#श्रीमद्भागवत_गीता
।
।
#प्रैक्टिकल_एक्सपीरियंस
।
।
लोग इसी डर से श्रीमद्भागवत गीता नहीं पढ़ते कि वो #वैरागी ना बन जाएं।
।
।
जो श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने के साथ साथ समझता है,
उसके जीवन में उसे किसी भी समस्या का समाधान जल्दी मिलता है।
।
।
ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका समाधान श्रीमद्भागवत गीता में ना हो।
।
#अनन्त_भावार्थ निकल जाते हैं और हर भावार्थ आपके विचारों का शोधन करता है।
।
श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने से ज्यादा समझना जरूरी है।
।
।
इसके #शब्द पढ़ने में वक्त नहीं लगता है लेकिन इसके #अर्थ को समझने में जीवन कम पड़ेगा।
।
।
लाइफ में जब भी कोई उलझन आ खड़ी हो,
कोई रास्ता ना दिखे तो श्रीमद्भागवत गीता की पुस्तक पकड़ के बैठ जाओ।
।
दिल करे तो भगवान से प्रार्थना कर लेना कि समस्या से निकलने का रास्ता बता दे।
।
अगर दिल ना करे तो प्रार्थना भी मत करना।
।
।
अपनी समस्या के बारे में सोचते हुए जो दिल करे वो पेज खोल के पढ़ो।
।
आमने सामने के दोनों पेज में या उनके आगे पीछे आपको आपकी समस्या का समाधान लिखा मिलेगा।
।
।
प्रैक्टिकल की हुई बात है।
।
।
श्रीमद्भागवत गीता का सरल हिन्दी अनुवाद आपको मिलता है तो खरीद लीजिये।
।
।
#श्रीमद्भगवद्गीता_साधक_संजीवनी प्रिंटिड बाय #गीताप्रैस से अच्छी व्याख्या मैंने आजतक नहीं पढ़ी।
।
और इस पुस्तक में सटीक व्याख्या के कारण थ्योरी अधिक है, जिससे आपके #मन_में_चल_रहा_द्वन्द बहुत जल्दी स्पष्ट होता है।
।
।
मेरे एक क्लाईंट को बहुत उलझन थी।
।
उनके पास भी श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी थी।
।
मैंने उनको कहा कि #अध्याय 2 #श्लोक 7 को निकाल कर पढ़िए।
।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।
।
अर्थ - इसलिये कायरतारूप दोषसे उपहत हुए स्वभाववाला तथा धर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिये कहिए; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण आए हुए मुझको शिक्षा दीजिये।
।
।
उसके बाद पुस्तक बन्द कर के जो दिल करे वो पेज खोल दो।
।
उन्होंने एक पेज खोल दिया।
।
उनको चमत्कार ही हो गया।
।
उनकी उलझन जैसे बिल्कुल सुलझाकर ही लिखी गई हो।
।
।
दूसरी उलझन अगले दिन फिर इसी मैथड से सुलझाई।
।
।
तीसरे दिन मुझसे बोले कि तुम कहते हो हर सवाल का उत्तर श्रीमद्भागवत गीता में है।
।
तो अब ये पूछते हैं कि उनके किसी दुश्मन की मौत कब होगी?
।
इसके बारे में श्रीमद्भागवत गीता क्या कहेगी ?
।
।
वही मन्त्र वाला मैथड शुरू किया और पेज खोला -
।
पेज में लिखा हुआ मिला -
।
अध्याय 4 श्लोक 3
।
उसकी व्याख्या की ये कुछ पँक्तियाँ माइण्ड में खटक गई -
।
साधारण लोग भगवान की दी हुई वस्तुओंको तो
अपनी मानते हैं (जो अपनी हैं ही नहीं) पर
भगवान को अपना नहीं मानते (जो वास्तवमें अपने
हैं)।
।
[ एक टुच्ची सी सोच किसी के मरने के बारे में सोचना, पड़ोसी के दुःख आने पर ध्यान है, लेकिन भगवान पर ध्यान नहीं है जो ध्यान करने के लायक है। ]
।
वे लोग वैभवशाली भगवान को न देखकर उनके
वैभव को ही देखते हैं।
।
वैभव को ही सच्चा मानने से
उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि वे भगवान का
अभाव ही मान लेते हैं अर्थात् भगवान की तरफ
उनकी दृष्टि जाती ही नहीं।
।
[ बुद्धि भ्रष्ट हो गई है जो हाथ मे श्रीमद्भागवत गीता पकड़कर भी भगवान की शिक्षा पर चिन्तन ना कर के पड़ोसी की मौत का इन्तजार करते हैं। ]
।
।
बात घुमा के लिखी गई है लेकिन इन पँक्तियों ने #आईना दिखा दिया कि तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट है इस वक़्त।
।
ढूँढने वाले इस किताब में जिन्दगी ढूंढ लेंगे और इसके #गूढ़_अर्थों की ओर ध्यान ना देने वाले बिल्कुल वैसे ही होंगे जैसे #कड़छी #स्वादिष्ट_पकवान में डूबी रहती है लेकिन उसका #स्वाद कभी नहीं ले पाती।
।
।
जिसको अक्ल होगी वो जरूर पढ़ेगा और अर्थ समझेगा।
।
पढ़ते रहे और अर्थ ना निकाला और ना उसे जीवन में उतारा तो ये आपके किसी काम की नहीं।
।
।
जो इसके अर्थ को बुद्धि लगाकर खुद को बुद्धिमान समझकर समझेगा वो इसे सिर्फ बुद्धि तक ही सीमित रख पायेगा और दूसरों को भाषण देना शुरू कर देगा।
।
जो समर्पण भाव से बुद्धि और मन लगाकर समझेगा,
उसका फालतू का भाषण देना ही बंद हो जाएगा।
।
एक साफ स्वच्छ सोच अवश्य बनेगी।
।
एक मित्र ने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता कोई पुण्यात्मा ही पढ़ पायेगा।
