरी देवी पित्त की, पद्मावती कमलकोष की, चूड़ामणि कफ की रक्षा करें, ज्वालामुखी नसों के जल की रक्षा करें, अभेद्यादेवी शरीर के सब जोड़ो की रक्षा करें, बह्माणी मेरे वीर्य की, छत्रेश्वरी छाया की और धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन तथा बुद्धि की रक्षा करें। प्राण अपान, समान, उदान और व्यान की वज्रहस्ता देवी रक्षा करें, कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे, रस, रूप, गन्ध शब्द और स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी मेरी रक्षा करें तथा मेरे सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें।

आयु की रक्षा बाराही देवी करे, वैष्णवी धर्म की तथा चक्रिणी देवी मेरी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन, विद्या की रक्षा करे, इन्द्राणी मेरे शरीर की रक्षा करे और हे चण्डिके! आप मेरे पशुओं की रक्षा करिये। महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करे, मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षमाकरी देवी रक्षा करे, राजा के दरबार में महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी चारों ओर से मेरी रक्षा करे।

जो स्थान रक्षा से रहित हो और कवच में रह गया हो उसकी पापों का नाश करने वाली जयन्ती देवी रक्षा करे। अपना शुभ चाहने वाले मनुष्य को बिना कवच के एक पग भी कहीं नहीं जाना चाहिए क्योंकि कवच रखने वाला मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता हैं, वहाँ-वहाँ उसे अवश्य धन लाभ होता है तथा विजय प्राप्त करता है। वह जिस अभीष्ट वस्तु की इच्छा करता है वह उसको इस कवच के प्रभाव से अवश्य मिलती हैऔर वह इसी संसार में महा ऎश्वर्य को प्राप्त होता है, कवचधारी मनुष्य निर्भय होता है, और वह तीनों लोकों में माननीय होता है, देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी कठिन है।

जो नित्य प्रति नियम पूर्वक तीनों संध्याओं को श्रद्धा के साथ इसका पठन-पाठन करता है उसे देव-शक्ति प्राप्त होती है, वह तीनों लोकों को जीत सकता है तथा अकाल मृत्यु से रहित होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है, उसकी लूता, चर्मरोग, विस्फोटक आदि समस्त व्याधियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं और स्थावर, जंगम तथा कृत्रिम विष दूर होकर उनका कोई असर नहीं होता है तथा समस्त अभिचारक प्रयोग और इस तरह के जितने यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र इत्यादि होते हैं इस कवच के हृदय में धारण कर लेने पर नष्ट हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त पृथ्वी पर विचरने वाले भूचर, नभचर, जलचर प्राणी उपदेश मात्र से, सिद्ध होने वाले निम्न कोटि के देवता, जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुल देवता, कण्ठमाला आदि डाँकिनी शाँकिनी अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाँकिनियाँ, गृह, भूत, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस वैताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी उस मनुष्य को जिसने कि अपने हृदय में यह कवच धारण किया हुआ है, देखते ही भाग जाते हैं। इस कवच के धारण करने से मान और तेज बढ़ता है।

जो मनुष्य इस कवच का पाठ करके उसके पश्चात सप्तशती चंडीका का पाठ करता है उसका यश जगत में विख्यात होता है, और जब तक वन पर्वत और काननादि इस भूमण्डल पर स्थित हैं, तब तक यहाँ पुत्र पौत्र आदि सन्तान परम्परा बनी रहती है, फिर देहान्त होने पर मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है जो देवताओं के लिए भी कठिन है और अन्त में सुन्दर रूप को धारण करके भगवान शंकर के साथ आनन्द करता हुआ परम मोक्ष को प्राप्त होता है।

विहग योग अथवा पक्षी योग

#विहग_योग_अथवा_पक्षी_योग


जब सभी ग्रह #दशम_भाव और #चतुर्थ_भाव में हो
तो विहग योग अथवा पक्षी योग बनता है।

इस योग की आकृति उड़ते पक्षी के फैले हुए पँखों जैसी होती है
इसलिए इसे विहग या पक्षी योग कहते हैं।

