Wednesday, October 30, 2019

इच्छा और जरूरत

#इच्छा_या_जरूरत

इच्छा का अन्त नहीं है लेकिन जरूरत पूरी हो जाती है।

इच्छा पूरी होने पर दुःख का कारण भी बनती है।

#श्रीमद्भागवत_गीता में कहा गया है -

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्र्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।।

अध्याय 2 श्लोक 71

भावार्थ

जिस व्यक्ति ने इन्द्रियतृप्ति की समस्त इच्छाओं का परित्याग कर दिया है, जो इच्छाओं से रहित रहता है और जिसने सारी ममता त्याग दी है तथा अहंकार से रहित है, वही वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकता है |

भोजन आपकी जरूरत है, ये जरूरत पूरी हो जाएगी।

लेकिन दुनियाँ को हर चीज खाना आपकी इच्छा हो सकती है, लेकिन आवश्यक नहीं है कि ये इच्छा पूरी हो जाये।

आपको पैसा मिलता है जरूरत पूरी हो जाती है तो अच्छा है, लेकिन जब पड़ोसी से ज्यादा पैसा पाने की इच्छा होती है तो मन मस्तिष्क परेशान होता है।

पड़ोसी कुछ नहीं कर रहा है, वो अपने गुण के अनुसार कमा रहे है।

आपने उससे तुलना कर के खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारी है क्योंकि आपकी इच्छा जाग रही है इसे ऊँचे उठने की।

अपनी जरूरत पूरी करो और इच्छा के रोग से बचो।



जरूरत पूरी होने पर सेटिस्फेक्शन मिल जाता है।


लेकिन इच्छा क्या करती है, वो इन कहानियों में है -


एक आदमी को #अल्लाहद्दीन_का_जादुई_चिराग मिल गया तो उसने रगड़ दिया।

उसमें से #जिन्न निकल आया।

जिन्न बोला 3 इच्छाएँ पूरी करूँगा, उसके बाद तुम्हारी जान ले लूँगा।

 बोल क्या इच्छा है?

आदमी बोला -

मुझे आज ही 10 लाख रुपये चाहिए।

जिन्न ने कहा शाम तक मिल जाएंगे।


शाम के समय एक आदमी आया और दरवाजा खटकाया।

जब दरवाजा खोला तो सीधे ही 10 लाख रुपये से भरा बैग मकान मालिक के हाथ मे देकर बोला कि मेरी गाड़ी के नीचे आकर आपका लड़का  मर गया।

मैं उसके बदले में आपको ये 10 लाख रुपये देने आया हूँ।


इतना सुनना ही था कि वो आदमी पागल बेहोश हो गया सुन के।


जब होश में आया तो जिन्न को बुलाया।

जिन्न से उसने कहा कि मेरी दूसरी इच्छा है कि मेरा बेटा मुझे जिन्दा लौटा दे।

जिन्न ने कहा कि उसका शरीर कट फट गया था, उसके शरीर के बिना जिन्दा करना मुश्किल है लेकिन मैं उसे इस घर में ले आऊँगा।


उस लड़के की भटकती हुई आत्मा घर में आ गई जो प्रेत बन चुकी थी।


माँ बाप फिर परेशान।


उन्होंने जिन्न से कहा -

भगवान के लिए यहां से चला जा।

जिन्न वहाँ से चला गया और थोड़ी देर बाद फिर वापस आ गया कि आपकी 3 इच्छाएँ मैंने पूरी कर दी, लेकिन अब आपको मार देना बाकी रह गया है।

जिन्न ने उनको खत्म कर दिया।


माता पिता की मृत्यु जीवन का बहुत बड़ा सच है।

एक लड़के ने भगवान से मांग लिया कि मेरे माँ बाप जीते रहें।


लड़के की नजर में तो माँ बाप जिन्दा रहे लेकिन माँ बाप से पहले लड़का चल बसा।

अब लड़के की इच्छा तो भगवान ने पूरी कर दी लेकिन माँ बाप तो मरते दम तक औलाद की अर्थी का दुःख झेलते रहे।


एक कहानी सुनी थी -


एक सैनिक की ड्यूटी हिमालय के आसपास वाले एरिया में लगी थी।

उसे जंगल में 30-32 साल का एक आदमी मिला।

इससे बात करने पर पता लगा वो एक साधक है।

सैनिक ने आयु पूछ ली तो उस साधक ने कहा मैं 800 साल का हूँ।

सैनिक ने उससे इतनी लम्बी उम्र तक जीने और जवान रहने का राज पूछा तो साधक ने बताया कि यहाँ हिमालय में एक जड़ी बूटी है, इसको जो खाता है उसे ना बढ़ापा आता है ना बीमारी लगती है और ना वो मरता है।

साल में एक बार खानी है और शरीर स्थिर रहता है, जब मर जाने का मन करे तो जड़ी बूटी मत खाओ, बुढ़ापा आएगा, बीमारी लगेगी और मर जाओगे।


सैनिक ने जड़ी बूटी खाना शुरू कर दी।


वो जवान रहने लगा और 30-32 साल का लगता था।

उसकी पत्नी बूढ़ी होने लगी, उसने दूसरी शादि कर ली।

बच्चे बड़े हुए, बूढ़े होने लगे, उसकी दूसरी पत्नी भी बूढ़ी होने लगी तो उसने तीसरी शादि की।

इस तरफ से उसकी जनरेशन चलती गई, और वो शादि भी करता गया, हर पत्नी आए 2-3 बच्चे हो जाते थे।


60-70 साल बाद कोई पत्नी मरने लगी तो कोई बच्चा मरने लगा।

लेकिन उसकी इच्छा बहुत थी जीने की।


उसकी उम्र 600 साल के आसपास तक हो गई थी।

उसका परिवार बहुत फैल गया था।


एक बार वो हिमालय पर जड़ीबूटी खाने गया था।


वापस आया तो उसने देखा कि एक मैदान में 300-400 लाशें जलाई जा रही हैं।

उन मुर्दों के रिश्तदारों के चेहरे उसे जाने पहचाने लगे।

नजदीक गया तो देखा सब उसकी जनरेशन के लोग थे।

उसने पूछ कि क्या हुआ ?

तो उसको पता चला कि वो सब मुर्दे उसकी जनरेशन के लोग थे जो एक महामारी के कारण मर गए।

अपनी जनरेशन की 400 लाशें देखकर उसे एकदम से सदमा लग गया।

उसका दिमाग इतना कमजोर हो गया कि वो जड़ीबूटी तक भूल गया


अगर वो अपनी मौत मर जाता तो शायद सदमे में ना मरता।


और भी कुछ उदाहरण अपने आसपास देखे जा सकते है।

कुछ इच्छाएँ जायज हैं, लेकिन कुछ नाजायज हैं।

इच्छा से ज्यादा जरूरत को महत्व दें।


भक्त प्रह्लाद ने भगवान ने माँगा था -

मेरी इच्छाएँ खत्म हो जाएं।

श्रीमद्भागवत गीता में हर समस्या का समाधान

#श्रीमद्भागवत_गीता


#प्रैक्टिकल_एक्सपीरियंस


लोग इसी डर से श्रीमद्भागवत गीता नहीं पढ़ते कि वो #वैरागी ना बन जाएं।


जो श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने के साथ साथ समझता है,
उसके जीवन में उसे किसी भी समस्या का समाधान जल्दी मिलता है।


ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका समाधान श्रीमद्भागवत गीता में ना हो।

#अनन्त_भावार्थ निकल जाते हैं और हर भावार्थ आपके विचारों का शोधन करता है।

श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने से ज्यादा समझना जरूरी है।


इसके #शब्द पढ़ने में वक्त नहीं लगता है लेकिन इसके #अर्थ को समझने में जीवन कम पड़ेगा।


लाइफ में जब भी कोई उलझन आ खड़ी हो,
कोई रास्ता ना दिखे तो श्रीमद्भागवत गीता की पुस्तक पकड़ के बैठ जाओ।

दिल करे तो भगवान से प्रार्थना कर लेना कि समस्या से निकलने का रास्ता बता दे।

अगर दिल ना करे तो प्रार्थना भी मत करना।


अपनी समस्या के बारे में सोचते हुए जो दिल करे वो पेज खोल के पढ़ो।

आमने सामने के दोनों पेज में या उनके आगे पीछे आपको आपकी समस्या का समाधान लिखा मिलेगा।


प्रैक्टिकल की हुई बात है।


श्रीमद्भागवत गीता का सरल हिन्दी अनुवाद आपको मिलता है तो खरीद लीजिये।


#श्रीमद्भगवद्गीता_साधक_संजीवनी प्रिंटिड बाय #गीताप्रैस से अच्छी व्याख्या मैंने आजतक नहीं पढ़ी।

और इस पुस्तक में सटीक व्याख्या के कारण थ्योरी अधिक है, जिससे आपके #मन_में_चल_रहा_द्वन्द बहुत जल्दी स्पष्ट होता है।


मेरे एक क्लाईंट को बहुत उलझन थी।

उनके पास भी श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी थी।

मैंने उनको कहा कि #अध्याय 2  #श्लोक 7 को निकाल कर पढ़िए।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।

अर्थ - इसलिये कायरतारूप दोषसे उपहत हुए स्वभाववाला तथा धर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिये कहिए; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण आए हुए मुझको शिक्षा दीजिये।


उसके बाद पुस्तक बन्द कर के जो दिल करे वो पेज खोल दो।

उन्होंने एक पेज खोल दिया।

उनको चमत्कार ही हो गया।

उनकी उलझन जैसे बिल्कुल सुलझाकर ही लिखी गई हो।


दूसरी उलझन अगले दिन फिर इसी मैथड से सुलझाई।


तीसरे दिन मुझसे बोले कि तुम कहते हो हर सवाल का उत्तर श्रीमद्भागवत गीता में है।

तो अब ये पूछते हैं कि उनके किसी दुश्मन की मौत कब होगी?

इसके बारे में श्रीमद्भागवत गीता क्या कहेगी ?


वही मन्त्र वाला मैथड शुरू किया और पेज खोला -

पेज में लिखा हुआ मिला -

अध्याय 4 श्लोक 3

उसकी व्याख्या की ये कुछ पँक्तियाँ माइण्ड में खटक गई -

साधारण लोग भगवान की दी हुई वस्तुओंको तो
अपनी मानते हैं (जो अपनी हैं ही नहीं) पर
भगवान को अपना नहीं मानते (जो वास्तवमें अपने
हैं)।

[ एक टुच्ची सी सोच किसी के मरने के बारे में सोचना, पड़ोसी के दुःख आने पर ध्यान है, लेकिन भगवान पर ध्यान नहीं है जो ध्यान करने के लायक है। ]

वे लोग वैभवशाली भगवान को न देखकर उनके
वैभव को ही देखते हैं।

वैभव को ही सच्चा मानने से
उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि वे भगवान का
अभाव ही मान लेते हैं अर्थात् भगवान की तरफ
उनकी दृष्टि जाती ही नहीं।

[ बुद्धि भ्रष्ट हो गई है जो हाथ मे श्रीमद्भागवत गीता पकड़कर भी भगवान की शिक्षा पर चिन्तन ना कर के पड़ोसी की मौत का इन्तजार करते हैं। ]


बात घुमा के लिखी गई है लेकिन इन पँक्तियों ने #आईना दिखा दिया कि तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट है इस वक़्त।

ढूँढने वाले इस किताब में जिन्दगी ढूंढ लेंगे और इसके #गूढ़_अर्थों  की ओर ध्यान ना देने वाले बिल्कुल वैसे ही होंगे जैसे #कड़छी #स्वादिष्ट_पकवान में डूबी रहती है लेकिन उसका #स्वाद कभी नहीं ले पाती।


जिसको अक्ल होगी वो जरूर पढ़ेगा और अर्थ समझेगा।

पढ़ते रहे और अर्थ ना निकाला और ना उसे जीवन में उतारा तो ये आपके किसी काम की नहीं।


जो इसके अर्थ को बुद्धि लगाकर खुद को बुद्धिमान समझकर समझेगा वो इसे सिर्फ बुद्धि तक ही सीमित रख पायेगा और दूसरों को भाषण देना शुरू कर देगा।

जो समर्पण भाव से बुद्धि और मन लगाकर समझेगा,
उसका फालतू का भाषण देना ही बंद हो जाएगा।

एक साफ स्वच्छ सोच अवश्य बनेगी।

एक मित्र ने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता कोई पुण्यात्मा ही पढ़ पायेगा।

लेकिन बात उल्टी है कि जो इसे पढ़ेगा और अर्थ समझेगा वो पुण्यात्मा हो जाएगा।


जो इसे जीवन में उतार देगा उसका पुण्यात्मा होने ना होने से कोई लेना देना नहीं रह जायेगा।

निष्काम कर्मयोगी हो जाएगा।


अपने जीवन में किसी कामयाब आदमी से मिलो तो उसकी कामयाबी का राज पूछना।

वो 2 लाइन से ज्यादा नहीं कहेगा।

और जो 2 लाइन कहेगा, वो आपको श्रीमद्भागवत गीता में किसी ना किसी रूप में लिखी ही मिलेगी।


किसी ने पूछ लिया कि श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने से क्या मिलेगा ?

