प्रवज्या योग, ऑपरेशन का योग, दुर्घटना का योग।
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प्रवज्या योग।
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यदि 4 या 4 से अधिक ग्रह 1 भाव मे आएं तो प्रवज्या योग बनता है।
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ऐसा जातक धार्मिक स्वभाव वाला होता है, साधुओं की तरह वृति होती है तथा गृहस्थ में भी साधुओं की तरह नियमबद्ध होकर रहता है।
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यदि यह योग त्रिक भावों में बने तो सन्यास लेने को सम्भावना अधिक होती है।
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ऑपरेशन का योग - चीरा लगना केतु के कारण मुख्य रूप से होता है, मंगल केतु भी चोट या चीरा लगने के कारण होते हैं।
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शनि+केतु+राहु से ट्यूमर बनता है।
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अष्टम भाव में ग्रह दुर्घटना के कारण होते हैं।
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इस कुण्डली वाली स्त्री भी एक साध्वी की तरह स्वभाव और रहन सहन वाली है।
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पति ने दूसरी शादि की है।
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हर महीने 11 गरीब लड़कियों की फीस भरती हैं।
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संगीत का ज्ञान है।
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सरकारी टीचर हैं और कई कैबिनेट मिनिस्टर्स द्वारा नेशनल लेवल के बैस्ट टीचर के अवार्ड से सम्मानित है।
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मुँह के 3-4 मेजर ऑपरेशन सिस्ट बनने के कारण हो चुके हैं।
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सिर की सर्जरी भी हुई है
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गर्भाशय में ट्यूमर हुआ था और एक्सीडेंट भी हुआ है।
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इस कुण्डली के कुछ पॉइंट्स -
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जन्म - 30 दिसम्बर 1961 समय - 06:00 बजे जबलपुर।
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[1] धनु लग्न में 4 ग्रह सूर्य+शुक्र+बुध+मंगल प्रवज्या योग बना रहे हैं।
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जातिका धार्मिक स्वभाव की है क्योंकि भाग्य का स्वामी सूर्य धनु लग्न में सात्विक विचार और धार्मिक स्वभाव दे रहा है।
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[2] मंगल, बुध और शुक्र अस्त हैं जिसके कारण सूर्य का धार्मिक प्रभाव ज्यादा होने के कारण गृहस्थ में भी धार्मिक तरीके से रहती हैं।
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यदि मंगल, शुक्र या बुध अस्त ना होते तो स्वभाव के बदलाव आ सकता था और ब्रह्मज्ञान आदि की रुचि ना होकर तन्त्र मन्त्र को रुचि अधिक हो सकती थी।
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सूर्य आत्मा कारक ग्रह है इसलिए खुद को समझना और सात्विक तरीके से जीने का स्वभाव बना है।
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[3] सप्तम भाव का स्वामी बुध अस्त है जिसके कारण पति का अधिक सुख नहीं मिला है और पति कारक बृहस्पति द्वितीय भाव मे केतु राहु शनि से पीड़ित है और बृहस्पति+केतु का गुरुचाण्डाल योग बना है जिसके कारण पति का सुख कम है।
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[4] लग्न में बुध दिग्बली हो जाता है और सप्तमेश दिग्बली होने के कारण पति का सुख तो होना चाहिए था लेकिन अस्त होने के कारण पति जीवित तो है लेकिन सौतन भी है।
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[5] शुक्र षष्टम भाव का स्वामी होकर अस्त है तथा मंगल द्वादश भाव का स्वामी होकर अस्त है तथा दोनों की संयुक्त दृष्टि सप्तम भाव पर होने से भी पति का सुख कम हो गया है।
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[6] द्वितीय भाव मे केतु+शनि ट्यूमर और सिस्ट बनने के कारण हैं।
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[7] द्वितीय भाव गले का और वाणी का होता है इसलिए द्वितीय भाव में इन शनि+केतु के कारण सिस्ट बना और 3-4 मेजर ऑपरेशन हुए।
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[8] लग्न का स्वामी बृहस्पति केतु से पीड़ित है और अष्टम में बैठे राहु से दृष्टि सम्बन्ध है जिसके कारण सिर की सर्जरी भी हुई क्योंकि लग्न का स्वामी हमारे मुँह और सिर से सम्बंधित होता है।
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[9] अष्टम भाव में बैठा राहु एक्सिडेंट का कारण है जिसके कारण एक्सिडेंट हुआ।
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[10] शनि केतु और बृहस्पति द्वितीय भाव में है लेकिन यूटेराइन ट्यूमर बना है जबकि पँचम भाव पर कोई प्रभाव नहीं है।
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इसका कारण शनि+केतु की युति चन्द्रलग्न से पँचम भाव में है और पँचम भाव लिवर, गर्भाशय का होता है तथा लग्न से अष्टम भाव उदर से नीचे वाले भाग का होता है जिस पर शनि+केतु की दृष्टि है और अष्टम भाव में राहु का होना है।
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[11] नवम, दशम, एकादश भाव का स्वामी लग्न में होना बहुत भाग्यशाली बना रहा है जिसके कारण राज समाज में सम्मान मिला है और राष्ट्रीय स्तर के बैस्ट टीचर अवॉर्ड मिले हैं।