इस योग में पैदा हुआ जातक बहुत अच्छा जीवन जीता है।

बड़ा अधिकारी बनता है तथा राज समाज
अथवा राजनीति आदि में सम्मान पाता है।

सरकारी अधिकारियों से सम्पर्क अच्छे रहते हैं,
सरकारी जॉब भी कर सकते हैं
या अपना व्यवसाय भी कर सकते हैं।

जातक यदि गरीब घर में भी पैदा हुआ हो
तो भी अपनी मेहनत के बल पर बड़ी सफलताएं पाता है।



इन सफलताओं का कारण है कि सभी ग्रह सुख भाव और कर्म भाव मे होकर दृष्टि सम्बन्ध बनाते हैं और चतुर्थ तथा दशम भाव पर बहुत अधिक प्रभाव डालते हैं।

केन्द्र त्रिकोण भावों के स्वामी केंद्र में आ जाते हैं और कर्म नियन्त्रक ग्रह भी केन्द्र में आ जाते हैं।

जिसके कारण सफलता बढ़ती है।

कर्म नियन्त्रक ग्रह -

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2215570288660176&id=100006216785535


प्रस्तुत कुण्डली एक बहुत बड़े #बिजनसमैन की है जिनका #बच्चपन_हार्ड_कंडीशन्स में बीता है।

फैमली में #खेती_बाड़ी का काम था।

अभी के एक #बहुत_बड़े_होटल_के_मालिक हैं।

इनके #भाई_जी के साथ मिलकर इनका बिजनस चलाया है और #पत्नी स्वयं एक #राजनीति_में_बड़े_पद_पर_प्रतिष्ठित_महिला रही हैं।


कुण्डली के कुछ पॉइंट्स-

जन्म - 5 अप्रैल 1981
समय - 12:11 बजे
स्थान - उदयपुर

[1] मिथुन लग्न में 2 ग्रह चतुर्थ भाव में तथा 5 ग्रह दशम भाव में होकर विहग योग बना रहे हैं।

[2] दशम भाव में सूर्य मंगल दिग्बली होने के कारण करियर में बहुत बड़ी कामयाबी दर्शा रहे हैं।

सूर्य तृतीय भाव का स्वामी है जिसके कारण अपने भाई के सहयोग तथा अपनी मेहनत से करियर में बड़ी सफलता हासिल की।

[3] उच्च राशि में शुक्र का मालव्य राजयोग तथा बुश शुक्र का नीचभंग राजयोग और लक्ष्मी नारायण योग बहुत बडा सफलता दर्शा रहे हैं।

[4] भाग्य का स्वामी शनि और दशम भाव का स्वामी बृहस्पति चतुर्थ भाव केंद्र में रहकर धर्मकर्माधिपत्य राजयोग बना रहे हैं।

[5] सप्तम भाव का स्वामी बृहस्पति भाग्य भाव के स्वामी शनि के साथ केन्द्र में होने से पत्नी का बड़ा लाभ दिखा रहा है जिसके कारण पत्नी राजनीति में रख प्रतिष्ठित महिला रह चुकी है।

[6] इस कुण्डली के कर्म नियन्त्रक ग्रह चन्द्रमा और शनि केन्द्र में दृष्टि सम्बन्ध बनाये हुए हैं और इनके साथ बाकी 5 ग्रह भी प्रभावित हैं।

जब भी दोनों कर्म नियन्त्रक ग्रह केन्द्र में होकर आपस में दृष्टि सम्बन्ध बनाते हैं तो जातक असाधारण सफलता पाता है।

राहु केतु इन कुण्डली में दशम और चतुर्थ भाव को खराब नहीं कर रहे हैं इसलिए कामयाबी बड़ी हो गई हैं

अतः इस कुण्डली से इनके जीवन की कामयाबी बहुत स्पष्ट दिखती है।

किसी भी जातक की कुंडली में यदि विहग योग बने और केतु दशम में हो तो बहुत ज्यादा संघर्ष करने पर सफलता मिलती है।

यदि इस योग में राहु दशम भाव में आ जाये तो उस जातक की कामयाबी अत्याधिक संघर्ष करने के बाद असाधरण कामयाबी हो जाएगी।