[ जायज सी बात है कि जब तक ये पता ना हो कि पौधा किस फल का है, तब तक आप ना वो पौधा लगाओगे ना उसे पानी देंगे। ]


श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने से कुछ नहीं मिलेगा।

क्योंकि बहुत सारे बाबा लोक भी इसे पढ़ते थे और सुनाते थे,

आजकल वो 10-20 साल के लिए जेल के अन्दर हैं।


जो मिलेगा वो इसके अर्थ को समझने से मिलेगा और उसको जीवन में उतारने से मिलेगा।

Wednesday, October 23, 2019

एकमुखी, पँचमुखी और एकादशमुखी हनुमान कवच।

#जय_श्री_राम


#श्री_हनुमान_कवच।

आपको परेशान करने वाले को #दण्ड_मिलना_निश्चित है।

#चेतावनी - इसका उपयोग मजाक या टैस्टिंग के लिए तो कभी भी ना करें, नहीं तो आपकी वाट लग सकती है।

करना हो तो बहुत ज्यादा #हार्ड_ब्रह्मचर्य और साफ स्वच्छता के साथ करें।

इसका यूज करने से पहले कम से कम 50 बार जरूर सोच लें।


#प्रैक्टिकल_एक्सपीरियंस।


नमस्कार मित्रों।

मेरे एक मित्र हैं जिन्होंने #एकमुखी_पँचमुखी_और_एकादशमुखी_हनुमान_कवच के पाठ का एक्सपीरियंस किया है।

सबसे सबसे इन कवचों का एक्सपीरियंस उनको बहुत ज्यादा डरा देने वाला रहा।

उन्होंने 3 दिन से ज्यादा इनका यूज नहीं किया।

उनको #एक_ही_सपना 3 दिन लगातार आता रहा और उस सपने ने इनके #शरीर_को_असन्तुलित कर दिया।

सपना ये था -

नींद आते ही #परमाणु_बमों_के_विस्फोट नजर आते, #धमाके_कानों_में_गूंजने लगते,
सारा #सँसार_गलता हुआ नजर आने लगता।

खुद को जैसे तैसे उस स्थिति में बचाने लगते, पता नही  कौन उस स्थिति में उनको बचा रहा था।

3 दिन तक सिर में खोपड़ी फाड़ने की तकलीफ वाला सिरदर्द शुरू हुआ था।

एक हफ्ते बाद उनकी हालत ठीक हुई।

[ किसी भी व्यक्ति को ऐसा सपना 3 दिन तक लगातार सारी रात चलता रहे, उसका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाएगा।]


उन्हें इस इन कवच पाठों से इतना डर लग गया था कि इनके बारे में सोचने से ही काँपने लगते थे।


उन्होंने #श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ शुरू किया था इसके बाद भी।

उन्होंने सब प्रकार के स्तोत्र आजमाए हैं, जब भी उन्हें गड़बड़ लगती है तो लास्ट में श्रीरामरक्षास्तोत्र का यूज करते हैं।


उन्होंने इस कवच के बारे में एक बात ये कही कि यदि कवच का पाठ करने से पहले और पाठ करने के बाद श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ किया जाए तो भयँकर वाला प्रभाव नहीं रहता है।

उन्होंने यूज किया है।



दूसरे मित्र ने भी इन में से एक कवच का यूज अपनी #कोर्टकेस की समस्या के लिए किया था।

उसकी गलती ना होते हुए भी उसकी तरफ ही माईनस पॉइंट जा रहे थे।

उसने जब कवच यूज किया तो उसका सन्तुलन नहीं बिगड़ा।

क्योंकि उसके प्रोसीजर बहुत जबरदस्त था।

वो भी हनुमान भक्त था।

उसने कवच पाठ से पहले ये सब किया -

सबसे पहले #श्रीराम_के_मन्दिर में जाकर के पूजा पाठ कर के श्रीराम से इसकी अनुमति माँगी।

उसके बाद #हनुमान_मन्दिर में जाकर पूजा करके #श्रीराम_नाम_लिखा हुआ झण्डा चढ़ाया।

और श्री राम के नाम से #दीपक जलाया।

शनिवार के दिन हनुमान जी को चमेली के तेल में हनुमान सिन्दूर मिलाकर #चोला चढ़ाया और चोला चढ़ाते समय इस दोहे का उच्चारण करता रहा -

लाल देह लाली लसे, अरुधरी लाल लंगूर।
वज्रदेह दानव दलन, जय जय कपि सूर।।


उसके बाद उसने मंगलवार रात से शुरू किया।

पूजा स्थान पर ऐसा फोटो रखा जिसमें हनुमान के पीछे श्री राम और सीता थे।

हनुमान भजन स्तुति में मग्न था।

पूजा स्थान में हनुमान के सामने #रहल पर एक #डायरी रखी जिसका मुँह हनुमान की तरफ था जैसे हनुमान उसे पढ़ रहा हो।

उस डायरी में उसने 1008 बार #श्रीराम_जयराम_जयजय_राम #लाल_बॉलपेन से लिखा था।

उसने इस प्रोसीजर से हनुमान की सारी उग्रता समाप्त कर दी थी।

प्रोसीजर के बाद वो डायरी उसने जल प्रवाह कर दी थी।

पानी का लोटा रखा अभिमंत्रित करने के लिए।

उसके बाद उसने कवच पाठ किया था।

45 दिन का प्रोसीजर कम्प्लीट कर लिया।

पूरे ब्रह्मचर्य के साथ उसने ये किया।

कोर्टकेस उसके पक्ष में आ गया।


[नोट - ये कवच मल्टीपर्पज हैं, बाधा किसी भी प्रकार की हो, यूज कर सकते हैं।

तान्त्रिक पद्धति वाले पूजा के समय एकमुखी, पँचमुखी या एकादशमुखी हनुमान का फोटो यूज करें तथा वीरासन में बैठ कर पाठ करें।

इससे उग्रता बढ़ती है।

सात्विक पद्धति वाले उपरोक्त श्रीराम सीता हनुमान वाला फोटो इस्तेमाल कर के साधारण तरीके से पढ़ें।

इससे उग्रता नहीं बढ़ती है।]


कवचों में जहाँ भी #इति_दिग्बन्ध या #दिग्बन्धन आया है वहाँ बांये हथेली पर दांये हाथ की चारों अंगुलियों से 3 बार ज़ोर से ताली बजाकर दशों दिशाओं ( 4 दिशा, 4 उपदिशा मतलब कोने और 2 ऊपर तथा नीचे ) की ओर क्रम से “ॐ भूर्भुवःस्वरोम्” मन्त्र पढ़कर चुटकी बजाएं, इससे पाठ में विघ्न नहीं आते।

जितनी बार भी #विनियोग आया है उतनी बार विनियोग करना है।

स्तोत्र का पाठ 11 बार करना है एयर उसके बाद अभिमंत्रित पानी घर में छिड़कना है और पीना है। ]


#एकमुखी_हनुमान_कवच


अथ श्री एकमुखि हनुमत्कवचं प्रारंभयते।

मनोजवं मारुततुल्य वेगं, जितेंद्रियं बुधिमतां वरिष्ठं ।
वातात्मजं वानर्युथ्मुख्यं, श्रीराम्दूतं शरणं प्रप्धे ।।

अथ श्री हनुमते नम:।

एकदा सुखमासीनं शंकरं लोकशंकरं ।
पप्रच्छ गीरिजाकांतं कर्पूधवलं शिवं ।।

पार्वत्युवाच -

भगवन्देवदेवेश लोकनाथं जगद्-गुरो ।
शोकाकुलानां लोकानां केन रक्षा भवेद ध्रुवं ।।
संग्रामे संकटे घोरे भूतप्रेतादिके भये ।
दुखदावाग्नि संतप्त चेतसां दुखभागिनां ।।

ईश्वर उवाच-

श्रणु देवि प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।
विभीषणाय रामेण प्रेम्णा दत्तं च यत्पुरा ।।
कवचं कपिनाथस्य वायुपुत्रस्य धीमत: ।
गुह्यं ते संप्रवछ्यामि विशेषाच्छ्रिणु सुन्दरि ।।

ॐ अस्य श्रीहनुमत् कवच-स्त्रोत्र-मंत्रस्य श्रीरामचंद्र ऋषिः । अनुष्टुप्छंदः ।
श्रीमहावीरो हनुमान देवता । मारुतात्मज इति बीजं ।।
ॐ अंजनीसुनुरिति शक्ति: । ॐ ह्रैं ह्रां ह्रौं इति कवचं ।
स्वाहा इति कीलकं । लक्ष्मण प्राणदाता इति बीजं ।
मम् सकलकार्य सिध्दयर्थे जपे वीनियोग: ।।

करन्यास -

ॐ ह्रां अंगूष्ठाभ्यां नम: । ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नम: ।
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नम: । ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नम: ।
ॐ ह्रौं कनिष्ठिभ्यां नम: । ॐ ह्र: करतल करप्रिष्ठाभ्यां नम: ।

अंगन्यास -

ॐ अंनीसूनवे ह्र्दयाय नम: । ॐ रुदमूर्तये सिरसे स्वाहा ।
ॐ वायुसुतात्मने शिखायै वषट् । ॐ वज्रदेहाय कवचाय हुं ।
ॐ रामदूताय नेत्र-त्रयाय वौषट् । ॐ ब्र्ह्मास्त्र निवारणाय अस्त्राय फट् ।
ॐ राम-दूताय विद-महे कपि-राजाय धीमहि ।
तन्नो हनुमान प्रचोदयात् ॐ हुं फट् ।।

।। इति दिग्बन्धः ।।

ॐ ध्यायेद्-बाल दिवाकर-धुतिनिभं देवारिदर्पापहं
देवेन्द्र-प्रमुख-प़शस्त-यशसं देदीप्यमानं रुचा ।
सुग्रीवादि-समस्त-वानर-युतं सुव्यक्त-तत्वप्रियं
संरक्तारुण-लोचनं पवनजं पीतांबरालंकृतं ।।१।।
उधन्मार्तण्ड-कोटि-प्रकट-रुचियुतं चारु-वीरासनस्थं
मौंजी-यज्ञो-पवीता-रुण-रुचिर-शिखा-शोभितं कुंडलागम् ।
भक्ता-नामिष्ट-दं तं प्रणत्-मुनिजनं वेदनाद-प्रमोदं
ध्याये-देव विधेयं प्ल्वंग-कुल-पतिं गोष्पदी भूतवार्धिं ।।२।।
वज्रांगं पिंगकेशाढ्यं स्वर्णकुंडल-मंडितं ।
नियुध्द-कर्म-कुशलं पारावार-पराक्रमं ।।३।।
वामहस्ते महावृक्षं दशास्यकर-खंडनं ।
उध-दक्षिण-दौर्दण्डं हनुमंतं विचिंतयेत् ।।४।।
स्फटिकांभं स्वर्णकान्ति द्विभुजं च कृतांजलिं ।
कुंडलद्वय-संशौभि मुखांभोजं हरिं भजेत् ।।५।।
उधदादित्य संकाशं उदारभुजविक़मम् ।
कंदर्प-कोटिलावण्यं सर्वविधा-विशारदम् ।।६।।
श्रीरामहृदयानंदं भक्तकल्पमहीरूहम् ।
अभयं वरदं दोर्भ्यां कलये मारूतात्मजम् ।।७।।
अपराजित नमस्तेऽस्तु नमस्ते रामपूजित ।
प्रस्थानं च करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ।।८।।
यो वारां निधि-मल्प-पल्वल-मिवोल्लंघ्य-प्रता-पान्वितो
वैदेही-घन-शोक-तापहरणो वैकुण्ठ-तत्वप्रियः ।
अक्षाघूर्जित-राक्षसेश्वर-महादर्पापहारी रणे
सोऽयं-वानर-पुंगवोऽवतु सदा युष्मान्-समीरात्मजः ।।९।।
वज्रांगं पिंगकेशं कनकमयल-सत्कुण्डला-क्रांतगंडं
नाना विधाधिनाथं करतल-विधृतं पूर्णकुंभं दृढं च ।
भक्ताभीष्टाधिकारं विदधति च सदा सर्वदा सुप्रसन्नं
त्रैलोक्यं-त्राणकारं सकलभुवनगम् रामदूतम् नमामि ।।१०।।
उधल्लांगूल-केशप्रलय-जलधरं भीममूर्तिं कपींद्रं
वंदे रामांघ्रि-पद्म-भ्रमरपरिवृतं तत्वसारं प्रसनम् ।
वज्रांगं वज्ररुपं कनकमयल-सत्कुण्डला-क्रांतगंडं
दंभोलिस्तंभ-सार-प्रहरण विकटं भूतरक्षोऽधिनाथम् ।।११।।
वामे करे वैरिभयं वहंतं शैलं च दक्षेनिजकण्ठलग्नम् ।
दधान-मासाद्ध सुवर्णवर्ण भजेज्ज्वलत्कुंडल-रामदूतम् ।।१२।।
पद्मरागमणि कुंडलत्विषा-पाटलीकृत-कपोलमण्डलम् ।
दिव्यगेह-कदली-वनांतरे भावयामि पवमान-नन्दनम् ।।१३।।

ईश्वर उवाच-

इति वदति-विशेषद्राधवो राक्षसेंद्र प्रमुदितवरचितो रावणस्यानुजो हि
रघूवरदूतं पूज्यमास भूयः स्तुतिभिरकृतार्थ स्वं परं मन्यमानः ।।१४।।
वन्दे विघुद्वलय सुभगम् स्वर्णयज्ञोपवीतं
कर्णद्वंद्वे कनकरूचिरे-कुण्डले धारयन्तम् ।
उच्चैर्ह्रस्य दधुमणि किरणो श्रेणि संभावितांगम्
सत्कौपीनं कपिवरवृतं कामरूपं कपीन्द्रम् ।।१५।।
मनोजवं मारुत तुल्य वेगं, जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं सततं स्मरामि ।।१६।।

