#अखण्ड_सौभाग्यवती_योग।
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इस योग वाली स्त्री #सुहागन मरती है।
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यह योग सिर्फ #स्त्रियों की कुण्डली में देखा जाता है।
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जिस स्त्री की कुण्डली में यह योग बनता है उसका #सुहाग_अमर होता है।
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अर्थात उसके पति की आयु उससे अधिक होती है और स्त्री अपने पति से पहले मरती है।
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#परिभाषा-
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जिस स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी सप्तम भाव में हो
या भाग्य भाव में हो अथवा भाग्य भाव का स्वामी सप्तम भाव में
मित्र राशि अथवा उच्च राशि में हो या सप्तम और नवम भाव के स्वामियों के स्थान परिवर्तन हो और एक दूसरे के मित्र हों तथा किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि ना हो तथा सप्तमेश भी अच्छे स्थान पर हो तथा अशुभ ग्रह से दृष्ट ना हो और अष्टम भाव खाली हो तो अखण्ड सौभाग्यवती योग बनता है।
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एक स्त्री की कुंडली में यह योग है।
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इसके कुछ पॉइंट्स -
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जन्म - 2 जनवरी 1988
समय - सुबह 4:20 बजे
स्थान - दुर्ग
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[1] वृश्चिक लग्न में सप्तम भाव में नवम भाग्य भाव का स्वामी चन्द्रमा उच्च राशि में है।
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[2] सप्तम भाव का स्वामी शुक्र तृतीय भाव में मित्र शनि की मकर राशि में बैठा है जो सप्तम भाव के लिए अच्छा फल है।
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[3] सप्तम भाव का स्वामी अपने स्थान से नवम भाव में गया है जो जो कि सप्तम भाव के लिए भाग्य का भाव है।
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[4] सप्तम भाव में चन्द्रमा तथा तृतीय भाव में शुक्र किसी भी अशुभ ग्रह के प्रभाव में नहीं है।
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[5] लग्नेश मंगल की सप्तम भाव पर दृष्टि है, मंगल छठे भाव का स्वामी भी है, कुछ परेशानी तो होगी लेकिन लग्नेश की दृष्टि वृद्धि करती है और नुक्सान कम करती है।
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[6] अष्टम भाव खाली है।
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[7] कुछ लोग राहु केतु की नवम और पँचम दृष्टि को मानते हैं औए कुछ नहीं मानते हैं।
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जो मानते हैं वो कहेंगे कि सप्तम भाव के चन्द्रमा तथा सप्तम भाव और तृतीय भाव में बैठे शुक्र पर केतु की दृष्टि है।
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लेकिन फिर भी पति की मृत्यु पहले नहीं होगी।
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[ जरा सोचें कि अगर किसी के पँचम भाव और पंचमेश पर राहु या केतु की दृष्टि हो तो क्या सन्तान मर जाती है ? ]
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राहु केतु की दृष्टि अगर देखी जाए तो कुण्डली के 6 भाव इनके इफेक्ट में आ जाएंगे और आधे ग्रह इनके प्रभाव में होंगे।
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उस बेचारे का तो खानदान खत्म हो जाएगा।
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अक्सर देखा जाता है कि जब कुछ समझ नहीं आता है तो एस्ट्रोलॉजर सारा दोष राहु केतु की दृष्टि के सिर पर फैंक देते हैं।
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हर बार राहु केतु की से दृष्टि ऐसा नहीं होता है।
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दृष्टि का प्रभाव देखने के लिए नक्षत्रों की हैल्प ली जाती है ना कि भावों की सहायता से किसी को भी मार दिया जाये।
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जब तक किसी भाव में राहु केतु ना हो या किसी भाव के स्वामी के साथ ना हो तब तक उस ग्रह और भाव को इनकी दृष्टि मात्र से खराब नहीं कर देना चाहिए।
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अतः इस कुण्डली में अखण्ड सौभाग्यवती योग बनता है।

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