Sunday, November 3, 2019

तान्त्रिक क्रिया द्वारा भेजे गए, स्वेच्छा से आये हुए और स्वयं की गलती से खुद को चिपकाए हुए भूत प्रेत अथवा चुड़ैल के व्यवहार में अन्तर होता है।

#तान्त्रिक_क्रिया_द्वारा_भेजे_गए,
#स्वेच्छा_से_आये_हुए_और_स्वयं_की_गलती_से_खुद_को_चिपकाए_हुए_भूत_प्रेत_अथवा_चुड़ैल_के_व्यवहार_में
#अन्तर_होता_है।


#करैक्टर_में_घुस_जाएं।

ऐसा समझें कि ये सारी घटना आपके साथ हुई है।


एक रात की बात है।

ऐसा लग रहा था कि मेरे कमरे की खिड़की से कोई औरत मुझे बहुत गौर से घूर रही है।

3 दिन तक ऐसा महसूस होता रहा।

मैं खिड़की का पर्दा बन्द नहीं करता हूँ सोते वक्त।

3 दिन बाद रात 2 बजे के आसपास मैं अपना ऑनलाइन काम कर के सो रहा था।

ढाई बजे के आसपास कच्ची नींद में मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई औरत मेरे बाईं तरफ आकर सो गई और अपनी दोनों बाहें मेरे गले मे डालकर सो गई।

बन्द आँखों से ही वो मुझे नजर आने लगी।

[ जब भी कोई किसी भूत प्रेत के इफैक्ट में आने लगता है तो उसे महसूस होने लगता है कि कोई उसके आसपास है, और आँखें बंद होने पर भी नजर आने लगता है। ]


बन्द आंखों से ही मुझे वो साफ साफ दिखने लगी।

चेहरा अच्छी तरह से नजर ही नहीं आ रहा था क्योंकि उसने जब दोनों बाहें मेरे गले में डाली थी तो अपना चेहरा मेरी गर्दन के पास रखा था और अपने बाल मेरे चेहरे पर फैंक दिए थे।

जब उसके शरीर को देखने लगा तो निर्वस्त्र थी।

कमर के ऊपर वाले जिससे में काले रंग जैसा कुछ फटा हुआ पहना था जिसे कपड़ा भी नहीं कह सकते।

कमर के नीचे कुछ नहीं पहना था।
[शायद घर से आते वक्त पहनना भूल गई थी।]

घुटनो से नीचे उसकी टाँगें थी ही नहीं या शायद मुझे नजर नहीं आ रही थी।

दोनों टाँगें मोटी पतली थी।


ऐसा लगने लगा जैसे कि वो धीरे धीरे मुझे कसकर पकड़ने लगी थी।

उसने एक टांग मेरे ऊपर रखना चाही।

उसकी ऑर्गन पर मेरी नजर पड़ी तो बहुत ही गन्दा लगा, अजीब सी चिढ़ आ गई।

उसी वक़्त मैंने उसकी ऑर्गन को अपने बाएँ हाथ से ढक दिया और एक स्तुति पढ़ के उसे धक्का मार के खुद को छुड़ा दिया।


मैंने तुरन्त लाइट ऑन की तो कमरे में कोई नहीं था।

रात की खामोशी में सिर्फ कीड़े मकोड़ों की आवाजें ही जँगल की तरफ से आ रही थी।

मैंने सोचा शायद कच्ची नींद वाला सपना था।

ये सोचकर सो गया।


भूतों प्रेतों को देखने के एक्सपीरियंस तो बच्चपन से हैं इसलिए डरने का तो मतलब ही नहीं रह जाता है।

जिस बन्दे को खुद ही भूत बुलाने की आदत पड़ गई हो, उसको क्या डर होगा?