अंगन्यास -

ॐ नमो भगवते ह्रदाय नम: ।
ॐ आंजनेयाय शिरसे स्वाहा ।
ॐ रूद्रमूर्तये शिखायै वषट् ।
ॐ रामदूताय कवचाय हुम् ।
ॐ हनुमते नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ अग्निगर्भाय अस्त्राय फट् ।

करन्यास -

ॐ नमो भगवते अंगुष्ठाभ्यां नम: ।
ॐ वायुसूनवे तर्जनीभ्यां नम: ।
ॐ रूद्रमूर्तये मध्यमाभ्यां नम: ।
ॐ वायुसूनवे अनामिकाभ्यां नम: ।
ॐ हनुमते कनिष्ठिकाभ्यां नम: ।
ॐ अग्निगर्भाय करतल करप्रिष्ठाभ्यां नम: ।

अथ मंत्र उच्यते-

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः ।
ॐ ह्रीं ह्रौं ॐ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत प्रेत पिशाच शाकिनी डाकिनी यक्षिणी पूतनामारी महामारी भैरव यक्ष बेताल राक्षस ग्रह राक्षसादिकं क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय सिक्ष्य सिक्ष्य महामाहेश्वर रूद्रावतार ह्रुं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते हनुमादाख्याय रूद्राय सर्वदुष्टजनमुखस्तंभनं कुरू-कुरू ह्रां ह्रीं ह्रूं ठं-ठं-ठं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते अंजनीगर्भसंभूताय रामलक्ष्मणानन्दकराय कपिसैन्यप्रकाशनाय पर्वतोत्पाटनाय सुग्रीव साधकाय रणोच्च्टनाय कुमार ब्रह्मचारिणे गंभीर-शब्दोदयाय |
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं सर्वदुष्ट निवारणाय स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते सर्वग्रहान्भूतभविष्य-दूर्तमानान्-दूरस्थान् समीपस्थान् सर्वकाल दुष्टदुर्बुद्धीन उच्चाट योच्चाटय परबलानि क्षोभय क्षोभय मम् सर्वकार्यं साधय साधय हनुमते |
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं फट् देहि ।
ॐ शिवं सिद्धं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते परकृतयंत्र-मंत्र-पराऽहंकार-भूतप्रेत पिशाच परदृष्टि-सर्वविध्न-दुर्जनचेटक विधा सर्वग्रहान् निवारय निवारय वध वध पच पच दल दल किल किल सर्वकुयंत्राणि-दुष्टवाचं फट् स्वाहा।
ॐ नमो हनुमते पाहि पाहि एहि एहि सर्वग्रह भूतानां शाकिनी-डाकिनीनां विषम् दुष्टानां सर्वविषयान् आकर्षय आकर्षय मर्दय मर्दय भेदय भेदय मृत्युमुत्पाटयोत्पाटय शोषय शोषय ज्वल ज्वल प्रज्ज्वल प्रज्ज्वल भूतमंडलं प्रेतमंडलं पिशाचमंडलं निरासय निरासय भूतज्वर प्रेतज्वर चातुर्थिकज्वर विषंज्वर माहेश्वरज्वरान् छिंधि छिंधि भिंधि भिंधि अक्षिशूल वक्षःशूल शरोभ्यंतरशूल गुल्मशूल पित्तशूल ब्रह्र-राक्षसकुल परकुल नागकुल विषं नाशय नाशय निर्विषं कुरू कुरू फट् स्वाहा ।
ॐ ह्रीं सर्वदुष्ट ग्रहान् निवारय फट् स्वाहा ।।
ॐ नमो हनुमते पवनपुत्राय वैश्वानरमुखाय हन हन पापदृष्टिं षंढ़दृष्टिं हन हन हनुमदाज्ञया स्फुर स्फुर फट् स्वाहा ।।

श्रीराम उवाच-

हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः ।
प्रतीच्यां पातु रक्षोध्न उत्तरास्यांब्धि पारगः ।।१।।
उध् मूध्वर्गः पातु केसरीप्रियनंदनः ।
अधस्च विष्णु भक्तस्तु पातु मध्ये च पावनिः ।।२।।
अवान्तर दिशः पातु सीताशोकविनाशनः ।
लंकाविदाहकः पातु सर्वापदभ्यो निरंतरं ।।३।।
सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं वायुनंदनः ।
भालं पातु महावीरो भ्रुवोमध्ये निरंतरं ।।४।।
नेत्रे छायापहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ।
कपोलौ कर्णमूले तु पातु श्रीरामकिंकरः ।।5।।
नासाग्रम्-अंजनीसूनुर्वक्त्रं पातु हरीश्वरः ।
वाचं रूद्रप्रियः पातु जिह्वां पिंगललोचनः ।।६।।
पातु दंतांफाल्गुनेष्टश्चिबुकं दैत्यप्राणह्रृत् ।
पातु कण्ठण्च दैत्यारीः स्कंधौ पातु सुरार्चितः ।।७।।
भुजौ पातु महातेजाः करौतू चरणायुधः ।
नखांनखायुध पातु कुक्षिं पातु कपीश्वरः ।।८।।
वक्षोमुद्रापहारी-च पातु पार्श्र्वे भुजायुधः ।
लंकाविभंजनः पातु पृष्ठदेशे निरंतरं ।।९।।
नाभिंच रामदूतोस्तु कटिं पात्वनिलात्मजः ।
गुह्मं पातु महाप्रज्ञः सक्थिनी-च शिवप्रियः ।।१०।।
उरू-च जानुनी पातु लंकाप्रासादभंजनः ।
जंधे पातु महाबाहुर्गुल्फौ पातु महाबलः ।।११।।
अचलोध्दारकः पातु पादौ भास्करसन्निभः ।
पादांते सर्वसत्वाढ्यः पातु पादांगुलीस्तथा ।।१२।।
सर्वांगानि महावीरः पातु रोमाणि चात्मवान् ।
हनुमत्कवचं यस्तु पठेद्विद्वान् विलक्षणः ।।१३।।
स-एव पुरूषः श्रेष्ठो भक्तिं मुक्तिं-च विंदति ।
त्रिकालमेककालं-वा पठेन्मात्रयं सदा ।।१४।।
सर्वान-रिपून्क्षणे जित्वा स पुमान् श्रियमाप्नुयात् ।
मध्यरात्रे जले स्थित्वा सप्तवारं पठेद्धादि ।।१५।।
क्षयाऽपस्मार-कुष्ठादिता-पत्रय-निवारणं ।
आर्किवारेऽश्र्वत्थमूले स्थित्वा पठतिः यः पुमान् ।।१६।।
अचलां श्रियमाप्नोति संग्रामे विजयीभवेत् ।।१७।।
यः करे धारयेन्-नित्यं-स पुमान् श्रियमाप्नुयात् ।
विवाहे दिव्यकाले च द्धूते राजकुले रणे ।।१८।।
भूतप्रेतमहादुर्गे रणे सागरसंप्लवे ।
दशवारं पठेद्रात्रौ मिताहारी जितेंद्रियः ।।१९।।
विजयं लभते लोके मानवेषु नराधिपः ।
सिंहव्याघ्रभये चोग्रेशर शस्त्रास्त्र यातने ।।२०।।
श्रृंखलाबंधने चैव काराग्रहकारणे ।
कायस्तंभ वहिन्नदाहे च गात्ररोगे च दारूणे ।।२१।।
शोके महारणे चैव ब्रह्मग्रहविनाशने ।
सर्वदा तु पठेन्नित्यं जयमाप्नोत्य संशयं ।।२२।।
भूर्जेवा वसने रक्ते क्षौमेवा तालपत्रके ।
त्रिगंधेन् अथवा मस्या लिखित्वा धारयेन्नरः ।।२३।।
पंचसप्तत्रिलौहैर्वा गोपितं कवचं शुभं ।
गलेकट्याम् बाहुमूले वा कण्ठे शिरसि धारितं ।।२४।।
सर्वान्कामानवाप्नोति सत्यं श्रीरामभाषितं ।।२५।।
उल्लंघ्य सिंधोः सलिलं-सलिलं यः शोकवन्हि जनकात्मजायाः ।
आदाय तेनैव ददाह लंकां नमामितं प्राण्जलिराण्जनेयम् ।।२६।।
ॐ हनुमान् अंजनी सूनुर्वायुर्पुत्रो महाबलः ।
श्रीरामेष्टः फाल्गुनसंखः पिंगाक्षोऽमित विक्रमः ।।२७।।
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः ।
लक्ष्मणप्राणदाताच दशग्रीवस्य दर्पहा ।।२८।।
द्वादशै तानि नामानि, कपींद्रस्य महात्मनः ।
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकालच यः पठेत् ।।२९।।
तस्य सर्वभयं नास्ति, रणे च विजयी भवेत् ।
धन-धान्यं भवेत् तस्य दुःखं नैव कदाचन ।।३०।।
ॐब्रह्माण्ड पूर्णांतर गते नारद अगस्त् संवादे ।
श्रीरामचंद्र कथितम् पंच-मुखेक एकमुखी हनुमत् कवचं ।।


#पँचमुखी_हनुमान_कवच


ॐ श्री पंचवदनायांजनेयाय नमः।

ॐ अस्य श्री पंचमुखहनुमत्कवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्रीछन्दः,पंचमुखविराट्हनुमान्‌ देवता, ह्रीं बीजं, श्रीं शक्ति, क्रौं कीलकं, क्रूं कवचं, क्रैं अस्राय फट् इति दिग्बन्धः ॥

श्री गरुड उवाच -

अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि श्रृणुसर्वांगसुन्दरि ।
यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमतः प्रियम्‌ ॥1॥
पंचवक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम्‌ ।
बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिद्धिदम्‌ ॥2॥
पूर्वंतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम्‌ ।
दंष्ट्राकरालवदनं भृकुटीकुटिलेक्षणम्‌ ॥3॥
अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम्‌ ।
अत्युग्रतेजोवपुषं भीषणं भयनाशनम्‌ ॥4॥
पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुंडं महाबलम्‌॥
सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम्‌ ॥5॥
उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम्‌ ।
पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम्‌ ॥6॥
ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवांतकरं परम ।
येन वक्त्रेण विप्रेंद्र तारकाख्यं महासुरम्‌ ॥7॥
जघान शरणं तत्स्यात्सर्वशत्रुहरं परम्‌ ।
ध्यात्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम्‌ ॥8॥
खंग त्रिशूलं खट्वांगं पाशमंकुशपर्वतम्‌ ।
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुम्‌ ॥9॥
भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुंगवम्‌ ।
एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम्‌ ॥10॥
प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम्‌ ।
दिव्यमाल्याम्बरघर दिव्यगन्धानुलेपनम्‌ ॥11॥
सर्वाश्चर्यमय देव हनुमद्विश्वतोमुखम्‌ ।
पश्चास्यमच्युतम नेकविचित्रवर्णं वक्त्रं
शशांकशिखरं कपिराजवयम ।
पीतांबरादिमुकुटैरूपशोभितांग
पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ॥12॥
मर्कटेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम्‌ ।
शत्रु संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर ॥13॥
ॐ हरिमर्कट मर्कट मन्त्रमिदं
परिलिख्यति लिख्यति वामतले ।
यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं
यदि मुश्चति मुश्चति वामलता ॥14॥

ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारणाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गुरुडाननाय सकलविषहराय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पंचवदनायोत्तरमुखायादिवराहाय सकलसम्पत्कराय स्वाहा ।
ऊँ नमो भगवते पंचवदनायोर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशंकराय स्वाहा ।

विनियोग -

ॐ अस्य श्री पंचमुखहनुमन्मंत्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः अनुष्टुप्‌छन्दः, पंचमुखवीरहनुमान्‌ देवता, हनुमानिति बीजम्‌, वायुपुत्र इति शक्तिः, अंजनीसुत इति कीलकम्‌, श्रीरामदूतहनुमत्प्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । इति ऋष्यादिकं विन्यस्य ।

करन्यास -

ॐ अंजनीसुताय अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ वायुपुत्राय मध्माभ्यां नमः ।
ॐ अग्निगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ पंचमुखहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः ।

अंगन्यास-

ॐ अंजनीसुताय हृदयाय नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ वायुपुत्राय शिखायै वंषट् ।
ॐ अग्निगर्भाय कवचाय हुं ।
ॐ रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ पंचमुखहनुमते अस्राय फट् ।
पंचमुखहनुमते स्वाहा ।
इति दिग्बन्धः ।

अथ ध्यानम्‌ -
.
वन्दे वानरनारसिहखगराट्क्रोडाश्ववक्रान्वितं दिव्यालंकरणं त्रिपश्चनयनं दैदीप्यमानं रुचा । हस्ताब्जैरसिखेटपुस्तकसुधाकुम्भांकुशादि हलं खटांगं फणिभूरुहं दशभुजं सर्वारिवीरापहम्‌ ॥1॥ इति ॥

