#दान
।
दान करना हो तो #दानवीर_कर्ण जैसा करो।
।
।
अक्सर कुछ लोग पूछते हैं कि हम किस ग्रह का दान करें?
।
मैंने अपने किसी भी क्लाईंट को आजतक दान करने की सलाह नहीं दी है।
।
।
उपाय के नाम पर या फल की इच्छा से दिया गया दान किसी भी प्रकार से दान की श्रेणी में नहीं आता।
।
वो एक #सौदा है और कुछ नहीं।
।
।
#कर्ण दान देता था, उस जैसा दानवीर कोई नहीं हुआ
।
।
कर्ण ने अपनी प्रिय से प्रिय चीज दान में दे दी।
।
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एक बार #अर्जुन ने #कृष्ण से पूछा कि #दान_देने_में_श्रेष्ठ_मैं_हूँ_या_कर्ण_है?
।
कृष्ण ने कहा और कर्ण श्रेष्ठ है।
।
तो अर्जुन ने इसका कारण पूछा।
।
।
कृष्ण ने सोने के 2 पहाड़ बना दिये।
।
अर्जुन को कहा कि गांव के लोगों को सोना दान करो।
।
।
अर्जुन ने सबको कहा कि लाइन में लगो और एक एक करके आओ।
।
अर्जुन ने तोल तोल के सोना दान करना शुरू कर दिया।
।
लोग #अर्जुन_के_जयकारे_लगाते तो #अर्जुन_खुशी_के_मारे_वैसे_फूल_जाता जैसे #पम्प_मारने_पर_गुब्बारा_हवा_से_फूल_जाता_है ।
।
।
अर्जुन पसीने पसीने हो गया लेकिन जयकारे सुन के सोना बाँटने में लगा रहा।
।
।
जब अर्जुन थक हार गया तो बोला कि हे केशव मैंने बहुत सा सोना दान कर दिया है।
।
।
मेरे जैसा दानी कर्ण कभी नहीं हो सकता है।
।
।
कृष्ण ने कर्ण से कहा कि ये 2 पहाड़ सोना लोगों को दान कर दो।
।
।
कर्ण ने सब लोगों को एक ही लाइन बोली -
।
#सोने_के_ये_दोनों_पहाड़_आपके_हैं।
।
#आप_सभी_अपनी_जरूरत_के_मुताबिक_इसमें_से_सोना_ले_लिया_करें।
।
।
इतना बोलकर कर्ण वहाँ से चला गया और मुड़कर देखा भी नहीं।
।
।
कृष्ण ने कहा - देखा अर्जुन, दान इसे कहते हैं।
।
कर्ण ने दान किया और भूल गया।
।
क्योंकि कर्ण जानता है कि जो दान उसके द्वारा दिया जा रहा है, वो ईश्वर ही दिलवा रहा है।
।
कर्ण तो सिर्फ एक माध्यम है जिसके द्वारा लोगों की उपयोगी वस्तु भगवान उन लोगों तक पहुँचा रहा है और इस बात को कर्ण अच्छी तरह से जानता है।
।
कर्ण को ना अपनी प्रशंसा और बुराई से कोई फर्क नहीं पड़ता है।
।
लेकिन अर्जुन तुम तो अपनी प्रशंसा के भूखे हो, खुद में #अभिमान है कि #मैं दान कर रहा हूँ।
।
एक #अहंकार है कि तुमसे बड़ा दानी कोई नहीं।
।
तुम कर सकते हो, यह बात सही है।
।
लेकिन सिर्फ तुम ही कर सकते हो ऐसा सोचना गलत है।
।
तुम्हें फल की इच्छा थी, तुमने दान किया और बदले में अपनी प्रशंसा का फल चाहते थे जो तुम्हें मिल गया।
।
इसलिए तुम्हारा दिये हुये दान को दान नहीं, सिर्फ एक सौदा कहा जायेगा।
।
।
श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है -
।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।। ( अध्याय 17 श्लोक 20)
।
अर्थ - दान देना ही कर्तव्य है।
इस भाव से जो दान योग्य देश, काल को देखकर ऐसे योग्य पात्र व्यक्ति को दिया जाता है,
जिससे प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती है,
वह दान सात्त्विक माना गया है।।
।
।
अर्जुन को जब लोगों के प्रशंसा रूपी पम्प से जयकारे रूपी हवा मिली तो वो गुब्बारे की तरह फूल गया और फटने की हद तक फूलता गया।
।
उसके बाद श्रीकृष्ण ने उस गुब्बारे को कांटे की जरा सी नोक चुभाई और अर्जुन अहंकार तथा अज्ञानता को पंचर कर दिया।
।
यदि कृष्ण ऐसा ना करता तो शायद अर्जुन फूल फूल के फूट जाता।
।
।
इसलिए आप जब भी दान करते हों तो भागवत गीता के अध्याय 17 श्लोक 20 का अनुसार भाव रखें।
।
या अपने द्वारा दी हुई चीज को दान का नाम ना दें।
।
।
कुछ लोग तो ऐसे दानवीर भी देखे गये हैं जो ₹500/- का #गुप्तदान कर के आश्रम के बाहर ₹2000/- खर्च कर के इख़्वा देते हैं कि फलाने ने अपने माता पिता की स्मृति में ₹500/- का गुप्तदान किया है।
।
उसके नीचे नाम पते के साथ फोन नम्बर भी लिखा मिलता है।
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दान करना हो तो #दानवीर_कर्ण जैसा करो।
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अक्सर कुछ लोग पूछते हैं कि हम किस ग्रह का दान करें?