2012 में सपने में कर्णपिशाचिनी बुलाई थी कई बार।


ये चीजें नींद में ही अटैक करती हैं।

नींद आते ही दबोच लेती हैं।


[ अगर किसी नॉर्मल से लड़के के बिस्तर पर ऐसे चुड़ैल आकर चिपक जाए तो शायद डर के मारे चीखें निकल जाती। ]


एक लड़के के पड़ोस में किसी लड़की ने फाँसी लगाई थी।

उसकी आत्मा भटकी थी और वो उस लड़के को नींद आते ही दबोच लेती थी।

लड़का ने दिन को सोना शुरू किया और रात में किताबें पढ़ के जागता था।



अगले दिन मैंने अपने उन मित्र जी को फोन किया जिन्होंने भूत साधना की है।

उन मित्र के साथ भी ऐसा हुआ था कि पड़ोस में जहर खा कर मरी हुई लड़की की आत्मा उन पर चढ़ जाती थी और शारीरिक सम्बन्ध बनाने की कोशिश करती थी।


मैंने कहा कि भाई जी कल रात मेरे बिस्तर पर चुड़ैल आई थी मेरे ख्याल से।

ये अपने भूत से पूछ लीजिये कि वो भ्रम वाला सपना था या हकीकत थी, आगे चुड़ैल थी तो क्यों आई थी?

अपने आप आई थी या किसी ने भेजा था?


उन्होंने अपने भूत से पूछ कर कहा कि भाई वो चुड़ैल ही थी और 3 दिन से मजे लेने के चक्कर में थी।

घर के दाईं तरफ के चौथे घर में भी गई थी, वहाँ से आई थी।

अपने आप आई थी और 2 दिन बाद फिर से आएगी।


[ किसी औरत को नाहरसिंह चिपक जाता है तो वो उसके साथ सम्बन्ध बनाता है, ऐसा उस औरत को फील हो जाता है, चाहे तो पूछ लेना किसी ऐसी पीड़ित और से।

ये भूत प्रेत पिशाच चुड़ैल अपने ऑपोजिट जैण्डर के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं। ]


जब मैंने सुना 2 दिन बाद फिर आएगी तो मैंने सोच लिया कि आने दो उसको, देखता हूँ क्या करती है?

[वैसे उसके आने के नाम से कुछ फटा फटा सा महसूस होने लगा था ।]


मैं यही सोच रहा था कि 4 दिन पहले ऐसा क्या हुआ जो ये चुड़ैल मेरे पे मर मिटी।


फिर याद आया कि घर से चौथा घर छोड़ के जंगल शुरू हो जाता है।

एक लड़के तान्त्रिक टाइप के 19-20 साल के लड़के के साथ डिसकस कर रहा था जंगल में जाकर भूत प्रेत सम्बन्धित।

तभी मेरे उन भूत प्रेत वाले मित्र जी का वीडियो कॉल आया।

उन्होंने उस लड़के को मेरे साथ देखते ही बोल दिया -

अबे पीछे देख लम्बे बालों वाला काले कपड़े वाला प्रेत चिपका रखा जाए इसने शमशान में जा जा के।

इसके साथ 1 नहीं 3-4 प्रेत हैं।

शमशान में जाकर खून निकाला है इसने अपना, मांस मदिरा चढ़ाने गया था,
किसी चीज का ज्ञान नहीं था सिर्फ मांस मदिरा चढा के खून के छींटे शमशान में गिराए हैं, उसी दिन से इसको भूत चिपक गए हैं।

अभी भी इसको वो दिखाई देते हैं और इससे खून मांगते हैं।

वो इसके सामने काली और भैरो बन के आ जाते हैं रात को और बोलते हैं हमें भोग दो, हम तुम्हारा काम करेंगे।

ये प्रेत बहुरूपिये होते हैं, किसी के सामने कुछ भी बन के खड़े हो सकते हैं।

उसने अपनी गलती से भूत प्रेत चिपकाए हैं जो उसे इसी भ्रम में रखते हैं कि वो देवी का भक्त है और देवी देवता उसके सामने आते हैं।

मित्र जी ने 3 साल पुरानी बात भी उसको देखकर ओपन कर दी थी कि एक बहस के कारण उस लड़के ने मेरे ऊपर प्रेत भेज दिया था।