अथ मंत्र-

ॐ श्रीरामदूतायांजनेयाय वायुपुत्राय महाबलपराक्र्रमाय सीतादुःखनिवारणाय लंकादहनकारणाय महाबलप्रचण्डाय फाल्गुनसखाय कोलाहलसकल ब्रह्माण्डविश्वरूपाय सप्तसमुद्रनिर्लंघनाय पिंगलनयनायामितविक्रमाय सूर्यबिम्बफलसेवनाय दुष्टनिवारणाय दृष्टिनिरालंकृताय संजीविनीसंजीवितांगदलक्ष्मणमहाकपिसैन्यप्राणदाय दशकण्ठविध्वंसनाय रामेष्टाय महाफाल्गुनसखाय सीतासहित रामवरप्रदाय षट्प्रयोगागम पंचमुखवीरहनुमन्मंत्रजपे विनियोगः ।

ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बंबंबंबंबं वौषट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय फंफंफंफंफं फट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय खेंखेंखेंखेंखें मारणाय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय लुंलुंलुंलुंलुं आकर्षितसकलसम्पत्कराय स्वाहा।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय धंधंधंधंधं शत्रुस्तम्भनाय स्वाहा ।
ॐ टंटंटंटंटं कूर्ममूर्तये पंचमुखवीरहनुमते परयन्त्रपरतंत्रोच्चाटनाय स्वाहा ।
ऊँ कंखंगंघंडं चंछंजंझंञं टंठंडंढंणं तंथंदंधंनं पंफंबंभंमं यंरंलंवं शंषंसंहं ळं क्ष स्वाहा। इति दिग्बंधः ।
ॐ पूर्वकपिमुखाय पंचमुखहनुमते टंटंटंटंटं सकलशत्रुसंहरणाय स्वाहा ।
ॐ दक्षिणमुखाय पंचमुखहनुमते करालवदनाय नरसिहाय ।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रुं ह्रैं ह्रौं ह्रः सकलभूतप्रेतदमनाय स्वाहा ।
ऊँ पश्चिममुखाय गरुडाननाय पंचमुखहनुमते मंमंमंमंमं सकलविषहराय स्वाहा ।
ॐ उत्तरमुखायादिवराहाय लंलंलंलंलं नृसिंहाय नीलकण्ठमूर्तये पंचमुखहनुमतये स्वाहा ।
ॐ उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुंरुंरुंरुंरुं रुद्रमूर्तये सकलप्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ।
ऊँ अंजनीसुताय वायुपुत्राय महाबलाय सीताशोकनिवारणाय श्रीरामचंद्रकृपापादुकाय
महावीर्यप्रमथनाय ब्रह्माण्डनाथाय कामदाय पंचमुखवीरहनुमते स्वाहा ।
भूतप्रेतपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिन्यन्तरिक्षग्रह परयंत्रपरतंत्रोच्चटनाय स्वाहा ।
सकलप्रयोजननिर्वाहकाय पंचमुखवीरहनुमते श्रीरामचन्द्रवरप्रसादाय जंजंजंजंजं स्वाहा ।
इदं कवचं पठित्वा तु महाकवच पठेन्नरः ।
एकवारं जपेत्स्तोत्रं सर्वशत्रुनिवारणम्‌ ॥15॥
द्विवारं तु पठेन्नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम्‌ ।
त्रिवारं च पठेन्नित्यं सर्वसम्पतकरं शुभम्‌ ॥16॥
चतुर्वारं पठेन्नित्यं सर्वरोगनिवारणम्‌ ।
पंचवारं पठेन्नित्यं सर्वलोकवशंकरम्‌ ॥17॥
षड्वारं च पठेन्नित्यं सर्वदेववशंकरम्‌ ।
सप्तवारं पठेन्नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम्‌ ॥18॥
अष्टवारं पठेन्नित्यं मिष्टकामार्थसिद्धिदम्‌ ।
नववारं पठेन्नित्यं राजभोगमवाप्युनात्‌ ॥19॥
दशवारं पठेन्नित्यं त्रैलोक्यज्ञानदर्शनम्‌ ।
रुद्रावृत्तिं पठेन्नित्यं सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम्‌ ॥20॥
कवचस्मतरणेनैव महाबलमवाप्नुयात्‌ ॥21॥
॥ सुदर्शनसंहितायां श्रीरामचन्द्रसीताप्रोक्तं श्री पंचमुखहनुमत्कवचं संपूर्ण ॥


#एकादशमुखी_हनुमान_कवच


॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

लोपामुद्रोवाच-

कुम्भोद्भव दयासिन्धो श्रुतं हनुमतः परम् । यन्त्रमन्त्रादिकं सर्वं त्वन्मुखोदीरितं मया ॥१॥
दयां कुरु मयि प्राणनाथ वेदितुमुत्सहे ।कवचं वायुपुत्रस्य एकादशमुखात्मनः ॥२॥
इत्येवं वचनं श्रुत्वा प्रियायाः प्रश्रयान्वितम् । वक्तुं प्रचक्रमे तत्र लोपामुद्रां प्रति प्रभुः ॥३॥
अगस्त्य उवाच -
नमस्कृत्वा रामदूतं हनुमन्तं महामतिम् । ब्रह्मप्रोक्तं तु कवचं शृणु सुन्दरि सादरम् ॥४॥
सनन्दनाय सुमहच्चतुराननभाषितम् । कवचं कामदं दिव्यं सर्वरक्षोनिबर्हणम् ॥५
सर्वसम्पत्प्रदं पुण्यं मर्त्यानां मधुरस्वरे । ॐ अस्य श्रीकवचस्यैकादशवक्त्रस्य धीमतः ॥६॥
हनुमत्कवचमन्त्रस्य सनन्दनऋषिः स्मृतः । प्रसन्नात्मा हनूमांश्च देवताऽत्र प्रकीर्तिता ॥७॥
छन्दोऽनुष्टुप् समाख्यातं बीजं वायुसुतस्तथा । मुख्यः प्राणः शक्तिरिति विनियोगः प्रकीर्तितः ॥८॥
सर्वकामार्थसिद्ध्यर्थे जप एवमुदीरयेत् ।

विनोयोग -

ॐ अस्य श्रीएकादशवक्त्रहनुमत्कवचमन्त्रस्य सनन्दनऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, प्रसन्नात्मा हनूमान् देवता, वायुसुतो बीजं, मुख्यः प्राणः शक्तिः सर्वकामार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास-

ॐ सनन्दनाय ऋषये नमः शिरसि, ॐ अनुष्टुब्छन्दसे नमो मुखे, ॐ प्रसन्नात्महनुमद्देवतायै नमो हृदि, ॐ वायुसुतबीजाय नमो गुह्ये, ॐ मुख्यप्राणशक्तये नमः पादयोः, ॐ सर्वकामार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

करन्यास-

ॐ स्फ्रेंबीजं शक्तिधृक् पातु शिरो मे पवनात्मजः इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः, ॐ क्रौंबीजात्मा नयनयोः पातु मां वानरेश्वरः इति तर्जनीभ्यां नमः, ॐ क्षंबीजरूपी कर्णौ मे सीताशोकविनाशनः इति मध्यमाभ्यां नमः, ॐ ग्लौंबीजवाच्यो नासां मे लक्ष्मणप्राणदायकः इत्यनामिकाभ्यां नमः, ॐ वं बीजार्थश्च कण्ठं मे अक्षयक्षयकारकः इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः, ॐ ऐं बीजवाच्यो हृदयं पातु मे कपिनायकः इति
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदयादिन्यास-

ॐ स्फ्रेंबीजं शक्तिधृक् पातु शिरो मे पवनात्मजः इति हृदयाय नमः, ॐ क्रौंबीजात्मा नयनयोः पातु मां वानरेश्वरः इति शिरसे स्वाहा, ॐ क्षंबीजरूपी कर्णौ मे सीताशोकविनाशनः इति शिखायै वषट्,
ॐ ग्लौंबीजवाच्यो नासां मे लक्ष्मणप्राणदायकः इति कवचाय हुम्, ॐ वं बीजार्थश्च कण्ठं मे अक्षयक्षयकारकः इति नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ऐं बीजवाच्यो हृदयं पातु मे कपिनायकः इत्यस्त्राय फट् ।

दिग्बन्धन

ध्यान-

उद्यद्भानुसमानदीप्तिमनघं श्रीरामपादाम्बुजध्यानासक्तमनेकवानरभटैः संसेवितं सर्वदा ।
नादेनैव निशाचरानविरतं संतर्जयन्तं मुदा नानाभूषणभूषितं पवनजं वन्दे सुमन्दस्मितम् ॥

कवचम्-

ॐ स्फ्रेंबीजं शक्तिधृक् पातु शिरो मे पवनात्मजः ॥९॥
क्रौंबीजात्मा नयनयोः पातु मां वानरेश्वरः । क्षंबीजरूपी कर्णौ मे सीताशोकविनाशनः ॥१०॥
ग्लौंबीजवाच्यो नासां मे लक्ष्मणप्राणदायकः । वं बीजार्थश्च कण्ठं मे अक्षयक्षयकारकः ॥११॥
ऐं बीजवाच्यो हृदयं पातु मे कपिनायकः । वं बीजकीर्तितः पातु बाहू मे चाञ्जनीसुतः ॥१२॥
ह्रां बीजं राक्षसेन्द्रस्य दर्पहा पातु चोदरम् ।ह्र्सौं बीजमयो मध्यं मे पातु लङ्काविदाहकः ॥१३॥
ह्रीं बीजधरो गुह्यं मे पातु देवेन्द्रवन्दितः । रं बीजात्मा सदा पातु चोरू वारिधिलङ्घनः ॥१४॥
सुग्रीवसचिवः पातु जानुनी मे मनोजवः । पादौ पादतले पातु द्रोणाचलधरो हरिः ॥१५॥
आपादमस्तकं पातु रामदूतो महाबलः । पूर्वे वानरवक्त्रो मामाग्नेय्यां क्षत्रियान्तकृत् ॥१६॥
दक्षिणे नारसिंहस्तु नैर्ऋत्यां गणनायकः । वारुण्यां दिशि मामव्यात् खगवक्त्रो हरीश्वरः ॥१७॥
वायव्यां भैरवमुखः कौबेर्यां पातु मां सदा । क्रोडास्यः पातु मां नित्यमीशान्यां रुद्ररूपधृक् ॥१८॥
ऊर्ध्वं हयाननः पातु त्वधः शेषमुखस्तथा । रामास्यः पातु सर्वत्र सौम्यरूपी महाभुजः ॥१९॥

फलश्रुति-

इत्येवं रामदूतस्य कवचं प्रपठेत् सदा । एकादशमुखस्यैतद् गोप्यं वै कीर्तितं मया ॥२०॥
रक्षोघ्नं कामदं सौम्यं सर्वसम्पद्विधायकम् । पुत्रदं धनदं चोग्रशत्रुसंघविमर्दनम् ॥२१॥
स्वर्गापवर्गदं दिव्यं चिन्तितार्थप्रदं शुभम् । एतत् कवचमज्ञात्वा मन्त्रसिद्धिर्न जायते ॥२२॥
चत्वारिंशत्सहस्राणि पठेच्छुद्धात्मना नरः । एकवारं पठेन्नित्यं कवचं सिद्धिदं महत् ॥२३॥
द्विवारं वा त्रिवारं वा पठन्नायुष्यमाप्नुयात् । क्रमादेकादशादेवमावर्तनजपात् सुधीः ॥२४॥
वर्षान्ते दर्शनं साक्षाल्लभते नात्र संशयः । यं यं चिन्तयते चार्थं तं तं प्राप्नोति पूरुषः ॥२५॥
ब्रह्मोदीरितमेतद्धि तवाग्रे कथितं महत् ॥२६॥
इत्येवमुक्त्वा कवचं महर्षिस्तूष्णीं बभूवेन्दुमुखीं निरीक्ष्य ।
संहृष्टचित्तापि तदा तदीय पादौ ननामातिमुदा स्वभर्तुः ॥२७॥
॥ इति श्रीअगस्त्यसंहितायाम् एकादशमुखहनुमत्कवचं सम्पूर्णम् ॥

Sunday, October 20, 2019

काव्य योग

#काव्य_योग

चन्द्रमा, शुक्र, बुध और बृहस्पति का प्रभाव
कुण्डली में लग्न, तृतीय, पँचम दशम भावों में हो
तो काव्य योग बनता है।

ऐसा जातक काव्य के गुणों वाला होता है।
लेखन कला अच्छी होती है।

लेखन कला की रुचि कुण्डली के ग्रहों पर निर्भर होती है
कि जातक को कैसा लेखन पसन्द है।

जातक को दार्शनिकता पसन्द है या कल्पना पसन्द है।

इन सब गुणों का निर्णय कुण्डली के ग्रहों के अनुसार होता है।

कुछ मंगल द्वारा प्रभावित व्यक्ति वीर रस से भरे होंगे
तो शनि वाले उदासीन कवि या लेखक होंगे।

शुक्र वाले श्रृंगार रस वाले होंगे तथा चन्द्रमा वाले कल्पना वाले होंगे।

बुध वाले मजकिया और तार्किक कटाक्ष वाले कवि या लेखक होते हैं।


#लेखक के लिए #तृतीय_भाव तथा #पँचम_भाव देखा जाता है।

जब दिमाग (पँचम भाव) में कुछ अच्छा होगा तभी तो हाथ (तृतीय भाव) कुछ लिखेंगे।

आपके हाथ क्या पसन्द पसन्द करते हैं?

