Wednesday, April 10, 2019

प्रेत बाधा

प्रेतबाधा या पिशाच योग।


यह योग तब बनता है जब कुण्डली में लग्न में या लग्न के स्वामी के साथ राहु, केतु हो।

चन्द्रमा के साथ शनि,राहु और केतु हो।

बृहस्पति के साथ राहु या केतु हो।

शनि मृत्युकारक ग्रह है, राहु और केतु भूत प्रेत से सम्बन्धित ग्रह हैं।


ऐसे योग वाले अधिकतर भूत प्रेत या पिशाच आदि की किसी बाधा का शिकार होते हैं।


चन्द्रमा मन का कारक है और जब मन पे भूत प्रेत आदि का प्रभाव होता है तो मानसिक संतुलन बिगड़ता है।

भूत प्रेत के कारण पागलपन होना भी इसका लक्षण है।

डॉक्टरी भाषा में भूत प्रेत का होना एक मेंटली डिसऑर्डर है।

जो कुछ समय के ट्रीटमैंट से ठीक हो जाता है।


लेकिन ये डिसऑर्डर एडवांस तब हो जाता है जब बॉडी में आया हुआ प्रेत किसी के बारे में उसकी सीक्रेट बात को बोल देता है।


वैज्ञानिकों के पास भूत प्रेत प्रेक्टिकल करवाने को नहीं आते हैं, ना दिखाई देते हैं, ना पकड़ में आते हैं।

इसलिए वो इन भूत प्रेतों के नकार देते हैं।


विज्ञान कहेगा कि एक मानसिक रोगी दवाई से ठीक हुआ।

लेकिन ज्योतिष कहेगा कि जब इसके बुरे ग्रह की दशा खत्म होगी तो ये बिना दवाई के भी ठीक हो जाएगा।

और होता यही है कि जितने समय तक बुरे ग्रह का प्रभाव रहता है, उतने समय तक बाधा रहती है।

जब बुरा समय समाप्त हो रहा हो तो वो जातक किसी मन्दिर में, तान्त्रिक के पास या डॉक्टर के पास ठीक हो जाता है।


नीच चन्द्रमा अगर राहु के साथ शनि के प्रभाव में हो तो बहुत ज्यादा सम्भावना है कि वो जातक प्रेतात्माओं द्वारा सताया जाएगा।


बृहस्पति राहु केतु हो तो प्रेत साधक हो सकता है।

ग्रहों का बल देखकर निर्णय होता है कि प्रेतबाधा परेशान करेगी या प्रेत पर कंट्रोल करेगा।

जो प्रेत साधना करता है वो भले ही उसको कंट्रोल कर ले।

लेकिन जो ग्रह उससे प्रेत की साधना करवा के कंट्रोल रख रहा है, उस ग्रह से सम्बन्धित रिश्ते का सुख उस व्यक्ति की जिन्दगी में नहीं होगा।

भले ही वो दुनियां को नजर में भूत कंट्रोल करता है लेकिन जिस रिश्ते का सुख उसकी जिन्दगी से समाप्त होगा वो प्रेतबाधा के कारण ही होगा।


दो लड़कियों की कुण्डलियाँ हैं जिनमें से एक अभी प्रेत बाधा से ग्रसित है और दूसरी की प्रेत बाधा खत्म हो चुकी है।


पॉइंट्स -

कुण्डली नम्बर 1-

जन्म - 23 अक्तूबर 1996 समय 12:54 बजे मण्डी हिमाचल प्रदेश।


[1] मकर लग्न की कुण्डली में लग्न का स्वामी शनि है और शनि के साथ केतु है।

लग्नेश मृत्युकारक ग्रह है और लग्नेश की युति प्रेतबाधा कारक ग्रह केतु  के साथ तृतीय भाव में है।

प्रेत बाधा का प्रभाव बन रहा है।


[2] नवम भाव भाव में भाग्य के स्वामी बुध के साथ बैठा राहु भाग्य को खराब कर रहा है।