लड़का कुछ नहीं बोल पाया ये बात सुनने के बाद।



उसी के भूत प्रेत में से वो चुड़ैल मेरे साथ अट्रैक्ट हो गई शायद।


वैसे मेरे पास जल्दी नहीं आई, सिर्फ घूरती रही 3 दिन।

जिस दिन वो कमरे में घुस गई, उस दिन मेरा चन्द्र बल कमजोर था।

मैक्सिमम आप पर ये चीजें सोई हुई हालत में अटैक करती हैं और उस समय गोचर में अक्सर आपका चन्द्र बल कमजोर होता है।

मैक्सिम तब जब चन्द्रमा गोचर में अपनी राशि से अष्टम में हो या राहु, केतु, शनि के प्रभाव में हो।


मैंने भी तैयारी शुरु कर दी 2 दिन बाद की।


अपने पूरे कमरे की सफाई कर दी। ( भूतों प्रेतों को सफाई बिल्कुल पसन्द नहीं होती, इसलिए जब भी ऐसा अनुभव हो तो पूरे कमरे की तुरन्त सफाई कर डालो। )

दोस्त के कहे अनुसार जब चुड़ैल दोबारा आने वाली थी उस दिन नाखून वगैरह काट के सब बढ़िया कर दिया।

एक दिन के पहने गए कपड़े भी धो के रख दिये।


रात को बिस्तर पर बैठ के सिर्फ 3 चीजें पढ़ी-

[1] हनुमान चालीसा।

[2] नृसिंह कवच।

[3] दुर्गा देवी कवच। ( जल्द ही इसको पोस्ट करूँगा।)

और जल अभिमंत्रित कर के सारे कमरे खिड़की दरवाजे पर छिड़क दिया।


आराम से टेंशन फ्री होकर इंतजार करने लगा कि कब आएगी वो?


खिड़की पर नजर थी कि कोई झाँके तो सही।


12:30 बजे के आसपास घर के पीछे खिड़की की सीध में हाइट से कुछ सामान गिरने की आवाज आई।


2 मिनट बाद फिर वही आवाज हुई सामान गिरने की, जबकि वहाँ कुछ भी नहीं था।

अगर उतने जोर से कुछ गिरता तो पड़ोसी जरूर जाग जाते।


शायद चुड़ैल सच में आ गई थी लेकिन कवचों और हनुमान चालीसा के पाठ के प्रभाव से अन्दर नहीं आ पाई औए खिड़की पर आते ही करन्ट के झटके लग गए होंगे।


उसके शायद 1 घण्टे बाद मैं छत पर टहलता रहा कम से कम 20 मिनट कि अंदर तो आई नहीं।

कम से कम बाहर ही मिल ले छत पर।


रात के 3 बजे मैं बड़े आराम से सोया।


[ अगर आपको मालूम हो कि आज रात को आपके पास सोने के लिए चुड़ैल आएगी तो आपको कैसा लगेगा ?]


वैसे उस चुड़ैल की इस गिरी हुई हरकत को देखकर मैं इस एक्सपीरियंस का टाइटल ये रखने वाला था -

#चुड़ैल_की_हवस

 #हवसी_चुड़ैल

#हवस_की_पुजारन


मैं उस चुड़ैल से इसलिए नहीं डरा क्योंकि मुझे मालूम था कि मुझे उससे नुक्सान नहीं पहुँचेगा, क्योंकि वो #स्वेच्छा से ट्राई मारने आई थी।

अगर आपके साथ ऐसा सपने में भी हो कि कोई भूत प्रेत अथवा चुड़ैल आपके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने के प्रयास करे तो उसे हाथ लात मुक्के घुसे जैसे मर्जी मार के दूर करो।

अगर सम्बन्ध बनते हैं तो वो आपकी तरफ अट्रैक्ट होकर पक्के रुप से चिपक सकते हैं।

उस लड़के के ऊपर वैसे भी 3-4 प्रेत हैं, वो सब उसको काफी चूसते रहते हैं।

जब 4 प्रेत 1 लड़के को चूसने बैठ जाएं तो उन 4 प्रेतों का पेट कहाँ भरेगा?