यह तृतीय भाव तथा पँचम भाव पर निर्भर करता है।

अगर खुद का दिमाग इस्तेमाल करना ना आये और तृतीय भाव में लेखन वाले ग्रह का गुण हो तो जातक खुद को रचना ना लिखकर दूसरों के द्वारा लिखा गया ही कॉपी पेस्ट कर देता है।


लेखन या रचना के लिए #बृहस्पति (दार्शनिकता), #चन्द्रमा (कल्पना), #बुध (तर्क, व्यंग), #शुक्र ( सौंदर्य और सजावट ) की आवश्यकता होती है।


जिसके लग्न, तृतीय, पँचम, दशम भाव में इनका प्रभाव हो जाये तो जातक अच्छे सोच विचार से लिखता है।


प्रस्तुत कुण्डली DrAkhil Jain जी की है जो एक #डॉक्टर भी हैं तथा एक बहुत अच्छे #कवि भी हैं जो अक्सर #न्यूज_चैनल्स में अपनी कविताओं की प्रस्तुति देते हैं तथा #कवि_सम्मेलनों में #हास्यात्मक प्रस्तुति देते हैं।


इनकी कुण्डली के कुछ पॉइंट्स -

जन्म - 9 अक्तूबर 1980
समय - दोपहर 12:06 बजे
स्थान - सागर मध्यप्रदेश


[1] सबसे पहली बात कि ये स्वयं एक डॉक्टर हैं और #टीवी_चैनल पर प्रस्तुति क्यों दे पाते हैं?

इसका कारण है इनकी कुण्डली में बहुत जबरदस्त राजयोग बना है जिसे #शँख_राजयोग कहते हैं।

शँख राजयोग के बारे में एक आर्टिकल लिख चुका हूँ जिसका लिंक ये है -

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2191600584390480&id=100006216785535

धनु लग्न की कुण्डली में दशम भाव में सूर्य बृहस्पति की युति से ये राजयोग बना है जिसके कारण इनको न्यूजचैनल्स में प्रस्तुति का अवसर मिलता है।

[2] दशम भाव में सूर्य और शनि दोनों मैडिकल वाले ग्रह हैं जो इनको डॉक्टर बना रहे हैं।


[3] अब बात आती है कवित्व की, तो इनके दशम भाव में बृहस्पति और चन्द्रमा का गजकेसरी योग है जिसके कारण चन्द्रमा की कल्पना को दार्शनिकता मिल गई।

दशम से बृहस्पति चन्द्रमा की चौथे भाव को सीधी दृष्टि जा रही है जो मन को मजबूत बना रही है क्योंकि चतुर्थ भाव मन से सम्बंधित होता है।

मन मजबूत होगा तभी तो कुछ स्थिरता आएगी और कुछ क्रिएट करने का मन करेगा।

[4] पँचम भाव बुद्धि का होता है जिस पर तर्क, व्यंग्य और हास्यात्मक रचना वाले बुध ग्रह की दृष्टि है जो मस्तिष्क में ऐसे ही तर्क वाले विचार, व्यंग्य वाले विचार उत्पन करेगा।

[5] नवम भाव में बैठे शुक्र की दृष्टि तृतीय भाव पर पड़ रही है जो कि हाथों और बाजुओं का होता है।

जब भुजाओं में कलात्मक ग्रह देखेगा तो बाजुओं में कला होगी, रचना होगी, मनोरंजन होगा, ऐसा जातक वाद्य बजाने में एक्सपर्ट, लेखन में एक्सपर्ट तथा चित्रकारी में भी एक्सपर्ट होता है।

[6] तृतीय भाव का स्वामी शनि द्वितीय भाव का स्वामी भी है जो दशम भाव में है।

द्वितीय भाव वाणी का होता है तृतीय भाव लेखन का होता है जिसका दशम भाव में जाकर लग्नेश बृहस्पति की युति सहित वाणी और पराक्रम से भी प्रसिद्धि दे रहा है।

तृतीय भाव के कारण कविता लिखी और द्वितीय भाव के कारण बोली।

[7] कवियों के कटाक्ष बहुत जबरदस्त होते हैं, कई बार तो सामने वाला नाराज भी हो जाता है।

इसका कारण वाणी स्थान में केतु होना है क्योंकि केतु वाणी स्थान में बहुत कड़वी और चुभने वाले वाक्यात निकालने में एक्सपर्ट बनाता है।

[8] इस प्रकार का योग अगर किसी और की कुण्डली में होता तो आवश्यक नहीं है कि वो कवि ही होता।

कला दूसरा क्षेत्र भी अपनाया जा सकता है।

लेखनकला, काव्यात्मकता, वादनकला, चित्रकला आदि कलाओं के प्रकार हैं।

देश, काल और पात्रता के अनुसार व्यक्ति कला की अन्य फील्ड भी चुन सकता है।

[9] ये स्वयं एक पत्रिका प्रकाशन के एडिटर भी हैं, इनके गुणों के कारण बहुत से लेखक या कवि इनसे अपनी रचनाओं में सुधार भी करवाते हैं।

कविता, दोहा, सवैया, छंद आदि कुछ भी हो, तुरन्त सुधार हो भी जाता है और तुरन्त क्रिएशन भी हो जाती है।

कारण यह है कि इन सब ग्रहों के कारण बुद्धि अच्छी है जिसमें रचनाओं को समझने की काबिलियत है और उसका सही उपयोग करना आता है।

Monday, October 14, 2019

दुर्गा देवी वाहन श्री सिंह स्तोत्र

#सिंह_स्तोत्र

#दुर्गा_पूजा के समय इस स्तोत्र का 1 बार पाठ करने से देवी प्रसन्न होती है।

दुर्गापूजा के समय #देवीवाहन #श्री_शेर_सिंह_जी का पूजन करना भी जरूरी है।

सिंह पूजन दुर्गा पूजन से पहले किया जाता है क्योंकि शेर दुर्गा का वाहन और आसन है।

किसी भी देवी देवता का जब आवाहन जब पूजा के समय होता है तो उसे आसन भी दिया जाता है।

अतः दुर्गा ऐसी शक्ति है जिसका #वाहन_और_आसन_एक_ही_है_जो_निर्जीव_ना_होकर_सजीव_है।

निर्जीव का पूजन हो ना हो, लेकिन सजीव का पूजन आवश्यक है।

जिन भी शक्तियों का आसन सजीव है, उसका पूजन आवश्यक है।

अतः दुर्गा भक्त इस स्तोत्र का पाठ पहले करें।

#दुर्गासप्तशती का पाठ करने वाले हर अध्याय से पहले एक बार इसका पाठ जरूर करें।



किसी के पास #शेर_का_नाखून या #शेर_का_बाल हो तो वो उस नाखून या बाल को पूजा स्थान में तांबे के किसी पात्र में रखें और धूप दिया जलाकर उसका पूजन करे।

सिंह स्तोत्र का 51 बार पाठ करें।

उसके बाद वो नाखून या बाल चांदी के ताबीज में डालकर गले मे पहन लें।

बच्चे नींद में नहीं डरेंगे, बुरे सपने नहीं आएंगे, जानवरों का भय नहीं होगा।


अगर आप रोज इसका 1 बार पाठ करते हैं तो आप चाहे जितने मर्जी भयँकर जंगल में हों, आपको कोई भी जानवर नुक्सान नहीं पहुंचा पायेगा।

शेर भी आपको मिल गया तो कुछ नहीं कर पायेगा।


जिस मित्र ने ये स्तोत्र बताया है, उसने ये बात कही थी कि ऋषि मुनि जंगल में इस स्तोत्र का पाठ करते थे और शेर से लेकर अन्य जो भी हिंसक जानवर उनके करीब आता था तो जब तक वो उनके करीब रहता था, तब तक वो अपनी हिंसात्मक वृति छोड़ देता था।



#स्तोत्र -


॥ देवीवाहन (सिंह) ध्यानम् ॥

ग्रीवायां मधु सूदनोऽस्य शिरसि श्री नीलकण्ठः स्थितः ,
श्री देवी गिरिजा ललाट फलके वक्षः स्थले शारदा ।
षड्वक्त्रो मणिबन्ध संधिषु तथा नागास्तु पार्श्वस्थिताः ।
कीयस्य तु चाश्विनौ स भगवानसिंहो ममास्त्विष्टदः ॥१॥
यन्नेत्रे शशि भास्करौ वसुकुलं दन्तेषु यस्य स्थितम् ,
जिह्वायां वरुणस्तु हुं कृतिरयं श्रीचर्चिका चण्डिका ।
गण्डौ यक्ष यमौ तथौष्ठ युगलं सन्ध्याद्वयं पृष्ठके ,
वज्रोयस्य विराजते स भगवान सिंह ममास्त्विष्टदः ॥२॥
ग्रीवा सन्धिषु सप्तविंशति मितान्यक्षाणि साध्या हृदि ,
प्रौढा निभृणता तमोऽस्य तु महाक्रौर्यैसमा पूतनाः ।।
प्राणेयस्य तु मातरः पितृकुलं यस्यास्त्य पानात्मकं
रूपे श्री कमला कचेषु विमलास्ते केयूरे रश्मयः ॥३॥
मेरू: स्याद्वषर्णेब्धयस्तु जनने स्वेद स्थिता निम्नगाः ,
लांगूले सहदेवतैर्विलसिता वेदा बलं वीर्यकम् ।
श्रीविष्णोः सकला सुरा अपि यथा स्थानं स्थितायस्तु
श्री सिंहोऽखिल देवतामय वपुर्देवी प्रियः पातु माम् ॥४॥
यो बालग्रह पूतनादि भय हृद्यः पुत्र लक्ष्मी प्रदोयः ,
स्वप्न ज्वर रोगराजभय हृद्योऽमङ्गले मङ्गलः ।
सर्वत्रोत्तम वर्णनेषु कविभिर्यस्योपमा दीयते
देव्या वाहनमशेष रोगभयहत् सिंहो ममास्त्विष्टदः ॥५॥
सिंहस्त्वं हरिरूपोऽसि स्वयं विष्णुर्न संशयः ।
पार्वत्या वाहनस्त्वं ह्यतः पूजयामि त्वामहम् ॥

॥ इति श्री सिंह स्त्रोतम्॥

Sunday, October 13, 2019

तान्त्रिक का जीवन दुःखी रहता है।

#तान्त्रिक_का_जीवन_कभी_सुखी_नहीं_रहता_है।


नमस्कार मित्रों।


आप में से कुछ ऐसे मित्र भी होंगे जो तन्त्र मन्त्र का चमत्कार देखकर ये सोचते होंगे कि हम भी तान्त्रिक बनें।

[ #अपने_कर्म_के_जरिये_हम_भगवान_से_अपनी_किस्मत_लिखवाते_हैं।

जिसके कर्मानुसार उसकी किस्मत में तान्त्रिक बनना लिखा है तो उसको तान्त्रिक बनने से कोई नहीं रोक सकता है।

मैं किसी तान्त्रिक को गलत नहीं कहता, सबकी अपनी किस्मत और अपना कर्म है ]


आँखों देखी कुछ घटनाएँ आपके सामने प्रस्तुत हैं।


पहले एक कहानी जो #कॉलेज_टाइम में अपने सलेब्स में पढ़ी थी और #तान्त्रिक_सिद्धि की #हकीकत_बयान करती है।


#डॉक्टर_फॉस्टस बाय #क्रिस्टोफर_मार्लो

किसी को शौक हो तो वो किताब खरीद के पढ़ लेना।


शॉर्टकट स्टोरी -

एक बहुत विद्वान जर्मनी व्यक्ति जिसे डॉक्टर फॉस्टस के नाम से जाना जाता था, उसे किसी ने भूत प्रेत की सिद्धि से कुछ चमत्कार दिखाए।

डॉक्टर ने पर प्रभावित होकर तन्त्र मन्त्र  की खोज शुरूकर दी, उसे कुछ तान्त्रिक साधनाएं प्राप्त हुई।

उसने जैसे ही साधना किस तो उसके सामने #शैतान_का_दूत #मैफिस्टऑफिलिस प्रकट हो गया।

डॉक्टर ने उसे कहा कि तुम मेरा काम करोगे,

मैफिस्टऑफिलिस ने कहा कि मैं #शैतान के कहने पर काम करता हूँ, मुझे काम करवाना चाहते हो तो पहले शैतान से #डील करो।

मैफिस्टऑफिलिस ने डॉक्टर को शैतान से मिलवाया और डॉक्टर ने डील कर ली कि 22 साल तक मैफिस्टऑफिलिस डॉक्टर का काम करेगा और उसके बाद #डॉक्टर_की_आत्मा_अनन्तकाल के लिए #शैतान_की_गुलाम हो जाएगी।

डॉक्टर को एग्रीमेंट पर अपने खून से हस्ताक्षर करने थे।

हस्ताक्षर करने से पहले ही डॉक्टर के बाजू पर ईसा मसीह के रक्त के निशान बनने लगे कि #रुक_जाओ ये गलत है।

लेकिन डॉक्टर नहीं माना और उसने हस्ताक्षर कर दिए।

मैफिस्टऑफिलिस डॉक्टर का गुलाम बन गया और जैसा डॉक्टर कहता वैसा वो कर देता।

उसने मैफिस्टऑफिलिस को बोल के हवा में पुल बना दिये, बड़ी बड़ी इमारतें जादू से खड़ी कर दी।

वहाँ के सम्राट के पूर्वजों को जिन्दा कर के उनके छुपाए हुए खजाने निकलवा दिये।

बड़े बड़े कलाकारों लेखकों कवियों को जिन्दा कर के उनके गीत सङ्गीत कविता कहानी आदि का आनन्द उठाता था।