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प्रवज्या योग।
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यदि 4 या 4 से अधिक ग्रह 1 भाव मे आएं तो प्रवज्या योग बनता है।
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ऐसा जातक धार्मिक स्वभाव वाला होता है, साधुओं की तरह वृति होती है तथा गृहस्थ में भी साधुओं की तरह नियमबद्ध होकर रहता है।
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यदि यह योग त्रिक भावों में बने तो सन्यास लेने को सम्भावना अधिक होती है।
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ऑपरेशन का योग - चीरा लगना केतु के कारण मुख्य रूप से होता है, मंगल केतु भी चोट या चीरा लगने के कारण होते हैं।
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शनि+केतु+राहु से ट्यूमर बनता है।
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अष्टम भाव में ग्रह दुर्घटना के कारण होते हैं।
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इस कुण्डली वाली स्त्री भी एक साध्वी की तरह स्वभाव और रहन सहन वाली है।
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पति ने दूसरी शादि की है।
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हर महीने 11 गरीब लड़कियों की फीस भरती हैं।
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संगीत का ज्ञान है।
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सरकारी टीचर हैं और कई कैबिनेट मिनिस्टर्स द्वारा नेशनल लेवल के बैस्ट टीचर के अवार्ड से सम्मानित है।
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मुँह के 3-4 मेजर ऑपरेशन सिस्ट बनने के कारण हो चुके हैं।
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सिर की सर्जरी भी हुई है
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गर्भाशय में ट्यूमर हुआ था और एक्सीडेंट भी हुआ है।
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इस कुण्डली के कुछ पॉइंट्स -
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जन्म - 30 दिसम्बर 1961 समय - 06:00 बजे जबलपुर।
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[1] धनु लग्न में 4 ग्रह सूर्य+शुक्र+बुध+मंगल प्रवज्या योग बना रहे हैं।
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जातिका धार्मिक स्वभाव की है क्योंकि भाग्य का स्वामी सूर्य धनु लग्न में सात्विक विचार और धार्मिक स्वभाव दे रहा है।
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[2] मंगल, बुध और शुक्र अस्त हैं जिसके कारण सूर्य का धार्मिक प्रभाव ज्यादा होने के कारण गृहस्थ में भी धार्मिक तरीके से रहती हैं।
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यदि मंगल, शुक्र या बुध अस्त ना होते तो स्वभाव के बदलाव आ सकता था और ब्रह्मज्ञान आदि की रुचि ना होकर तन्त्र मन्त्र को रुचि अधिक हो सकती थी।
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सूर्य आत्मा कारक ग्रह है इसलिए खुद को समझना और सात्विक तरीके से जीने का स्वभाव बना है।
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[3] सप्तम भाव का स्वामी बुध अस्त है जिसके कारण पति का अधिक सुख नहीं मिला है और पति कारक बृहस्पति द्वितीय भाव मे केतु राहु शनि से पीड़ित है और बृहस्पति+केतु का गुरुचाण्डाल योग बना है जिसके कारण पति का सुख कम है।
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[4] लग्न में बुध दिग्बली हो जाता है और सप्तमेश दिग्बली होने के कारण पति का सुख तो होना चाहिए था लेकिन अस्त होने के कारण पति जीवित तो है लेकिन सौतन भी है।
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[5] शुक्र षष्टम भाव का स्वामी होकर अस्त है तथा मंगल द्वादश भाव का स्वामी होकर अस्त है तथा दोनों की संयुक्त दृष्टि सप्तम भाव पर होने से भी पति का सुख कम हो गया है।
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[6] द्वितीय भाव मे केतु+शनि ट्यूमर और सिस्ट बनने के कारण हैं।
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[7] द्वितीय भाव गले का और वाणी का होता है इसलिए द्वितीय भाव में इन शनि+केतु के कारण सिस्ट बना और 3-4 मेजर ऑपरेशन हुए।
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[8] लग्न का स्वामी बृहस्पति केतु से पीड़ित है और अष्टम में बैठे राहु से दृष्टि सम्बन्ध है जिसके कारण सिर की सर्जरी भी हुई क्योंकि लग्न का स्वामी हमारे मुँह और सिर से सम्बंधित होता है।
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[9] अष्टम भाव में बैठा राहु एक्सिडेंट का कारण है जिसके कारण एक्सिडेंट हुआ।
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[10] शनि केतु और बृहस्पति द्वितीय भाव में है लेकिन यूटेराइन ट्यूमर बना है जबकि पँचम भाव पर कोई प्रभाव नहीं है।
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इसका कारण शनि+केतु की युति चन्द्रलग्न से पँचम भाव में है और पँचम भाव लिवर, गर्भाशय का होता है तथा लग्न से अष्टम भाव उदर से नीचे वाले भाग का होता है जिस पर शनि+केतु की दृष्टि है और अष्टम भाव में राहु का होना है।
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[11] नवम, दशम, एकादश भाव का स्वामी लग्न में होना बहुत भाग्यशाली बना रहा है जिसके कारण राज समाज में सम्मान मिला है और राष्ट्रीय स्तर के बैस्ट टीचर अवॉर्ड मिले हैं।

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