इसलिए वो उस व्यक्ति के आसपास के किसी व्यक्ति को भी चिपक सकते हैं।

अतः ऐसे केस से सावधान।


यदि वो चुड़ैल किसी ने #तान्त्रिक_क्रिया_द्वारा_भेजी होती तो शायद बहुत तंग करती और शायद जाती है नहीं।

ऐसे केस में मेरे एक दोस्त के साथ प्रेतनी ने जबरदस्ती शारीरक सम्बन्ध बनाये हैं और उसे बहुत बुरा महसूस होता था।

उसके शरीर पर नाखूनों से खरोंचने के निशान और दांतों से काटने के निशान मिलते थे।

जब भी भेजे हुए बभूत प्रेत चुड़ैल सम्बंध बनाने लगते हैं तो शरीर अकड़ जाता है, दर्द होती है पूरे शरीर में, शरीर हिल भी नहीं पाता है।





जैसे कि उस लड़के ने अपनी गलती से खुद को प्रेत चिपका लिए थे तो उसको वो इसी भ्रम में डाले रखते थे कि उसके सामने काली देवी आकर खड़ी हो जाती है और भैरो खड़ा हो जाता है।

वो उसको कहते कि हम तेरा काम करेंगे तो खून दे।

वो करते कुछ नहीं हैं, सिर्फ कुछ टाइम के लिए दूसरों को परेशान करते हैं।


उसकी बाजू पर कम से कम 60-70 चीरे पड़े हैं ब्लेड से।

उँगलियों पर नीडल चुभो के ब्लड निकालता है अब।

वो लड़का उन प्रेतों के छल में बहुत ज्यादा फंस चुके है।

वो प्रेत उसके साथ लड़ने या बहस करने वाले को परेशान कर देते हैं, और बदले में उससे खून मांस मदिरा मांगते है।

वो ये सब बातें सुनाता है।

और सही बताता है कि कौन चीज कैसी दिखती है?

उसने 3 साल पहले एक बात पर बहस होने पर मेरे ऊपर भी प्रेत भेज दिया था और मुझे 2-3 दिन तक बहुत पेट दर्द हुआ, दवाई से भी फर्क नहीं पड़ा था।

मैंने अच्छे स्तर वाला पूजा पाठ कर लिया था तो असर खत्म हो गया उसका।

उसके प्रेत द्वारा मेरे को परेशान करने वाली बात मेरे उन भूत वाले मित्र ने उसके सामने ही वीडियो कॉल पर खोल के रख दी थी।

वो लड़का कुछ बोल नहीं पाया था।


मुझे ऐसा भी लगा था कि शायद उस लड़के ने वो चुड़ैल दोबारा भेज दी थी।

लेकिन उसने नहीं भेजी थी, क्योंकि जिस बात को लेकर 3 साल पहले उसके साथ बहस हुई थी वो बात 3 साल बाद सही निकली थी जिसके लिए वो मुझसे मिलने आया था।


अगर भेजी हुई चुड़ैल होती तो शायद मेरी हालत खराब भी हो सकती थी।


आप सभी सावधान रहा करें।


जब आप सोएं तो किसी न किसी देवी देवता का कोई मन्त्र जाप या स्तुति जरूर पढ़ें।

वृक्षात पतन योग ( ऊँचाई से गिरने का योग )

#वृक्षात_पतन_योग ( #ऊँचाई_से_गिरने_का_योग )


शायद #शेखचिल्ली की कुण्डली में भी यह योग था।

इसलिए वो जिस शाखा पर बैठा था, उसी को काट रहा था और नीचे गिर गया था।

सुनने में आता है कि कोई शराब पीकर छत से गिरा और मर गया।

या कोई पेड़ से गिरा और टांग टूट गई अथवा सिर फूट गया।


पुराने समय में ऊँचाई के नाम पर सिर्फ पेड़ होते थे या कच्चे मकानों के स्लेटपोश छत होते थे।

बहुत कम लोग छत से गिरते थे क्योंकि रोज रोज कोई छत पर नहीं चढ़ा रहता।

उस समय अधिकतर लोग लकड़ी के लिए पेड़ पर चढ़ते थे और गिर भी जाते थे, इसलिए इसे वृक्षात पतन योग कहा गया।