पूरे जर्मनी का #तान्त्रिक_सम्राट बन गया।


कुछ समय बाद मैफिस्टऑफिलिस काम करने से टलने लगा, डॉक्टर कुछ बोलता तो वो सिर्फ हंसता रहता।

डॉक्टर की शक्तियाँ जाने लगी, उसके 22 साल पूरे होने लगे, तो डॉक्टर दिन रात अपने अंजाम को सोचने लगा।

उसके बनाये पुल इमारतें गिरने लगी, उसके बनाये सोने के सिक्के मिट्टी में बदलने लगे।

सब कुछ स्वाहा हो गया।

डॉक्टर के 22 साल पूरे होने का आखरी दिन था।

डॉक्टर बहुत रो रहा था, अपने आप को कोस रहा था कि काश उस दिन सम्भल जाता, काश वो चेतावनी नजरंदाज ना की होती।

अपने आप को बहुत कोसता रहा।

रात के 12 बजने वाले थे और वो डर के मारे दहाड़ें मार मार के रो रहा था।

आख़िरकार आज शैतान उसकी आत्मा को #अनन्तकाल तक गुलाम बनाने के लिए आने वाला था।

नरक की आग में उसे ले जाने वाला था।

नरक में फटते ज्वालामुखी और आसमान से बरसते अंगारे, जहाँ जर तरफ से आग ही आग बरसती हो, वहाँ कोई अनन्तकाल तक कैसे रह सकता है।

आसमान को तरफ देखकर रो रहा था कि हे ईश्वर मुझे बचा ले।

आसमान में ईसा मसीह का खून फैला था, डॉक्टर के रहा था कि हे ईश्वर एक बून्द इस खून की मुझ पर बरसा दे, मैं नरक जाने से बच जाऊँगा।

कुछ बूंदें उसके पास आने लगी लेकिन जैसे ही डॉक्टर ने हाथ बढ़ाया तो वो बूँदें भी उससे दूर चली गई।


डॉक्टर के दुख का अन्त नहीं था, वो मानसिक वेदना उसको तोड़ रही थी।


12 बजे और नरक का दरवाजा डॉक्टर के सामने खुल गया।

मौत से सौदा हो चुका था, लेकिन मौत भी ऐसी जो कभी नहीं आएगी।

शैतान के दूतों ने डॉक्टर को पकड़ा और सीधा खींच के ले चले।

डॉक्टर रोता रहा चिल्लाता रहा लेकिन इसे रगड़ घसीट के नरक में ले गए और उसके निकलने का दरवाजा हमेशा के लिए बन्द हो गया।



सेम यही हाल तान्त्रिक साधना वाले का होता है।


एक मित्र ने पीर साधना की थी, उसने कहा कि पीर ने वचन देने से पहले उसकी किसी दूसरी शक्ति से बात करवाई थी।


तान्त्रिक का जीवन दुःखी क्यों रहता है?


ये सिद्धियाँ गले की हड्डी बन जाती हैं जिसे ना उगल सकते हैं ना निगल सकते हैं।


शुरू में अच्छा काम करेंगी, बाद में बेइज्जत करवा देंगी।


याद रखें - किसी भी तान्त्रिक के पास भूत-प्रेत, मसाण,  कर्णपिशाचिनी, प्रेतनी, चुड़ैल, आदि से ज्यादा कुछ नहीं होता है।

जो किसी बड़ी पदवी पर आसीन तान्त्रिक होता है या कोई तन्त्र गुरु आदि होते हैं तो उनके पास कुछ बड़े लेवल की साधना होती है लेकिन वो अपने चेलों को हमेशा छोटी सिद्धि ही करवाते हैं।

ऐसा समझिए कि कमिश्नर आपको चपरासी से कॉन्स्टेबल बना देता है।

कमिश्नर तो कॉन्स्टेबल की सब हरकत देख सकता है लेकिन कॉन्स्टेबल कमिश्नर की हर हरकत को नहीं देख सकता है।

इसी प्रकार छोटा तान्त्रिक कभी भी अपने गुरु की सिद्धि को नहीं समझ पायेगा कि उसके पास बड़ी सिद्धि है और उसे एक छोटी सिद्धि दी गई है।


कुछ बातें जो आँखों देखी हैं -

[1] मैंने ऐसा सुना था कि जब बड़ी कैटेगिरी के देवता की आप साधना करते हैं तो छोटा मोटा तान्त्रिक अपनी सिद्धि के जरिये भी आपके बारे में कुछ जानकारी नहीं बता सकता।

सबसे पहले तो ये बात है कि तान्त्रिक के पास शक्ति होती है वो उसे  जानकारी देती है आपके बारे में।

उसके पास भूत प्रेत पिशाच ही होंगे जो बताएंगे।

मेरे एक मित्र थे जिनके पास एक सिद्धि है, मुझे उस सिद्धि के बारे में बताया था कि उनके पास किस चीज की सिद्धि है।

उन्होंने एक बार मेरे बारे में बताना शुरू किया, मेरे पड़ोसी के साथ हुई घटनाएं भी बता दी।

फिर मुझे याद आया कि किसी बड़े देवी देवता का कवच पाठ करें तो सामने वाला आपके बारे में नहीं बता पायेगा।

मैंने उनको एक बात बताने के लिए कहा, उन्होंने मन्त्र पढ़ना शुरू किया।

मैंने भी तुरन्त ही मन में एक स्तुति शुरू कर दी।

वो मित्र हंस के बोले कि अरे भाई क्या कर रहे हो?

[ उनकी सिद्धि मेरा माइंड नहीं पढ़ पाई, और ना मेरे बारे में उनको डाटा मिला ]

मैंने कहा मैं कुछ नहीं कर रहा आप बताओ तो सही।

उन्होंने 4-5 ऑप्शन्स दिए लेकिन एक भी सही नहीं गया, जबकि पहले उनकी एक एक बात बिल्कुल सटीक जाती रही।

उसके बाद उन्होंने मना कर दिया कि रहने दो, अब इस टॉपिक को छोड़ दो।

आप भी

[2] कोई भी मन्दिर हो वहाँ पर जो सवारी आती है वो किसी भी देवी या देवता की नहीं होती है, भला इस मल मूत्र से भरे शरीर मे देवी देवता कैसे आकर बोल सकते हैं?

सवारी आने पर जो शक्ति बात करती है वो #नाहरसिंह_देवता होता है।

[ विष्णु अवतार भगवान नृसिंह और नाहरसिंह दोनों अलग हैं ]

एक औरत काफी पूजा पाठ करती थी, उसके शरीर में कम्पन पड़ने लगा और कमजोरी महसूस होने लगी।

उसका हसबंड उसको मन्दिर में ले गया जहाँ पुजारी को माता की सवारी आती थी। ( एक्चुअल में वो नाहरसिंह ही होता है)

उस औरत के बारे में पुजारी कहने लगा कि इसे जोगणी ( योगिनी ) की छाया पड़ी है।

पूजारी ने ट्रीटमैंट में पता नहीं क्या क्या बोल दिया।

घर में जब वो आया तो उसके पड़ोस का डॉक्टर भी ड्यूटी से आया और उसने उस लेडी को देखा तो सिम्पटम्स देख के सीधा बोला कि इसको टाइफाइड हो रहा है।

दूसरे दिन ना तन्त्र ना मन्त्र, सीधा विडल टैस्ट करवाया और टाइफाइड निकला।

दवाई खाई और लेडी ठीक।

अगर पूजारी की बॉडी में देवी होती तप सीधा बोलती इसको हॉस्पिटल ले जाओ।

वास्तव में वो लेडी दुर्गा माता का अगला स्तोत्र रोज पढ़ती थी।

जो भी अर्गला स्तोत्र का 11 बार पाठ कर के किसी भी तान्त्रिक के सामने बैठ जाये, तान्त्रिक उसके बारे में चवन्नी भर भी सही नहीं बता पायेगा अपनी सिद्धि से।

क्योंकि देवी की शक्ति भूत प्रेत से बड़ी है।

उस तान्त्रिक की कई सालों की तपस्या आपके 1 घण्टे के अर्गला स्तोत्र का जाप के सामने फेल हो जाएगी।


[3] मेरे जानने वाले एक तान्त्रिक को उसकी किसी सिद्धि ने बताया की मैं तुझे गड़ा धन दिलवा दूँगी।

उसको हमारे मण्डी जिले की हाटेश्वरी माता के मन्दिर जँगल में ले जाकर बोली गया कि यहाँ कच्चे हीरे हैं उन्हें निकाल लो।

पानी मे डाले रखना और 2 साल बाद वो हीरे में बदल जाएंगे।

जिसके पास सिद्धि होती है वो उसी की बात सीधी सुनता है, ना किताब खोलता ना किसी की बात और विश्वास करता।

कुछ कच्चे हीरे जैसे टुकड़े वहाँ निकले और 2-3 किलो टुकड़े वो गाड़ी में ले आये।

कहीं से एसिड लाया और जार में एक छोटा टुकड़ा डाल के देखा तो कुछ रासायनिक परिवर्तन हुआ।

उसने कई महीनों तक उनको पानी में डुबो के रखा।

कभी शीशे पर कट लगा के चैक करता कभी कुछ।


कोई कैमिस्ट्री एक्सपर्ट तान्त्रिक से मिलने आया था, उसने डिब्बे में देखा तो हंस पड़ा।

बोला कि भाई साहब ये #चूनापत्थर कहाँ से लाये हो?


पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।


[4] जब आपका बुरा वक्त चलता है तो ये सिद्धियाँ भी आओका साथ छोड़ती हैं।

जब इनका मूड काम करने का नहीं होता है तो तान्त्रिक को बहाना लगा देती हैं कि हमें किसी ने बाँध लिया है, हमारा बन्धन किया गया है।

आप मरने को मर जाओ, लेकिन आपका साथ नहीं देंगी।

इनको मुर्गे शराब का शौक होता है, बलि भूत प्रेत ही लेते हैं।

क्या किसी ने सुना कभी की कृष्ण ने बकरे या मुर्गे की बलि ली, श्री राम ने बलि माँगी?


एक तान्त्रिक और सन्त में बहुत फर्क होता है।

तान्त्रिक हर हफ्ते मुर्गा बोतल ले जाता और बलि देता था।


एक सन्त जी ने उसको सीधे ही एक बात कही।


बेटा वो तेरा भूत है वो खुद तेरे घर में खून के छींटे डालता है और तुझे बीमार भी करता है।

जब तू उससे कुछ पूछता है तो वो कह देता है कि तेरे पर किसी ने तन्त्र क्रिया कर दी है, उसकी काट करने के लिए मुर्गा बोतल लगेगा।

बेटा तेरे को किसी ने कुछ नहीं किया है, बस तेरा भूत बिगड़ गया है।

ये सारी जिन्दगी तेरा काम नहीं करेगा और तेरे से मुर्गे बोतल मंगवाता रहेगा।


आप भी देख लेना, किसी भी आदमी के तान्त्रिक बनने के बाद उस पर बार बार तन्त्र प्रहार होने को बात वो कहेगा।

उसके घर में कोई ना कोई बीमार रहेगा, या कोई ना कोई और समस्या रहेगी जिसको सॉल्व करने के लिये वो बलि आदि देता रहता है।


एक्चुअल में वो उसका पाला हुआ भूत प्रेत उसे उलझाने में लगा रहता है और खाने पीने के मजे लेता है।

भला कौन भूत किसी के लिए 24 घण्टे अपनी रगड़ाई करता रहे?


तान्त्रिक के आसपड़ोस में भी ऐसी समस्या बढ़ेगी और तान्त्रिक उसे सॉल्व करता है।

बदले में वही मुर्गा बोतल।

फैक्ट को ध्यान से देखना -

जहाँ तान्त्रिक नहीं होते हैं, वहाँ भूत प्रेत से ग्रसित लोग भी नहीं होते।


जैसे ही आपके आसपास तान्त्रिक मौजूद होंगे कोई ना कोई प्रेत बाधा से ग्रसित निकलेगा।


तान्त्रिक का जीवन इन्हीं शक्तियों में उलझ रहता है।


जब इन शक्तियों की सम्भालना मुश्किल होने लगता है तो वो किसी और को ढूंढते हैं जो इनकी सिद्धि को ले ले।

कभी कभी तो वो डर के मारे अपने बच्चों में भी इन सिद्धियों को ट्रांसफर देते हैं।

मौत का डर बुरा नहीं है।

लेकिन इन शक्तियों के द्वारा दुर्दशा होने का डर बहुत भयँकर होता है।


अंदर ही अंदर खाये जाता है लेकिन किसी को बता नहीं सकते।


इसलिए चमत्कारों की दुनियाँ से निकल जाएं।


सद्कर्म करें और कर्म के साथ भक्ति करें।


जीवन अमूल्य है, इसको सीवरेज पाइप की गटर गन्दगी खाकर बिताने की ना सोचें।

Friday, October 11, 2019

धनपति कुबेर साधना

#कुबेर_साधना


[#नोट -

 #लालची_लोग_इसे_कर_ही_नहीं_पायेंगे।

#जरूरतमंद_के_लिए_बहुत_अच्छा_सपोर्ट_मिलेगा।


#प्रैक्टिकल_एक्सपीरियंस


मैं कभी नहीं कहता कि लक्ष्मी साधना करे  या कुबेर साधना करें तो आप करोड़पति बन जाएंगे।