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मैंने अपने किसी भी क्लाईंट को आजतक दान करने की सलाह नहीं दी है।
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उपाय के नाम पर या फल की इच्छा से दिया गया दान किसी भी प्रकार से दान की श्रेणी में नहीं आता।
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वो एक #सौदा है और कुछ नहीं।
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#कर्ण दान देता था, उस जैसा दानवीर कोई नहीं हुआ
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कर्ण ने अपनी प्रिय से प्रिय चीज दान में दे दी।
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एक बार #अर्जुन ने #कृष्ण से पूछा कि #दान_देने_में_श्रेष्ठ_मैं_हूँ_या_कर्ण_है?
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कृष्ण ने कहा और कर्ण श्रेष्ठ है।
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तो अर्जुन ने इसका कारण पूछा।
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कृष्ण ने सोने के 2 पहाड़ बना दिये।
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अर्जुन को कहा कि गांव के लोगों को सोना दान करो।
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अर्जुन ने सबको कहा कि लाइन में लगो और एक एक करके आओ।
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अर्जुन ने तोल तोल के सोना दान करना शुरू कर दिया।
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लोग #अर्जुन_के_जयकारे_लगाते तो #अर्जुन_खुशी_के_मारे_वैसे_फूल_जाता जैसे #पम्प_मारने_पर_गुब्बारा_हवा_से_फूल_जाता_है ।
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अर्जुन पसीने पसीने हो गया लेकिन जयकारे सुन के सोना बाँटने में लगा रहा।
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जब अर्जुन थक हार गया तो बोला कि हे केशव मैंने बहुत सा सोना दान कर दिया है।
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मेरे जैसा दानी कर्ण कभी नहीं हो सकता है।
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कृष्ण ने कर्ण से कहा कि ये 2 पहाड़ सोना लोगों को दान कर दो।
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कर्ण ने सब लोगों को एक ही लाइन बोली -
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#सोने_के_ये_दोनों_पहाड़_आपके_हैं।
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#आप_सभी_अपनी_जरूरत_के_मुताबिक_इसमें_से_सोना_ले_लिया_करें।
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इतना बोलकर कर्ण वहाँ से चला गया और मुड़कर देखा भी नहीं।
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कृष्ण ने कहा - देखा अर्जुन, दान इसे कहते हैं।
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कर्ण ने दान किया और भूल गया।
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क्योंकि कर्ण जानता है कि जो दान उसके द्वारा दिया जा रहा है, वो ईश्वर ही दिलवा रहा है।
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कर्ण तो सिर्फ एक माध्यम है जिसके द्वारा लोगों की उपयोगी वस्तु भगवान उन लोगों तक पहुँचा रहा है और इस बात को कर्ण अच्छी तरह से जानता है।
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कर्ण को ना अपनी प्रशंसा और बुराई से कोई फर्क नहीं पड़ता है।
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लेकिन अर्जुन तुम तो अपनी प्रशंसा के भूखे हो, खुद में #अभिमान है कि #मैं दान कर रहा हूँ।
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एक #अहंकार है कि तुमसे बड़ा दानी कोई नहीं।
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तुम कर सकते हो, यह बात सही है।
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लेकिन सिर्फ तुम ही कर सकते हो ऐसा सोचना गलत है।
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तुम्हें फल की इच्छा थी, तुमने दान किया और बदले में अपनी प्रशंसा का फल चाहते थे जो तुम्हें मिल गया।
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इसलिए तुम्हारा दिये हुये दान को दान नहीं, सिर्फ एक सौदा कहा जायेगा।
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श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है -
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दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।। ( अध्याय 17 श्लोक 20)
।
अर्थ - दान देना ही कर्तव्य है।
इस भाव से जो दान योग्य देश, काल को देखकर ऐसे योग्य पात्र व्यक्ति को दिया जाता है,
जिससे प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती है,
वह दान सात्त्विक माना गया है।।
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अर्जुन को जब लोगों के प्रशंसा रूपी पम्प से जयकारे रूपी हवा मिली तो वो गुब्बारे की तरह फूल गया और फटने की हद तक फूलता गया।
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उसके बाद श्रीकृष्ण ने उस गुब्बारे को कांटे की जरा सी नोक चुभाई और अर्जुन अहंकार तथा अज्ञानता को पंचर कर दिया।
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यदि कृष्ण ऐसा ना करता तो शायद अर्जुन फूल फूल के फूट जाता।
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इसलिए आप जब भी दान करते हों तो भागवत गीता के अध्याय 17 श्लोक 20 का अनुसार भाव रखें।
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या अपने द्वारा दी हुई चीज को दान का नाम ना दें।
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कुछ लोग तो ऐसे दानवीर भी देखे गये हैं जो ₹500/- का #गुप्तदान कर के आश्रम के बाहर ₹2000/- खर्च कर के इख़्वा देते हैं कि फलाने ने अपने माता पिता की स्मृति में ₹500/- का गुप्तदान किया है।
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उसके नीचे नाम पते के साथ फोन नम्बर भी लिखा मिलता है।

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