आजकल तो हाइट के नाम पर हर जगह कुछ ना कुछ है, चाहे बिल्डिंग हो या टॉवर।

मिस्त्री प्लास्टर करने के वक़्त भी हाइट से गिरते हैं या पेंटर पेंट करते वक़्त गिर जाए।


लग्न में राहु या केतु हो अथवा लग्नेश के साथ राहु या केतु हो तो जातक ऊँचाई से गिरता है।

जब भी कोई व्यक्ति हाइट से गिरता है तो उसको अधिकतर ये भ्रम होता है कि उसके हाथ या पैर सही तरीके से अटके हैं।

किसी प्रकार से खुद को नुक्सान होने का भ्रम होता है या ओवर कॉन्फिडेंस में कुछ गलत स्टैप हो जाता है।

कई बार वो सेफ्टी गैजेट्स भी फेल हो जाते हैं जिनकी मदद से हाइट पर टिकने में सहायता मिलती है।

नशे की हालत में भी ऊँचाई से गिरते देखा गया है।


इन सब कंडीशन्स में #भ्रम एक #कॉमन चीज है।

भ्रम का कारण राहु है।

इसलिए लग्न में या लग्नेश के साथ राहु केतु का होना ऊँचाई से गिरने की घटना का कारण बनता है।

लग्न या लग्नेश के साथ केतु होगा चोट देगा।

केतु का लग्न में या लग्नेश के साथ होना हर बार हाइट से नहीं गिराता है।

यदि केतु वायु तत्व के लग्न में हो या वायु तत्व की राशि में लग्नेश के साथ हो तो हाइट से गिराता है क्योंकि हवा में चोट लगने का मतलब यही है कि जातक का कॉन्टेक्ट उस वक़्त जमीन की सतह से नहीं है और हवा में नुक्सान या तो ऊंचाई से गिरने पर होता है या वायु तत्व सम्बन्धी अस्त्र शस्त्र जैसे गोली लगना या फैंक कर चलाया जाने वाला अस्त्र हो सकता है।


प्रस्तुत कुण्डलियों में दोनों जातक ऊँचाई से गिरे हैं।

कुण्डली 1 -

जन्म - 10 अक्तूबर 1987
समय - 17:21 बजे
स्थान - बोकारो

[1] मीन लग्न लग्न की कुण्डली में राहु है,
सम्भावना अधिकार बन जाती है कि भ्रम के कारण चोट लगेगी।

ऊँचाई से गिरने के लिए राहु ही काफी है।

[2] सूर्य केतु साथ में है मंगल केतु भी साथ में है।

( मंगल+केतु = अंगारक योग अथवा शस्त्राघात योग ) के कारण पेड़ पर अपनी ही औजार से हाथ पर चोट लगी और चक्कर आ गया।

नीचे गिरा तो (सूर्य+केतु = अस्थिभ्रंश योग) के कारण हड्डी भी टूट गई।


कुण्डली 2 -

जन्म - 6 जून 1985
समय - 23:53 बजे
स्थान - डबवाली

यह जातक बच्चपन में पेड़ पर तोते के बच्चे पकड़ने चढ़ गया और पेड़ पर एक मॉनिटर लिजार्ड (गोह) थी जो एकदम से सामने आ गई और डर के जातक नीचे गिर गया।

दोनों घुटने और पैरों के जॉइंट्स खुल गए, मांसपेशियां बर्स्ट हो गई।

जातक कम से कम आधा दिन तक वहीं पड़ा रहा, टांगें सूज गई थी।

किसी ने जब देखा तो घर में इन्फॉर्म कर दिया।

कम से कम 4 महीने जातक चल नहीं पाया था।



[1] कुम्भ लग्न एक वायु तत्व लग्न है जिसका स्वामी शनि वायु तत्व की तुला राशि में केतु के साथ नवम भाव में है।

[2] शनि घुटनों और लकवे का अथवा लम्बे रोग का कारक है।

जातक को चोट भी ऐसी लगी कि जॉइंट्स खुल गए और कम से कम 4 महीने चल नहीं पाया।

लकवे जैसी हालत को शनि के कारण कह सकते हैं।