ना आपके सामने देवी देवता आकर ये कहेगा कि #तथास्तु।

ऐसा होता भी नहीं है।

लेकिन #धन_की_समस्या इन साधनाओं से #कन्ट्रोल होती देखी गई है।


कुछ समय पहले मेरे एक क्लाईंट को पैसे की दिक्कत थी।

कुण्डली में #छठे_भाव का प्रभाव चला था और #लोन हो गया था।

पैसा खर्च अधिक हो रहा था और पैसे का सही यूज नहीं हो पा रहा था, इंस्टॉलमेंट में पैसा कट जाता था और बचत कम होती थी।


तब उन्होंने ये 40 दिन की साधना की थी।

उनके खर्च कम होने लगे, पैसा सही जगह यूज होने लगा और बचत भी होती गई।

छठे भाव के प्रभाव का जो समय निकला उसमें पूरा समय पैसे की समस्या कर्ज के कारण बनी रही लेकिन साधना के इफेक्ट से वो समय बहुत ही कम परेशानी में निकला।

ऐसा कभी नहीं होता है कि आप साधना करें और करोड़ों की लॉटरी लग जाये या जमीन खोदने पर सोने के सिक्कों से भरा घड़ा मिल जाये।

इन साधनाओं से पैसे का सही यूज होने लगता है, वेस्टेज कम होती है और बचत होती है।

जरूरतमंदों को लालच नहीं होता इसलिए उनकी साधना फलीभूत हो जाती है।


#साधना_विधि -

किसी भी #बृहस्पतिवार को या #दीपावली_धनत्रयोदश को सुबह स्नान कर के #सफेद_वस्त्र पहनकर कुएं के पानी से [ कुआं अवेलेबल नहीं तो ट्यूबवेल का पानी, अगर ट्यूबवेल भी नहीं तो नल का पानी भी चलेगा, ( अब कोई वाटर प्योरिफायर की ऑप्शन मत पूछना)] कुबेर यंत्र को स्नान करवा के सफेद वस्त्र पर स्थापित करें, पंचोपचार से पूजन करें।

हाथ मे जल लेकर संकल्प आदि करें।

सामने घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर सफेद आसन पर पूर्वाभिमुख हो के कुबेर मंत्र का ग्यारह माला जप करे।

जप करने के पहले 5 बार सस्वर #कनकधारा_स्त्रोत का पाठ करे।

मंत्र जप #स्फटिक_माला या #चंदन_माला से करना है।

अगले बृहस्पतिवार  तक निरंतर इस क्रिया को कर साधना का समापन करे।

यदि दीपावली को शुरू किया है तो अगले हफ्ते उसी वार को समापन करे।

मंत्र का दशांश हवन करे।

अगर कोई बड़े प्रोसीजर में करना चाहे तो 40 दिन कर सकता है और 40 दिन के जाप का दशांश हवन करना पड़ेगा।

साधना पूर्ण होने पर यंत्र को पूजास्थान गल्ला या तिजोरी
में स्थापित कर दें।

प्रतिदिन कनकधारा स्त्रोत का तथा उपरोक्त
मंत्र का एक बार उच्चारण पाठ अवश्य करें।

ऐसा करने पर हमेशा समृद्धि बनी रहती है।

#मन्त्र -

ॐ नमः वैष्णौराय कनकधारायै अक्षय समृद्धि
देहि-देहि कुबेराय नमः।


#कनकधारा_स्तोत्र

अंग हरे: पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम ।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदाsस्तु मम मंगलदेवताया:।
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवाया:।
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदान दक्षमानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोsपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षण मीक्षणार्ध मिन्दीवरोदर सहोदरमिन्दिराया:।आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दमनिमेषमनंगतन्त्रम।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रम भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनाया:।
बाह्यन्तरे मुरजित: श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोsपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयाया:।
कालाम्बुदालि ललितोरसि कैटभारे र्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव ।
मातु: समस्तजगतां महनीय मूर्तिर्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।
प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धम मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।
दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा-मस्मिन्नकिंचन विहंगशिशौ विषण्णे
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह:।
इष्टा विशिष्टमतयोsपि यया दयार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते
दृष्टि: प्रह्रष्टमकमलोदरदीप्तिरिष्टाम पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया:।
गीर्देवतेति गरुड़ध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैक गुरोस्तरुण्यै।
श्रुत्यै नमोsस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोsस्तु रमणीयगुणार्णवायै
शक्त्यै नमोsस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्टयै नमोsस्तु पुरुषोत्तम वल्लभायै।
नमोsस्तु नालीकनिभाननायै नमोsस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोsस्तु सोमामृतसोदरायै नमोsस्तु नारायणवल्लभायै।
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये।
यत्कटाक्षसमुपासनाविधि: सेवकस्य सकलार्थसम्पद: ।
सन्तनोति वचनांगमानसैस्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम।
दिग्घस्तिभि: कनककुम्भमुखाव सृष्टस्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुतांगीम ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धि पुत्रीम।
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरंगितै रपांगै:।
अवलोकय मामकिंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया:।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम ।
गुणाधिका गुरुतर भाग्यभागिनो ते भुवि बुधभाविताशया:।

Tuesday, October 8, 2019

केशपतन योग गंजापन योग

#केशपतन_योग।

#गंजापन



गंजेपन का सबसे बड़ा कारण #सूर्य है।

जन्म कुण्डली में लग्न का सम्बन्ध सूर्य से होगा तो मैक्सिमम #आदमी गंजा होगा।

#औरत की कुण्डली में इस तरह का कॉम्बिनेशन बनेगा तो मैक्सिमम उसके #बाल_झड़ेंगे या #माँग_चौड़ी होगी या बालों की ग्रोथ बहुत अच्छी नहीं होगी।

सूर्य पीड़ित होने पर गंजापन बहुत ज्यादा देखा गया है।

लग्न, द्वितीय या सप्तम भाव में राहु केतु से पीड़ित सूर्य 100 में से 95 पुरुषों को गंजापन देगा।

यह भी देखा गया है कि लग्न या सप्तम में नीच सूर्य भी गंजापन देता है।

लग्न पर सूर्य का प्रभाव होने पर भी यदि गंजापन ना हुआ तो माथा चौड़ा जरूर होगा।


कुछ ऐसे कॉम्बिनेशन देखे गए कि जिनमें गंजापन बहुत सटीक निकला

कुछ मित्रों ने कहा कि बाल झड़ने का कारण बुध का खराब होना है क्योंकि बुध त्वचा का कारक है और अस्त होने पर त्वचा में बाल सम्भालने की ताकत नहीं रहती है जिसके कारण गंजापन आ जाता है।

कुछ ने कहा शुक्र,चन्द्रमा अस्त होने के कारण गंजापन आ जाता है क्योंकि शुक्र श्रृंगार का कारक है।

जबकि मुख्य कारण सूर्य ही निकलेगा।

किसी की भी कुण्डली में यदि बुध शुक्र चन्द्रमा आदि चतुर्थ भाव से  दशम भाव के बीच अस्त होंगे तो गंजापन नहीं आएगा।

गंजापन तभी आएगा जब सूर्य लग्न, द्वितीय, सप्तम और द्वादश भाव में होगा, तभी तो चन्द्रमा, बुध, शुक्र अस्त होंगे क्योंकि बुध सूर्य से अधिकतम दूसरे भाव की दूरी तथा शुक्र अधिकतम तीसरे भाव की दूरी तक ही जाता है।

कोई भी ग्रह सूर्य के नजदीक होने कारण ही अस्त होता है।

भले ही ये ग्रह अस्त ना हो, तो भी लग्न, द्वितीय, सप्तम और द्वादश भाव का सूर्य अधिकतम गंजा कर देगा।

द्वादश में सूर्य वाला व्यक्ति कम गंजा देखा गया है लेकिन लग्न, द्वितीय और सप्तम वाले मैक्सिमम गंजे हुए देखे हैं।

लग्न और द्वितीय भाव से चेहरा देखा जाता है।

सप्तम भाव से सूर्य की सातवीं दृष्टि लग्न पर पड़ती है।

यदि जातक गंजा ना हुआ तो भी माथा अधिक चौड़ा कर देगा।


कुछ कॉम्बिनेशन जो गंजे व्यक्तियों पर देखे गए हैं।

[1] मकर लग्न में बुध तथा द्वितीय भाव मे शुक्र सूर्य केतु।

[2] सिंह लग्न में द्वितीय भाव में सूर्य केतु शुक्र।

[3] कर्क लग्न में सूर्य।

[4] मेष लग्न में सप्तम भाव में सूर्य केतु।

[5] सिंह लग्न में द्वितीय भाव का सूर्य बुध।

[6] तुला लग्न में सप्तम भाव में सूर्य राहु।

[7] सिंह लग्न वालों पर विशेष रूप से ये बात देखी गई है कि सूर्य किसी भी भाव में पीड़ित हो, कुछ हद तक बाल झड़े हुए देखे हैं या जातक गंजा हो गया है।

[8] एक कंडीशन में ये देखा गया कि कर्क लग्न में सूर्य था और 42 वर्ष की आयु तक बाल नहीं झड़े थे।

इसका कारण ये नोटिस किया गया कि द्वादश भाव में बृहस्पति और द्वितीय में बुध था।

लग्न के दोनों ओर द्वितीय और द्वादश भाव में शुभ ग्रह हों तो #शुभकर्तृ_योग बनता है, जिसके कारण शायद गंजापन तो नहीं आया लेकिन माथा चौड़ा था।


प्रस्तुत कुण्डली वाला लड़का भी गंजा हो जाएगा क्योंकि इसके बाल झड़ना शुरू हो चुके हैं।

जन्म - 28 जनवरी 1998
समय - 7:30 सुबह
स्थान - मण्डी हिमाचल प्रदेश


[1] मकर लग्न में शत्रु राशि का सूर्य है।

यही काफी है।

स्वधनार्जन योग

#स्वधनार्जन_योग।

#परिभाषा - लग्न, द्वितीय, तृतीय तथा एकादश भाव के स्वामी
यदि लग्न, द्वितीय, तृतीय अथवा एकादश भाव में एकसाथ अच्छी स्थिति में हो तो जातक अपने पराक्रम से स्वतन्त्र रूप से धन कमाता है।

ऐसा जातक दूसरे का पास नौकरी नहीं कर पाता है।

दूसरे के पास काम करना भी चाहे तो भी नहीं कर पाता है और घूम फिर के अपने सामर्थ्य पर ही निर्भर हो जाता है।

अपनी कमाई के साधन अपने गुणों के अनुसार स्वयं निर्मित करता है।

ऐसे जातक को #सैल्फएम्प्लॉइड कहा जाता है।

ऐसे जातक अच्छे #बिजनसमैन या अच्छे #कलाकार हो सकते हैं।

लग्न - शरीर
द्वितीय भाव - धन
तृतीय भाव - पराक्रम मेहनत और स्किल्स
एकादश भाव - कमाई

जब भी इन चारों सबका कॉम्बिनेशन एकसाथ हो या कम से कम 2 भावों का कॉम्बिनेशन उपरोक्त भावों में बने ( कम से कम एक ग्रह धन सम्बन्धित होना आवश्यक है) तो जातक अपने #बलबूते पर धन कमाता है


प्रस्तुत कुण्डली #मण्डी_हिमाचल_प्रदेश का #युवा_कलाकार Ranjeet Soni की है जिसमें उपरोक्त योग बना है।

अपनी मेहनत से अभी दूसरा गाना #शनिदेवा रिलीज़ किया है।

जिसका लिंक - https://youtu.be/NY5H-FlOBBw


प्रस्तुत कुण्डली के कुछ पॉइंट्स-

जन्म - 17 अप्रैल 1995
समय - 00:30 बजे
स्थान - मण्डी हिमाचल प्रदेश।


[1] धनु लग्न की कुण्डली में द्वितीय तथा तृतीय भाव का स्वामी शनि एकादश भाव के स्वामी शुक्र के साथ मिलकर यह योग बना रहा है।

[2] धन का स्वामी और पराक्रम का स्वामी एक ही ग्रह शनि है जो पराक्रम भाव में धन का प्रभाव दे रहा है, या यूं कहें कि पराक्रम का प्रभाव धन में दे रहा है जिससे कि जातक अपनी मेहनत से धन कमाएगा।

[3] एकादश भाव का स्वामी जब धन भाव और तृतीय भाव के स्वामी से साथ तृतीय भाव में बैठा है तो मेहनत से कमाई होगी धन के माध्यम से धन आएगा।

इसका उदाहरण रणजीत सोनी की स्वयं की लाइफ में है कि पहले म्यूजिक प्रोग्राम्स में #गिटार बजाकर कमाई की।

उसके बाद स्वयं ही गाना लिखा और उसकी धुन भी बनाई।

स्वयं का कमाया हुआ पैसा लगाकर एक अच्छे संगीत से गाने का संगीत तैयार करवा के गाना रिजिल किया।

[4] तृतीय भाव मनोरंजन खेलकूद का भी होता है।

तृतीय भाव में मित्र शनि की राशि का शुक्र होने से संगीत की मौज पसन्द है क्योंकि शुक्र गीत संगीत का कारक है, और तृतीय भाव में संगीत बजाने का स्किल और कलाकारी वाला बना रहा है।

[5] द्वितीय भाव का स्वामी गाने के लिए देखा जाता है, अतः द्वितीयेश के साथ शुक्र का होना गायकी में भी रुचि दे रहा है।


[6] जब धन और मेहनत के साथ के साथ कमाई और कलाकारी का सम्बन्ध बन रहा है तो जातक कला के माध्यम से अपना धन कमा रहा है।

