भगवान_श्रीकृष्ण
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शास्त्रों में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मकुण्डली इस प्रकार कही है -
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उच्चास्था: शशिभौमचान्द्रिशनयो लग्नं वृषो लाभगो जीव: सिंहतुलालिषु क्रमवशात्पूषोशनोराहव:।
नैशीथ: समयोष्टमी बुधदिनं ब्रह्मर्क्षमत्र क्षणे श्रीकृष्णाभिधमम्बुजेक्षणमभूदावि: परं ब्रह्म तत्।।
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[श्रीमद्भागवत महापुराण - दशम स्कन्द, अध्याय तीन]
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वृषभ लग्न में उच्च चन्द्रमा, मंगल, शनि, बुध उच्च हैं
एकादश स्थान में बृहस्पति है।
सिंह राशि का स्वामी सूर्य अपने स्थान पर है तथा तुला का स्वामी भी अपने स्थान पर है।
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तुला का स्वामी शुक्र है और वृषभ का स्वामी भी शुक्र है।
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शुक्र की दूरी सूर्य से अधिकांशतः आगेअथवा पीछे तीसरे भाव तक ही रहती है।
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इसलिए शुक्र छठे भाव में शनि के साथ आएगा।
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शनि और राहु क्रम में हैं।
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शनि का बाद राहु वृश्चिक राशि में आएगा और राहु से सातवाँ केतु लग्न में आएगा।
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( रोहिणी नक्षत्र में जन्म हुआ है जिसका स्वामी चन्द्रमा है इसलिए बच्चपन में चन्द्रमा की दशा थी )
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इस तरह से श्रीकृष्ण की कुण्डली स्पष्ट होती है।
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#सन्त_सूरदास ने भी इसी तरह का वर्णन किया है -
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नन्दजू मेरे मन आनन्द भयो, मैं सुनि मथुराते आयो।
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लगन सोधि ज्योतिष को गिनी करि, चाहत तुम्हहि सुनायो।
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सम्बत्सर ईश्वर को भादों, नाम जु कृष्ण धरयो है।
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रोहिणी, बुध, आठै अंधियारी, हर्षन जो परयो है।
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वृष है लग्न, उच्च के उडुपति, तनको अति सुखकारी,
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दल चतुरंग चलै संग इनके, व्हैहैं रसिकबिहारी।
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चौथी रासि सिंह के दिनमनि, महिमण्डल को जीतैं।
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करिहैं नास कंस मातुल को, निहचै कछु दिन बीतै।
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पंचम बुध कन्या के सोभित, पुत्र बढैंगे सोई।
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छठएं सुक्र तुला के सुनिजुत, सत्रु बचै नहिं कोई।
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नीच-ऊंच जुवती बहुत भोगैं, सप्तम राहू परयो है।
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केतू मुरति में श्याम बरन, चोरी में चित्त धरयो है।
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भाग्य भवन में मकर महीसुत, अति ऐश्वर्य बढैगो।
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द्विज, गुरुजन को भक्त होइकै, कामिनी चित्त हरैगो।
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नवनिधि जाके नाभि बसत है, मीन बृहस्पति केरी।
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पृथ्वी भार उतारे निहचै, यह मानो तुम मेरी।
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तब ही नन्द महर आनन्दे, गर्ग पूजि पहरायो।
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असन, बसन, गज बाजि, धेनु, धन, भूरि भण्डार लुटायो।
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बंदीजन द्वारै जस गावै, जो जांच्यो सो पायो।
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ब्रज में कृष्ण जन्म को उत्सव, सूर बिमल जस गायो।
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जब भी भगवान ने इन्सान की देह धारण की है तो भगवान को भी सृष्टि के नियमों से बन्धना ही पड़ा है।
