Sunday, September 22, 2019

कुसुम योग

#कुसुम_योग


परिभाषा -

लग्नात्सप्तमगे चन्द्रे चन्द्रादष्टमगे रवौ।
गुरूणा स्थीयते लग्ने कुसुमो योग ईरित:।

अर्थ -

लग्न से सप्तम भाव में चंद्रमा हो, चंद्रमा से अष्टम
अर्थात द्वितीय भाव में सूर्य हो,
और लग्न में बृहस्पति हो तो कुसुम योग बनता है।

फल -

दाता महीमण्डलनाथबन्द्यो भोगी महावंशजराजमुख्य: ।
लोके महाकीर्तियुक्त: प्रतापी नाथो नाराणां कुसुमोद्भव: स्यात।

अर्थ -

कुण्डली में निर्मित कुसुम योग जातक को दान पुण्य करने वाला बनाता है।
जातक का जन्म उच्च कुल में होता है।
जातक को उच्च पद की प्राप्ति होती है।
यश, कीर्ति और सम्मान की प्राप्ति होती है।

नोट - किसी भी योग का फल किताब में लिखे फलादेश से ऐज इट इज़ मैच नहीं होता है, कुछ अंतर मिलता है।

देश काल पात्रता एक अनुसार सभी अच्छे योग वाले उच्च कुल में पैदा नहीं होते।

सभी दानियों की कुण्डली में कुसुम योग नहीं होता।

कहने का मतलब ये है कि सी योग वाले का कार्य बुद्धि, वाणी, धन, शिक्षा आदि से  सम्बन्ध रखता है।

इसलिए कह सकते हैं कि -

ऐसे योग वाला जातक विद्वान बनता है,
या शिक्षा विभाग से जुड़ा रहता है,
अथवा किसी भी संस्था में
एक अच्छा सलाहकार बनता है।
और जहां भी जाता है,
वहाँ बुद्धि, वाणी के बल पर इज्जत कमाता है।


क्योंकि

[1] लग्न में बृहस्पति ज्ञान का आकर्षण देता है, बृहस्पति की पँचम दृष्टि बुद्धि भाव पर पड़ेगी और नवम दृष्टि भाग्य भाव पर पड़ेगी।

[2] लग्न का बृहस्पति दिग्बली होकर अच्छा फल प्रदान करेगा और  पँचम तथा नवम भाव का कारक होने से वहां पर बृहस्पति की दृष्टि अच्छा फल देगी जिसके कारण और धर्म कर्म की वृद्धि होगी।

[3] बृहस्पति से सातवां चन्द्रमा #गजकेसरी_योग बना देगा जो शुभफल देने वाला योग है।

[4] द्वितीय भाव में सूर्य होना वाणी स्थान से प्रभावित करने वाली वाणी देगा, बड़े स्तर की बात कहने की आदत होगी।

[5] सूर्य से द्वादश भाव मे बृहस्पति का होना #शुभवेशी_योग बना देगा, जिसके कारण जातक को शुभफल मिलेगा।

[6] चन्द्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो मन ने ज्ञान की इच्छा और विचारों में स्टेब्लिटी आती जिससे  मानसिक कार्यक्षमता बढ़ती है।


प्रस्तुत कुण्डली एक प्राइवेट स्कूल चेयरमैन की है।

जन्म - 13 सितम्बर 1978
समय - सुबह 3 बजकर 17 मिनट
स्थान - भिलाई

उपरोक्त लगभग सभी पॉइंट्स इस कुण्डली से मैच हैं।

[1] लग्न में उच्च बृहस्पति दिगबली है, मतलब बृहस्पति ज्ञान का कारण होने से ज्ञानी बना रहा है।

[2] बृहस्पति की पँचम दृष्टि शिक्षा भाव पर है, जिससे अच्छी शिक्षा हुई।

[3] पँचम भाव का स्वामी मंगल चतुर्थ केन्द्र में अपने स्थान से द्वादश अर्थात व्यय भाव में गया है।

जब भी पँचम भाव का स्वामी चतुर्थ में जाये तो शिक्षा में बढ़ोतरी होती है क्योंकि अपने से द्वादश भाव खर्च का भाव होता है और ज्ञान ऐसी चीज है जो खर्च करने से बढ़ती है।

इस शिक्षा का लाभ हुआ है।

[4] चतुर्थ भाव में मंगल के साथ शुक्र है, शुक्र केंद्र का स्वामी होकर अपने दिग्बल स्थान में बैठ कर #मालव्य_योग बना रहा है, इस कारण भी शुभफलों में बढ़ोतरी हुई।

[5] बृहस्पति की चन्द्रमा से गजकेसरी योग बन गया।

[6] सूर्य से द्वादश में बृहस्पति होने से शुभवेशी योग बन गया।

उपरोक्त सारे गुण इस कुण्डली में हैं इसलिए ये शिक्षा विभाग के चेयरमैन हैं और स्कूल संचालन अच्छी तरह से कर सकते हैं।

काफी अच्छे शुभयोग इस कुण्डली में कह सकते हैं।

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