प्रसिद्ध अभिनेता #शशि_कपूर की कुंडली में तृतीय भाव में ही उच्च शुक्र के साथ धन भाव का स्वामी शनि था जिसके कारण उनकी रुचि भी कलाकारी में रही और कला के माध्यम से धन कमाया। ( 18 मार्च 1938 समय 3 बजकर 6 मिनट )

[7] तृतीय भाव मित्रों भाई बन्धुओं का भी होता है जिसमें स्वराशि का शनि और मित्र राशि में शुक्र है जिसके कारण इनको अपने बहुत से #प्रिय_मित्रों का सहयोग इनके कार्य में मिला है तथा मित्रों को अपने कार्य का सबसे पहले धन्यवाद करते हैं।

इसका रीजन ये भी है कि शुक्र और शनि आपस में बहुत अच्छे मित्र ग्रह हैं तथा मित्र की शुक्र की तुला राशि में शनि उच्च हो जाता है।

इस फैक्ट के कारण इनकी मित्रता हमेशा बहुत अच्छी रही है।

[8] कुण्डली में चारों केंद्र खाली हैं, इसलिए अधिक संघर्ष करना पड़ता है।

उपरोक्त योग के कारण अधिक संघर्ष करने के पश्चात एक अच्छे स्तर की कामयाबी मिली है।

जितनी अधिक मेहनत करेंगे उतना अधिक धन तथा मान सम्मान प्राप्त होगा क्योंकि इनकी कामयाबी भाग्य के भरोसे कम और मेहनत के भरोसे पर अधिक है।

Thursday, October 3, 2019

मोक्ष त्रिकोण योग


#मोक्ष_त्रिकोण_योग।

जन्म कुण्डली में #धर्म, #अर्थ, #काम और #मोक्ष नाम के 4 त्रिकोण बनते हैं।

सभी त्रिकोणों का अपना अपना महत्व है।

इसमें 4-8-12 भाव से बनने वाले त्रिकोण को मोक्ष त्रिकोण कहा जाता है।

इस त्रिकोण में #चतुर्थ_भाव का कारक #बृहस्पति,
#अष्टम_भाव का कारक #शनि
और #द्वादश_भाव का कारक #केतु कहा जाता है।

जिसकी कुण्डली में मोक्ष त्रिकोण योग बनता है,
वह #आध्यात्मिक होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

ऐसे व्यक्तियों के आध्यात्मिक अनुभव बहुत अच्छे स्तर के होते हैं।

#परालौकिक_शक्तियों से इनका #सम्पर्क बहुत जल्दी हो जाता है
और ये नीच तथा उच्च दोनों वर्ग की शक्तियों का अनुभव करते हैं।

#भूत_प्रेत_देवी_देवता सभी का #अनुभव इनके पास होता है।


#परिभाषा -

कुण्डली में यदि चतुर्थ भाव में बृहस्पति, अष्टम भाव में शनि और द्वादश भाव में केतु हो तो मोक्ष त्रिकोण योग बनता है।

#फल- ऐसे जातक के जीवन में परालौकिक शक्तियों के अनुभव होते हैं जिनमें भूत प्रेत से लेकर देवी देवता सभी शामिल होते हैं, ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक होकर मोक्ष प्राप्त करता है।


[ नोट - ]

वैसे मोक्ष के लिए कुण्डली में योग होना अनिवार्य नहीं है क्योंकि मोक्ष तब होता है जब #मो_ह का #क्ष_य हो जाये।

मोह का (मो) तथा क्षय का (क्ष)

[ मो + क्ष ]

समझा तो यही जाता है कि मरने के बाद मोक्ष होगा।

लेकिन ऐसे ऐसे ज्ञानी वैरागी इस दुनियाँ में मौजूद हो सकते हैं जो #निष्काम_भाव से #कर्म करते हुए जी रहे होंगे ।

वो मोक्ष के अधिकारी हैं, उन्होंने जीते जी मोक्ष पा लिया है।

[ मोक्ष को समझने के लिए #श्रीमद्भगवद्गीता का #मोक्षसन्यासयोग नाम का 18वां अध्याय पढ़ लेना, सब कुछ यहीं नहीं लिखा जाएगा,  थोड़ा सा अपने पेट का पानी भी हिला लिया करो। ]


इस जातक ने कुण्डली दिखाई क्यूंकि कुछ समय पहले इसे #भूतनी मिल गई थी।


ये लड़का अपने मित्र का साथ रात के समय बाइक पर कहीं जा रहा था।

सुनसान इलाका था और बारिश हो रही थी।

इनकी बाइक के साइड से एक अन्य बाइक ओवरटेक कर के निकल गई।

इन्होंने देखा कि आगे वाली बाइक ओर पीछे की सीट पर एक महिला साड़ी पहने बैठी है जिसका आधा चेहरा दिख रहा था लेकिन बिल्कुल स्पष्ट नहीं दिखा।

साड़ी का पल्लू पिछले टायर के पास झूल रहा था, इन्हें लगा कि कहीं वो पल्लू बाइक के टायर में ना फंस जाए और दुर्घटना ना हो जाये

लड़के ने अपने दोस्त से कहा कि ओवरटेक कर के दूसरी बाइक वाले को आवाज लगाई कि पल्लू ठीक करो।

और ये आगे चले गए।

दूसरी बाइक थोड़ा पीछे रुक गई और इन्हें नहीं दिखी।


थोड़ी देर बाद वो बाइक फुल स्पीड से आई और इनको ओवरटेक कर के इनको रोका और बात की।

उसने पूछा कि आपने किसको आवाज लगाई थी।

तो उस बाइक वाले को लड़के ने बताया कि आपके पीछे जो औरत बैठी थी उसका पल्लू टायर में फँसने वाला था, उसी के लिए आवाज लगाई।


उस बेचारे बाइक वाले का मुँह रोने जैसा हो गया था।

उसने कहा - मेरे साथ तो कोई भी नहीं थी, मैं तो अकेला ही चले जा रहा था।


सभी समझ गए थे कि भूतनी ने इनके साथ #छलावा_काण्ड कर दिया है।


ये सुनकर इस लड़के की टांगों में पानी पड़ गया, ऊपर से बारिश हो रही थी और लड़के ने बैग से पानी की बोतल निकाल के पानी पीना शुरू कर दिया।

दूसरी बाइक वाला डरता डरता बाइक स्टार्ट कर के चला गया।

और ये अपने रास्ते चले गए।

पहुँच कर पूजा पाठ किया और डर मन से निकल गया।


अब कुछ पॉइंट्स -


जन्म - 8 जनवरी 1993
समय - 17:18 बजे
स्थान - मुम्बई


[1] परिभाषा के अनुसार बृहस्पति, शनि और केतु क्रमानुसार 4-8-12 भाव में बैठकर मोक्ष त्रिकोण योग बना रहे हैं।

[2] चतुर्थ भाव के बृहस्पति की दृष्टि अष्टम भाव के शनि और द्वादश भाव के केतु पर है।

अष्टम पर दृष्टि होने से आध्यात्म का आकर्षण है।

[3] अष्टम भाव में स्वराशि का शनि गूढ़ अनुभव बहुत अच्छे दे रहा है, भाग्य का स्वामी है और अष्टम में है तो आध्यत्म में जरूर ले जाएगा, जिस पर बृहस्पति की भी दृष्टि है, अतः अध्यात्म में उन्नति है तथा परालौकिक शक्तियों का चमत्कारी अनुभव अवश्य होगा।

[4] शनि मृत्यु के कारक है, मृत्यु स्थान में बैठ कर तथा बृहस्पति से दृष्ट होकर मृत्यु को समझने वाला बनाएगा, मृत्यु को समझना अध्यात्म का हिस्सा है।

भूत प्रेत मरे हुए प्राणी भी शुरुआत में दिख जायेंगे।

जैसे जैसे आध्यामिक उन्नति होगी, वैसे वैसे अनुभव प्रेत योनि से उठकर देव योनि के भी हो जाएंगे।

शनि अष्टम में मृत्यु को कष्टकारी बनाता है, जब दर्दनाक मौत होती है दूसरी बार जन्म लेने के नाम से ही रूह कांप जाती है।

कुदरती ही जीवन लेने से वैराग्य हो जाएगा।

[5] द्वादश के केतु को मोक्ष कारक कहा गया है।

यह बृहस्पति से दृष्ट है, मोक्ष कारक ग्रह जब आध्यात्म कारक ग्रह से दृष्ट हो तो मोक्ष की संभावना बढ़ ही जाती है।


अतः मोक्ष त्रिकोण इस कुंडली मे बहुत स्पष्ट रूप से है।

Wednesday, October 2, 2019

दान

#दान

दान करना हो तो #दानवीर_कर्ण जैसा करो।


अक्सर कुछ लोग पूछते हैं कि हम किस ग्रह का दान करें?

मैंने अपने किसी भी क्लाईंट को आजतक दान करने की सलाह नहीं दी है।


उपाय के नाम पर या फल की इच्छा से दिया गया दान किसी भी प्रकार से दान की श्रेणी में नहीं आता।

वो एक #सौदा है और कुछ नहीं।


#कर्ण दान देता था, उस जैसा दानवीर कोई नहीं हुआ


कर्ण ने अपनी प्रिय से प्रिय चीज दान में दे दी।


एक बार #अर्जुन ने #कृष्ण से पूछा कि #दान_देने_में_श्रेष्ठ_मैं_हूँ_या_कर्ण_है?

कृष्ण ने कहा और कर्ण श्रेष्ठ है।

तो अर्जुन ने इसका कारण पूछा।


कृष्ण ने सोने के 2 पहाड़ बना दिये।

अर्जुन को कहा कि गांव के लोगों को सोना दान करो।


अर्जुन ने सबको कहा कि लाइन में लगो और एक एक करके आओ।

अर्जुन ने तोल तोल के सोना दान करना शुरू कर दिया।

लोग #अर्जुन_के_जयकारे_लगाते तो #अर्जुन_खुशी_के_मारे_वैसे_फूल_जाता जैसे #पम्प_मारने_पर_गुब्बारा_हवा_से_फूल_जाता_है ।


अर्जुन पसीने पसीने हो गया लेकिन जयकारे सुन के सोना बाँटने में लगा रहा।


जब अर्जुन थक हार गया तो बोला कि हे केशव मैंने बहुत सा सोना दान कर दिया है।


मेरे जैसा दानी कर्ण कभी नहीं हो सकता है।


कृष्ण ने कर्ण से कहा कि ये 2 पहाड़ सोना लोगों को दान कर दो।


कर्ण ने सब लोगों को एक ही लाइन बोली -

#सोने_के_ये_दोनों_पहाड़_आपके_हैं।

#आप_सभी_अपनी_जरूरत_के_मुताबिक_इसमें_से_सोना_ले_लिया_करें।


इतना बोलकर कर्ण वहाँ से चला गया और मुड़कर देखा भी नहीं।


कृष्ण ने कहा - देखा अर्जुन, दान इसे कहते हैं।

कर्ण ने दान किया और भूल गया।

क्योंकि कर्ण जानता है कि जो दान उसके द्वारा दिया जा रहा है, वो ईश्वर ही दिलवा रहा है।

कर्ण तो सिर्फ एक माध्यम है जिसके द्वारा लोगों की उपयोगी वस्तु भगवान उन लोगों तक पहुँचा रहा है और इस बात को कर्ण अच्छी तरह से जानता है।

कर्ण को ना अपनी प्रशंसा और बुराई से कोई फर्क नहीं पड़ता है।

लेकिन अर्जुन तुम तो अपनी प्रशंसा के भूखे हो, खुद में #अभिमान है कि #मैं दान कर रहा हूँ।

एक #अहंकार है कि तुमसे बड़ा दानी कोई नहीं।

तुम कर सकते हो, यह बात सही है।

लेकिन सिर्फ तुम ही कर सकते हो ऐसा सोचना गलत है।

तुम्हें फल की इच्छा थी, तुमने दान किया और बदले में अपनी प्रशंसा का फल चाहते थे जो तुम्हें मिल गया।

इसलिए तुम्हारा दिये हुये दान को दान नहीं, सिर्फ एक सौदा कहा जायेगा।


श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है -

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।। ( अध्याय 17 श्लोक 20)

अर्थ - दान देना ही कर्तव्य है।
इस भाव से जो दान योग्य देश, काल को देखकर ऐसे योग्य पात्र व्यक्ति को दिया जाता है,
जिससे प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती है,
वह दान सात्त्विक माना गया है।।


अर्जुन को जब लोगों के प्रशंसा रूपी पम्प से जयकारे रूपी हवा मिली तो वो गुब्बारे की तरह फूल गया और फटने की हद तक फूलता गया।

उसके बाद श्रीकृष्ण ने उस गुब्बारे को कांटे की जरा सी नोक चुभाई और अर्जुन अहंकार तथा अज्ञानता को पंचर कर दिया।

यदि कृष्ण ऐसा ना करता तो शायद अर्जुन फूल फूल के फूट जाता।


इसलिए आप जब भी दान करते हों तो भागवत गीता के अध्याय 17 श्लोक 20 का अनुसार भाव रखें।

या अपने द्वारा दी हुई चीज को दान का नाम ना दें।


कुछ लोग तो ऐसे दानवीर भी देखे गये हैं जो ₹500/- का #गुप्तदान कर के आश्रम के बाहर ₹2000/- खर्च कर के इख़्वा देते हैं कि फलाने ने अपने माता पिता की स्मृति में ₹500/- का गुप्तदान किया है।

उसके नीचे नाम पते के साथ फोन नम्बर भी लिखा मिलता है।