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जिसके पास भी इन्सान का शरीर है, उस पर ज्योतिष लागू होगा ही।
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भगवान भी ग्रहों के प्रभाव से नहीं बच सकता है अगर इन्सान का शरीर धारण करता है।
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चाहे भगवान श्री राम का जीवन ले लो या भगवान श्रीकृष्ण का।
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ग्रहों के अच्छे बुरे फल भुगतने पड़े।
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अब कुछ पॉइंट्स -
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[1] वृषभ लग्न में उच्च चन्द्रमा शरीर सुन्दर बना रहा है, श्रीकृष्ण की सुन्दरता का सबको ही पता है।
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[2] तृतीय भाव का स्वामी लग्न में उच्च होकर मित्र बन्धुओं और भाई का सहयोग बहुत अच्छा दे रहा है, श्रीकृष्ण के बाल ग्वाल सखा आदि स्पष्ट हो जाते हैं।
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[3] चन्द्रमा बच्चपन का कारक है, और सबसे ज्यादा कारनामें बच्चपन में किये हैं चन्द्रमा की महादशा में, चन्द्रमा उच्च है इसलिए शरारतें पसन्द की गई।
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[4] चन्द्रमा के साथ केतु है जो ग्रहण योग बना रहा है।
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लग्न में केतु के कारण कुटिलता कूट कूट के भरी थी, चोरी करने और झूठ बोलने की आदत केतु के कारण थी।
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माता का कारक चन्द्रमा है जो केतु द्वारा खराब होने से माता की दूरी का कारण बना तथा भावात भावम का सूत्र लगाने पर चतुर्थ से चतुर्थ भाव अर्थात सप्तम भाव में नीच राहु भी माता से दूरी का कारण बना।
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[5] केतु के साथ उच्च चन्द्रमा था इसलिए चन्द्रमा का प्रभाव अधिक होने के कारण केतु के कारण की गई खुराफाती हरकतें भी लीला बन गई।
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[6] लग्न में चन्द्र ग्रहण योग है जो शरीर में विकृति या नुक्सान दे रहा है।
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भगवान श्री कृष्ण का शरीर थोड़ा सा टेढ़ा था अगर ध्यान से देखें।
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सीधे खड़े होकर बाँसुरी नहीं बजाते पैर हमेशा क्रॉस की स्थिति में रखे हैं।
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बाँसुरी बजाने वाला कोई भी आर्टिस्ट हो, उसकी गर्दन में थोड़ा टेढ़ापन आ जाता है या होंठों को टेढ़ापन आ जाता है।
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जब श्री कृष्ण ने कुब्जा के टेढ़े शरीर को सीधा कर दिया तो उसका दुःख अपने शरीर पर ले लिया जिसके बाद श्रीकृष्ण के शरीर में टेढ़े खड़े होने की विकृति आ गई थी।
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[7] चन्द्रमा वृषभ राशि में है जिसका स्वामी शुक्र है और शुक्र संगीत, भोग विलास आदि का कारक है।
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इसी कारण श्रीकृष्ण को संगीत पसन्द था बाँसुरी बजाने की कला थी और गोपियों में भी बहुत रुचि थी क्योंकि चन्द्रमा शुक्र की राशि मे है जो स्त्री के प्रति आकर्षण देता है।
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[8] सप्तम भाव का राहु नीच है जिसके कारण श्रीकृष्ण का पहले प्यार राधा के साथ ब्रेकप हो गया।
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राहु या केतु सप्तम भाव में असामान्य प्रेमसंबंध जैसे लड़की बड़ी उम्र की होना, या लड़का छोटी उम्र का होना या बहुत ही बड़ी उम्र के पार्टनर होना या इंटरकास्ट अफेयर होना आदि की स्थिति बनती है।
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राधा कृष्ण से बड़ी थी।
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कृष्ण की सभी गोपियाँ कृष्ण से या तो बड़ी थी या छोटी थी, कोई बराबर भी थी।
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कृष्ण का विवाह रुक्मणि के साथ हुआ तो भाग कर हुआ।
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कृष्ण की 16108 पत्नियां थी, राहु के कारण थी, क्योंकि सप्तम का राहु किसी एक के साथ सम्बन्ध निश्चित नहीं करता है, मल्टीरिलेशन का योग बनता है।