।
लेकिन बात उल्टी है कि जो इसे पढ़ेगा और अर्थ समझेगा वो पुण्यात्मा हो जाएगा।
।
।
जो इसे जीवन में उतार देगा उसका पुण्यात्मा होने ना होने से कोई लेना देना नहीं रह जायेगा।
।
निष्काम कर्मयोगी हो जाएगा।
।
।
अपने जीवन में किसी कामयाब आदमी से मिलो तो उसकी कामयाबी का राज पूछना।
।
वो 2 लाइन से ज्यादा नहीं कहेगा।
।
और जो 2 लाइन कहेगा, वो आपको श्रीमद्भागवत गीता में किसी ना किसी रूप में लिखी ही मिलेगी।
।
।
किसी ने पूछ लिया कि श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने से क्या मिलेगा ?
।
[ जायज सी बात है कि जब तक ये पता ना हो कि पौधा किस फल का है, तब तक आप ना वो पौधा लगाओगे ना उसे पानी देंगे। ]
।
।
श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने से कुछ नहीं मिलेगा।
।
क्योंकि बहुत सारे बाबा लोक भी इसे पढ़ते थे और सुनाते थे,
।
आजकल वो 10-20 साल के लिए जेल के अन्दर हैं।
।
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जो मिलेगा वो इसके अर्थ को समझने से मिलेगा और उसको जीवन में उतारने से मिलेगा।
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#प्रैक्टिकल_एक्सपीरियंस
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लोग इसी डर से श्रीमद्भागवत गीता नहीं पढ़ते कि वो #वैरागी ना बन जाएं।
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जो श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने के साथ साथ समझता है,
उसके जीवन में उसे किसी भी समस्या का समाधान जल्दी मिलता है।
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ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका समाधान श्रीमद्भागवत गीता में ना हो।
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#अनन्त_भावार्थ निकल जाते हैं और हर भावार्थ आपके विचारों का शोधन करता है।
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श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने से ज्यादा समझना जरूरी है।
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इसके #शब्द पढ़ने में वक्त नहीं लगता है लेकिन इसके #अर्थ को समझने में जीवन कम पड़ेगा।
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लाइफ में जब भी कोई उलझन आ खड़ी हो,
कोई रास्ता ना दिखे तो श्रीमद्भागवत गीता की पुस्तक पकड़ के बैठ जाओ।
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दिल करे तो भगवान से प्रार्थना कर लेना कि समस्या से निकलने का रास्ता बता दे।
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अगर दिल ना करे तो प्रार्थना भी मत करना।
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अपनी समस्या के बारे में सोचते हुए जो दिल करे वो पेज खोल के पढ़ो।
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आमने सामने के दोनों पेज में या उनके आगे पीछे आपको आपकी समस्या का समाधान लिखा मिलेगा।
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प्रैक्टिकल की हुई बात है।
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श्रीमद्भागवत गीता का सरल हिन्दी अनुवाद आपको मिलता है तो खरीद लीजिये।
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#श्रीमद्भगवद्गीता_साधक_संजीवनी प्रिंटिड बाय #गीताप्रैस से अच्छी व्याख्या मैंने आजतक नहीं पढ़ी।
।
और इस पुस्तक में सटीक व्याख्या के कारण थ्योरी अधिक है, जिससे आपके #मन_में_चल_रहा_द्वन्द बहुत जल्दी स्पष्ट होता है।
।
।
मेरे एक क्लाईंट को बहुत उलझन थी।
।
उनके पास भी श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी थी।
।
मैंने उनको कहा कि #अध्याय 2 #श्लोक 7 को निकाल कर पढ़िए।
।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।
।
अर्थ - इसलिये कायरतारूप दोषसे उपहत हुए स्वभाववाला तथा धर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिये कहिए; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण आए हुए मुझको शिक्षा दीजिये।
।
।
उसके बाद पुस्तक बन्द कर के जो दिल करे वो पेज खोल दो।
।
उन्होंने एक पेज खोल दिया।
।
उनको चमत्कार ही हो गया।
।
उनकी उलझन जैसे बिल्कुल सुलझाकर ही लिखी गई हो।
।
।
दूसरी उलझन अगले दिन फिर इसी मैथड से सुलझाई।
।
।
तीसरे दिन मुझसे बोले कि तुम कहते हो हर सवाल का उत्तर श्रीमद्भागवत गीता में है।
।
तो अब ये पूछते हैं कि उनके किसी दुश्मन की मौत कब होगी?