धर्मिकता को जगह पैशाचिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, इसको भाग्य सम्बन्धित नकारात्मक परिणाम मिल रहा है।


[3] शनि+राहु+केतु+बुध का आपस में दृष्टि सम्बन्ध प्रेतबाधा का पूरा योग बना रहा है।


इस लड़की को प्रेत परेशान करता है, बॉडी में आकर बोलता है।

बुरे बुरे सपने आते हैं और रात को चिल्लाने के बाद जोर जोर से रोती है रोज पूजा पाठ करती है लेकिन भूत नहीं जाता है, कभी कभी पूजा पाठ के समय भी बॉडी में आकर बोलने लगता है।


कुण्डली नम्बर 2 -


जन्म- 4 अगस्त 1996 समय - 15:7 मिनट मण्डी हिमाचल प्रदेश।


[1] वृश्चिक लग्न की कुण्डली में पँचम भाव में शनि और केतु के साथ भाग्य का स्वामी चन्द्रमा है।

[2] एकादश भाव में बैठे राहु के साथ शनि और चन्द्रमा का दृष्टि सम्बन्ध है।

[3] शनि+चन्द्रमा इक्कठे होने से विष्कुम्भ योग बना है।

[4] केतु+चन्द्रमा की युति से से चन्द्रग्रहण योग बना है जो मानसिक बल को कमजोर कर रहा है।

[5] इन दोनों योगों को मिलाकर पिशाच योग बन रहा है।


2015 के आसपास इस लड़की को प्रेत बाधा थी और इस लड़की को वो भूत उसके शरीर पर उससे शारीरक सम्बन्ध बनाने की चेष्टा करता हुआ महसूस होता था।

जैसे कोई पुरुष जबरदस्ती कर रहा हो, उसका स्पर्श इसे शरीर पे महसूस होता है।

लड़की का बिहेवियर 10-12 दिन में ही पागलों की तरह हो गया था।

इसका इलाज मन्दिरों में करवाया, डॉक्टर से मानसिक रोग का ट्रीटमैंट चलाया था।

किसी मन्दिर से 3-4 महीने के ट्रीटमैंट से ये ठीक हुई और लगभग 1 साल बाद इसकी मानसिक रोग की दवाई बंद हुई।

इसको उस घटना के बाद जैसे कोई सदमा लग गया हो।

इसकी पढ़ाई में कॉलेज का साल बर्बाद हो गया।


ये प्रेतबाधा या पिशाच योग के कारण हुआ।


कुछ ज्योतिषी कहते हैं कि पितृ दोष के कारण भी प्रेतबाधा होती है।

कुण्डली देखी थी जिसमें धनु लग्न में राहु था और बाकी ग्रह ठीक थे।

उस लड़की की बॉडी में भी प्रेत आता था।

उसका रिश्ता हुआ था लेकिन जब लड़के वालों को पता चला कि इसको प्रेत की समस्या है तो रिश्ता तोड़ दिया।

कारण प्रेत बाधा ही हुई।

दूसरी बात ये भी है कि लग्न में राहु था तो 180° पे केतु सप्तम भाव मे आना स्वभाविक है।

राहु का कारण बॉडी में भूत आया और केतु के कारण शादि टूट गई।

दोनों के प्रभाव एक साथ चले।


कुछ कहते हैं कि पितृ दोष के कारण प्रेत बाधा होती है।

इन कुण्डलियों को देखें तो एक कुण्डली में नवम भाव मे राहु है।

दूसरी कुण्डली में पँचम भाव मे केतु है।


जो ज्योतिष जानता हो वो "भावात भावम" का सूत्र 12 भावों पर लगाकर देख ले कि प्रेतबाधा पितृ दोष के कारण होती है या नहीं।


आप पाएंगे कि जिस मर्जी भाव मे राहु केतु लगा दें, वो जैसे जैसे घुमा फिरा के पितृ दोष बना ही देंगे और सभी पितृ दोष से ग्रसित पाए जाएंगे।


लेकिन सभी को प्रेतबाधा नहीं होती है।

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