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[9] एकादश भाव से बृहस्पति की नवम दृष्टि सप्तम भाव पर है इसलिए कृष्ण ने किसी भी स्त्री के साथ छल नहीं किया, धोखा नहीं दिया, आदरपूर्वक सभी को बराबर प्यार किया।
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बृहस्पति की दृष्टि के कारण श्रीकृष्ण का प्यार एक लॉयल्टी वाला प्यार था।
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जिस भी गोपी से शादि की उसे कभी दुःख नहीं होने दिया।
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[10] पँचम भाव में उच्च बुध और उसके साथ अष्टमेश तथा लाभेश बृहस्पति का दृष्टिसम्बन्ध होने के कारण श्रीकृष्ण की बुद्धि का कोई तोड़ नहीं था।
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बहुत ज्यादा बुद्धिमान और आध्यात्मिक चरित्र था।
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[11] अष्टमेश गूढ़ और रहस्यमयी बातों का कारक भी होता है, अष्टमेश बृहस्पति के साथ द्वितीयेश बुध का सम्बंध बता रहा है कि कृष्ण की वाणी हमेशा सीक्रेट्स को ओपन करने वाली थी, गूढ़ बात कहने वाली वाणी थी।
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#श्रीमद्भागवत_गीता का ज्ञान बुध और बृहस्पति के कारण कहा गया था।
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[12] नवम में उच्च मंगल के कारण पत्नियां हमेशा सुन्दर मिली और धार्मिक ज्ञान की कमी कोई नहीं रही, सांदीपन जैसा गुरु मिला और उच्च मंगल के कारण इतना जोश था कि 64 दिन में 64 विद्याएँ सीख ली।
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[13] भाग्य का स्वामी शनि षष्टम भाव में शुक्र के साथ है।
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कृष्ण का भाग्य शत्रुओं से ही चलता था, कृष्ण के जीवन में देखें तो बच्चपन से मृत्यु तक शत्रु ही जुड़े रहे।
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छठा भाव मामा का होता है और कंस मामा ही सबसे बड़ा शत्रु निकला, उसी मामा से कृष्ण की किस्मत चमकना शुरू हो गई।
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मामा ने जितना पंगा लिया, कृष्ण लीला उतनी ही बढ़ती गई।
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महाभारत के युद्ध मे सबसे बड़ी चतुराई कृष्ण की थी।
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द्वादश भाव भोगों का होता है जिस पर शुक्र की दृष्टि होने के कारण श्रीकृष्ण को गोपियों की कमी नहीं थी।
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शुक्र चतुराई का कारक है, कुटिलता और चतुराई का तालमेल कृष्ण के अंदर बहुत ज्यादा था इसलिए कृष्ण से बड़ा राजनीतिज्ञ कोई नहीं हुआ, साम दाम दण्ड भेद छल बल सब कुछ कृष्ण ने इस्तेमाल किया।
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जो मर्जी युद्ध हो, जीत हमेशा कृष्ण की हुई।
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पैदा होने से लेकर मृत्यु तक कृष्ण के शत्रु खत्म नहीं हुए।
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पैदा भी शत्रु के घर में हुए और 119 वर्ष की आयु में पूर्वजन्म के शत्रु के हाथों ही मारे गए।
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कृष्ण की कुण्डली के पॉइंट्स बहुत सारे निकल जाएंगे, लेकिन अब लिखने का मन नहीं कर रहा है
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श्रीकृष्ण की कुण्डली जैसे योग बहुतों की कुण्डली में मिल जाएंगे और उनकी आदतें भी कुछ हद तक वैसी ही होंगी।
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लेकिन परफैक्ट कृष्ण कोई नहीं है।
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कृष्ण की रासलीला समझने के लिए आध्यात्म की समझ चाहिए।
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औरतों के साथ सोने से कोई कृष्ण नहीं बन जाता।
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कुटिलता करने से कोई कृष्ण जैसा राजनीतिज्ञ नहीं बन जाता है।
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वो मत करो जो कृष्ण करता है।
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वो करो जो कृष्ण कहता है।
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हो सके तो श्रीमद्भागवत गीता पढ़ लें।

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