।
इसके बारे में श्रीमद्भागवत गीता क्या कहेगी ?
।
।
वही मन्त्र वाला मैथड शुरू किया और पेज खोला -
।
पेज में लिखा हुआ मिला -
।
अध्याय 4 श्लोक 3
।
उसकी व्याख्या की ये कुछ पँक्तियाँ माइण्ड में खटक गई -
।
साधारण लोग भगवान की दी हुई वस्तुओंको तो
अपनी मानते हैं (जो अपनी हैं ही नहीं) पर
भगवान को अपना नहीं मानते (जो वास्तवमें अपने
हैं)।
।
[ एक टुच्ची सी सोच किसी के मरने के बारे में सोचना, पड़ोसी के दुःख आने पर ध्यान है, लेकिन भगवान पर ध्यान नहीं है जो ध्यान करने के लायक है। ]
।
वे लोग वैभवशाली भगवान को न देखकर उनके
वैभव को ही देखते हैं।
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वैभव को ही सच्चा मानने से
उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि वे भगवान का
अभाव ही मान लेते हैं अर्थात् भगवान की तरफ
उनकी दृष्टि जाती ही नहीं।
।
[ बुद्धि भ्रष्ट हो गई है जो हाथ मे श्रीमद्भागवत गीता पकड़कर भी भगवान की शिक्षा पर चिन्तन ना कर के पड़ोसी की मौत का इन्तजार करते हैं। ]
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।
बात घुमा के लिखी गई है लेकिन इन पँक्तियों ने #आईना दिखा दिया कि तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट है इस वक़्त।
।
ढूँढने वाले इस किताब में जिन्दगी ढूंढ लेंगे और इसके #गूढ़_अर्थों की ओर ध्यान ना देने वाले बिल्कुल वैसे ही होंगे जैसे #कड़छी #स्वादिष्ट_पकवान में डूबी रहती है लेकिन उसका #स्वाद कभी नहीं ले पाती।
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जिसको अक्ल होगी वो जरूर पढ़ेगा और अर्थ समझेगा।
।
पढ़ते रहे और अर्थ ना निकाला और ना उसे जीवन में उतारा तो ये आपके किसी काम की नहीं।
।
।
जो इसके अर्थ को बुद्धि लगाकर खुद को बुद्धिमान समझकर समझेगा वो इसे सिर्फ बुद्धि तक ही सीमित रख पायेगा और दूसरों को भाषण देना शुरू कर देगा।
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जो समर्पण भाव से बुद्धि और मन लगाकर समझेगा,
उसका फालतू का भाषण देना ही बंद हो जाएगा।
।
एक साफ स्वच्छ सोच अवश्य बनेगी।
।
एक मित्र ने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता कोई पुण्यात्मा ही पढ़ पायेगा।
।
लेकिन बात उल्टी है कि जो इसे पढ़ेगा और अर्थ समझेगा वो पुण्यात्मा हो जाएगा।
।
।
जो इसे जीवन में उतार देगा उसका पुण्यात्मा होने ना होने से कोई लेना देना नहीं रह जायेगा।
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निष्काम कर्मयोगी हो जाएगा।
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अपने जीवन में किसी कामयाब आदमी से मिलो तो उसकी कामयाबी का राज पूछना।
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वो 2 लाइन से ज्यादा नहीं कहेगा।
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और जो 2 लाइन कहेगा, वो आपको श्रीमद्भागवत गीता में किसी ना किसी रूप में लिखी ही मिलेगी।
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किसी ने पूछ लिया कि श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने से क्या मिलेगा ?
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[ जायज सी बात है कि जब तक ये पता ना हो कि पौधा किस फल का है, तब तक आप ना वो पौधा लगाओगे ना उसे पानी देंगे। ]
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श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने से कुछ नहीं मिलेगा।
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क्योंकि बहुत सारे बाबा लोक भी इसे पढ़ते थे और सुनाते थे,
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आजकल वो 10-20 साल के लिए जेल के अन्दर हैं।
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जो मिलेगा वो इसके अर्थ को समझने से मिलेगा और उसको जीवन में उतारने से मिलेगा।

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